भगवान कांटे से ही कांटे को निकालते हैं

0:00 0:00

भगवान कांटे से ही कांटे को निकालते हैं

श्रीमद् भागवत के पहले श्लोक का दूसरा पद।

तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि।

बहुत ही महत्वपूर्ण एक स्पष्टीकरण है इसमें भगवान के बारे में भागवत के प्रारंभ में ही। लोग भगवान के बारे में बहुत कुछ बताते हैं। भगवान ऐसा है, वैसा है, जो अच्छा है वही भगवान है। जो बुरा है वो भगवान नहीं है, जो सुंदर है वो भगवान है, जो कुरूप है वो भगवान नहीं है। ये सारी अपनी-अपनी कल्पनाएं हैं। हर एक की कल्पनाएं हैं। भगवान इन सब से बंधे नहीं हैं। ऐसी कल्पनाएं करके आगे ये कहेंगे ये भगवान ने अच्छा नहीं किया, भगवान ने करण के साथ न्याय नहीं किया। क्या है भगवान का सही स्वरूप? क्या भगवान सचमुच ये सब करते रहते हैं? हमें लगता है कि भगवान ये सब करते रहते हैं। पानी में चंद्रमा के प्रतिबिंब को देखकर हम सोच बैठते हैं कि चंद्रमा उस पानी के अंदर है। और उसे पकड़ने जाते हैं। यह इसलिए कि हमारे ही ज्ञानेंद्रिय हमें सही जानकारी नहीं देती हैं। जानकारी को सिकोड़ देती हैं। कुछ गलत नहीं करती हैं, उनका काम यही है। बहुत ही कम लोग इसे समझ पाते हैं। आम आदमी इन इंद्रियों के भरोसे ही रहते हैं। जो देखा वही सही, जो सुना वही सही, इस प्रकार। भगवान की कोई सीमा नहीं है। किसी विषय में, आकार हो, शक्ति हो, ज्ञान हो, सामर्थ्य हो, किसी भी विषय में। सीमा हमारी इंद्रियों में है। जब भगवान वृंदावन में थे, जब गोपिकाएं उन्हें सचमुच सामने देख रही थी, उनके सुंदर आकार को सामने देख रही थी, वो उनका

वास्तविक आकार नहीं था। उनको ऐसे लग रहा था चींटी के सामने आदमी का पैर है, चींटी को लगता है कि वो एक दीवार है। पर भगवान ने क्या किया? उनकी इस त्रुटि को, उनके इस दोष को ही उनके फायदे के लिए कर दिया। उसी के माध्यम से उन्हें ज्ञान प्राप्त कराया, ब्रह्म की अनुभूति प्राप्त कराया। भगवान कुछ भी कर सकते हैं, गुण को दोष में बदल सकते हैं, दोष को गुण में बदल सकते हैं। यही तो भगवान करते थे अपने धाम में मधुरा में, धामनास स्वेना। लोगों की अविद्या को मिटाते थे। निरस्त कुहकम। मिथ्या से ही मिथ्या का विनाश करते थे। कांटे से ही कांटे को निकालते थे। अगर आपको सिर्फ हिंदी ही पता हो और मुझे आपको संस्कृत सिखाना हो तो हिंदी के माध्यम से ही हो पाएगा ना पहले-पहले। यही भगवान करते थे। यत्र त्रिसर्गो मृषा। ये जो हम समझते हैं कि जगत का सृजन हो जाने पर सत्व, रज और तमोगुण जो प्रवृत्त हो जाते हैं, भगवान भी इससे बाधित हो जाते हैं, ये मृषा है, गलत है। हां, भगवान कभी-कभी ऐसे भी दिखाएंगे कि मैं परवश हो गया हूं। पर ये तो नाटक है उनका। उच्चतम जगत की शक्ति के रूप में, परब्रह्म के रूप में, परमार्थ के रूप में भगवान में दो ही दोष होने की संभावना है। एक, कोई परिमिति जो साफ है कि नहीं है। दूसरा, वे अपने कर्तव्य को नहीं निभाते हैं, वो भी नहीं। धामनास्वेन सदा निरस्त को सदा सर्वदा जो उनके शरण में जाते हैं उनकी अविद्या को खत्म कर देते हैं सदा। भगवान में ये दोनों ही दोष नहीं हैं। भगवान पर सत्य है। सत्य क्या है? जो देश और काल से बाधित नहीं होता। रात ठंडी है। यह तो जगह पर आश्रित है, हर जगह रात ठंडी नहीं होती। इसलिए यह कथन सत्य नहीं हो सकता। भारत अंग्रेजों के अधीन में है, था अब नहीं। तो यह भी कथन सत्य नहीं है। भगवान के बारे में जो कुछ भी है, वह देश के अनुसार या काल के अनुसार नहीं बदलता। इसलिए भगवान सत्य है, परम सत्य है। धीमही। उनके ऊपर हम ध्यान करते हैं।

 

  • श्रीमद्भागवत के प्रथम श्लोक में भगवान को सत्यम परम धीमहि कहकर क्यों संबोधित किया गया है?
    सत्य वह है जो देश, काल और परिस्थिति से कभी बाधित नहीं होता। संसार की हर वस्तु समय के साथ बदलती है, परंतु भगवान का स्वरूप और उनकी सत्ता सदैव एक समान रहती है। वे न तो स्थान से सीमित हैं और न ही समय से, इसीलिए उन्हें परम सत्य कहा गया है।
  • तेजो वारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा का गूढ़ अर्थ क्या है?
    इसका अर्थ है कि जैसे सूर्य की किरणों में जल का, जल में स्थल का और स्थल में जल का भ्रम होता है (मृगतृष्णा की भाँति), वैसे ही सत्व, रज और तम गुणों से बना यह संसार मिथ्या होते हुए भी भगवान के आश्रय से सत्य प्रतीत होता है। भगवान इस भ्रम से परे हैं।
  • मनुष्य भगवान के स्वरूप को समझने में भूल क्यों करता है?
    मनुष्य की ज्ञानेंद्रियों की अपनी सीमाएं हैं। जैसे जल में चंद्रमा के प्रतिबिंब को देखकर बालक उसे वास्तविक चंद्रमा समझ लेता है, वैसे ही हम अपनी सीमित और दोषपूर्ण इंद्रियों से अनंत भगवान को मापने का प्रयास करते हैं। हमारी इंद्रियां जानकारी को सिकोड़ देती हैं, जिससे हम पूर्ण सत्य नहीं देख पाते।
  • धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं पद भगवान की किस शक्ति को दर्शाता है?
    यह पद स्पष्ट करता है कि भगवान अपने स्वप्रकाशित स्वरूप (धाम) में सदैव स्थित रहते हैं, जहाँ माया या कपट का लेशमात्र भी प्रवेश नहीं है। वे अपनी चित-शक्ति से अविद्या और अंधकार का सदा के लिए विनाश कर देते हैं।
  • क्या भगवान मानवीय गुणों और दोषों से बंधे हुए हैं?
    कदापि नहीं। सामान्य जन अपनी कल्पना के अनुसार भगवान को अच्छा, बुरा, सुंदर या कुरूप मानते हैं, परंतु भगवान इन समस्त द्वंद्वों से मुक्त हैं। वे गुणों को दोष में और दोषों को गुणों में बदलने की सामर्थ्य रखते हैं। उनकी कोई सीमा नहीं है।
  • भगवान ने ब्रज की गोपिकाओं के साथ कैसा व्यवहार किया और उसका उद्देश्य क्या था?
    गोपिकाओं को भगवान का जो साकार रूप दिखता था, वह उनकी मानवीय दृष्टि की सीमा थी। जैसे चींटी को मनुष्य का पैर एक अभेद्य दीवार लगता है, वैसे ही इंद्रियों की सीमा के कारण वे उन्हें देख रही थीं। भगवान ने उनकी इसी त्रुटि को माध्यम बनाकर उन्हें ब्रह्म की अनुभूति प्रदान की और अपनी लीला से उनका कल्याण किया।
  • अविद्या को मिटाने के लिए भगवान किस पद्धति का उपयोग करते हैं?
    भगवान कांटे से कांटा निकालने की विधि अपनाते हैं। जैसे हिंदी जानने वाले को हिंदी के माध्यम से ही संस्कृत सिखाई जा सकती है, वैसे ही भगवान संसार के मिथ्या प्रतीकों का उपयोग करके ही जीव को परम सत्य तक ले जाते हैं। वे मिथ्या के माध्यम से ही मिथ्या का विनाश करते हैं।
  • क्या सृष्टि के सृजन के बाद भगवान प्राकृतिक गुणों के अधीन हो जाते हैं?
    यह एक बड़ी भ्रांति है। यत्र त्रिसर्गो मृषा पद यही स्पष्ट करता है कि त्रिगुणमयी सृष्टि के प्रवाह में भगवान कभी भी परवश नहीं होते। यदि वे कभी परवशता दिखाते भी हैं, तो वह केवल उनकी लीला या नाटक मात्र है, वास्तविकता नहीं।
  • भगवान में कौन से दो संभावित दोष माने जा सकते हैं जिन्हें इस श्लोक में नकारा गया है?
    प्रथम दोष है परिमिति यानी सीमा में होना, और द्वितीय है अपने कर्तव्य का निर्वहन न करना। भगवान अनंत हैं, इसलिए वे असीमित हैं। साथ ही, वे सदा सर्वदा अपने शरणागतों की अविद्या का नाश करके अपने परम कर्तव्य को पूर्ण करते हैं, अतः वे दोषरहित हैं।
  • धीमहि शब्द का इस प्रसंग में क्या महत्व है?
    धीमहि का अर्थ है हम ध्यान करते हैं। यह केवल सूचना प्राप्त करना नहीं, बल्कि उस परम सत्य में बुद्धि को स्थिर करना है। जब हम यह समझ लेते हैं कि भगवान ही एकमात्र अपरिवर्तनीय तत्व हैं, तब हमारा ध्यान स्वाभाविक रूप से उस परम सत्य की ओर उन्मुख हो जाता है।
हिन्दी

हिन्दी

भागवत

Click on any topic to open

0

Copyright © 2026 | Vedadhara | All Rights Reserved. | Designed & Developed by Claps and Whistles
| | | | |
Vedahdara - Personalize

We use cookies