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श्रीमद् भागवत के पहले श्लोक का दूसरा पद।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि।
बहुत ही महत्वपूर्ण एक स्पष्टीकरण है इसमें भगवान के बारे में भागवत के प्रारंभ में ही। लोग भगवान के बारे में बहुत कुछ बताते हैं। भगवान ऐसा है, वैसा है, जो अच्छा है वही भगवान है। जो बुरा है वो भगवान नहीं है, जो सुंदर है वो भगवान है, जो कुरूप है वो भगवान नहीं है। ये सारी अपनी-अपनी कल्पनाएं हैं। हर एक की कल्पनाएं हैं। भगवान इन सब से बंधे नहीं हैं। ऐसी कल्पनाएं करके आगे ये कहेंगे ये भगवान ने अच्छा नहीं किया, भगवान ने करण के साथ न्याय नहीं किया। क्या है भगवान का सही स्वरूप? क्या भगवान सचमुच ये सब करते रहते हैं? हमें लगता है कि भगवान ये सब करते रहते हैं। पानी में चंद्रमा के प्रतिबिंब को देखकर हम सोच बैठते हैं कि चंद्रमा उस पानी के अंदर है। और उसे पकड़ने जाते हैं। यह इसलिए कि हमारे ही ज्ञानेंद्रिय हमें सही जानकारी नहीं देती हैं। जानकारी को सिकोड़ देती हैं। कुछ गलत नहीं करती हैं, उनका काम यही है। बहुत ही कम लोग इसे समझ पाते हैं। आम आदमी इन इंद्रियों के भरोसे ही रहते हैं। जो देखा वही सही, जो सुना वही सही, इस प्रकार। भगवान की कोई सीमा नहीं है। किसी विषय में, आकार हो, शक्ति हो, ज्ञान हो, सामर्थ्य हो, किसी भी विषय में। सीमा हमारी इंद्रियों में है। जब भगवान वृंदावन में थे, जब गोपिकाएं उन्हें सचमुच सामने देख रही थी, उनके सुंदर आकार को सामने देख रही थी, वो उनका
वास्तविक आकार नहीं था। उनको ऐसे लग रहा था चींटी के सामने आदमी का पैर है, चींटी को लगता है कि वो एक दीवार है। पर भगवान ने क्या किया? उनकी इस त्रुटि को, उनके इस दोष को ही उनके फायदे के लिए कर दिया। उसी के माध्यम से उन्हें ज्ञान प्राप्त कराया, ब्रह्म की अनुभूति प्राप्त कराया। भगवान कुछ भी कर सकते हैं, गुण को दोष में बदल सकते हैं, दोष को गुण में बदल सकते हैं। यही तो भगवान करते थे अपने धाम में मधुरा में, धामनास स्वेना। लोगों की अविद्या को मिटाते थे। निरस्त कुहकम। मिथ्या से ही मिथ्या का विनाश करते थे। कांटे से ही कांटे को निकालते थे। अगर आपको सिर्फ हिंदी ही पता हो और मुझे आपको संस्कृत सिखाना हो तो हिंदी के माध्यम से ही हो पाएगा ना पहले-पहले। यही भगवान करते थे। यत्र त्रिसर्गो मृषा। ये जो हम समझते हैं कि जगत का सृजन हो जाने पर सत्व, रज और तमोगुण जो प्रवृत्त हो जाते हैं, भगवान भी इससे बाधित हो जाते हैं, ये मृषा है, गलत है। हां, भगवान कभी-कभी ऐसे भी दिखाएंगे कि मैं परवश हो गया हूं। पर ये तो नाटक है उनका। उच्चतम जगत की शक्ति के रूप में, परब्रह्म के रूप में, परमार्थ के रूप में भगवान में दो ही दोष होने की संभावना है। एक, कोई परिमिति जो साफ है कि नहीं है। दूसरा, वे अपने कर्तव्य को नहीं निभाते हैं, वो भी नहीं। धामनास्वेन सदा निरस्त को सदा सर्वदा जो उनके शरण में जाते हैं उनकी अविद्या को खत्म कर देते हैं सदा। भगवान में ये दोनों ही दोष नहीं हैं। भगवान पर सत्य है। सत्य क्या है? जो देश और काल से बाधित नहीं होता। रात ठंडी है। यह तो जगह पर आश्रित है, हर जगह रात ठंडी नहीं होती। इसलिए यह कथन सत्य नहीं हो सकता। भारत अंग्रेजों के अधीन में है, था अब नहीं। तो यह भी कथन सत्य नहीं है। भगवान के बारे में जो कुछ भी है, वह देश के अनुसार या काल के अनुसार नहीं बदलता। इसलिए भगवान सत्य है, परम सत्य है। धीमही। उनके ऊपर हम ध्यान करते हैं।
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