भगवद्गीता - स्वामी रामसुखदास

भगवद्गीता - स्वामी रामसुखदास

श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा अगाध और अपार है। वह भगवन्मुक्तियोग का प्रमाणग्रंथ माना जाता है। मथुरानगरी के उद्धवजी गीता को भगवान का 'स्वरूप' मानते हैं। वह कहते हैं—एक उदात्त प्रकाश है, जिसका 'उपनि-षद्' नाम है। एक पुण्यगन्धा वाणी है, जिसका 'गीता' नाम है। एक पथ-प्रदर्शक शक्ति है, जिसका 'भगवद्गीता' नाम है। उपनिषदों में 'उपनिषद्', मुनियों में 'वाणी' और भक्तों में 'शक्ति' है। गीता में वह सब कुछ है, जो प्रत्येक व्यक्ति को जीवनमुक्त करने के लिए आवश्यक है। यही कारण है कि संसार के कोने-कोने में गीता के पठन-पाठन, मनन-चिन्तन और श्रवण-गायन का विशेष महत्व है।

गीता का यह वैशिष्ट्य है कि वह किसी भी दिशा से चले हुए व्यक्ति को मोक्ष-मार्ग पर पहुँचा सकती है। वह न किसी सम्प्रदाय की है, न किसी पन्थ की और न किसी मत की। वह तो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उपयोगी है। आज के भौतिकवादी युग में जीवन के हर क्षेत्र में असंतुलन आ गया है। इस असंतुलन को समाप्त करने के लिए भगवद्गीता का सम्यक् अध्ययन-मनन परम आवश्यक है।

गीता के पहले अध्याय को अर्जुनविषाद योग कहते हैं। विषाद अर्थात दुःख, शोक, चिन्ता या निराशा। युद्ध भूमि में जब अर्जुन ने अपने बन्धु-बान्धवों को युद्ध के लिए प्रस्तुत देखा, तो उसके हाथ काँपने लगे, शरीर शिथिल हो गया, गांडीव हाथ से छूट गया और वह रथ के आसन पर बैठ गया। उसने कहा-''हे माधव! मैं युद्ध नहीं करूँगा।'' संसार में जब कभी विवेक जाग्रत होता है, तब-तब वह अर्जुन की भाँति विषाद करता है। हम जब अपने जीवन में असमर्थता, अकुशलता, अनास्था, अधर्म और असत्य को ही चारों ओर देखकर खिन्न हो जाते हैं, तब अर्जुन की भाँति विषाद करते हैं। गीता इस विषाद को ही योग में परिणत करती है।

श्रीकृष्ण ने युद्धभूमि में खड़े होकर गीता का उपदेश दिया। युद्ध, जहाँ शौर्य और पराक्रम की परीक्षा होती है। अर्जुन वहाँ पर अपने कर्म से विमुख हो रहा था। भगवान ने उसे सजग किया और अपने कर्तव्य का ज्ञान कराया। गीता इसी जागरण का नाम है। जो अपने धर्म, अपने कर्म और अपने स्वभाव को ठीक से समझ लेता है, वही गीता को हृदय से समझ पाता है। गीता का आधार है—अनुभव। केवल अनुभव से ही इसका रहस्य जाना जा सकता है।

भगवद्गीता उपदेश नहीं, अनुभवों का अमृतसार है। कृष्ण कोई नवीनता की बातें और स्वर्ग-सिद्धान्त नहीं बता रहे थे। वे तो पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे सनातन सिद्धान्तों की पुनः व्याख्या कर रहे थे। वे काल-महाशक्ति, नियोगिनी प्रवृत्ति गीता के नवे-नवे भाव भरते रहते हैं। गीता में प्रयुक्त प्रत्येक शब्द को सिवाय बिना जिए नहीं समझा जा सकता। गीता केवल पढ़ने का ग्रंथ नहीं है, बल्कि जीने का धर्मशास्त्र है। यह जीवन को दिशा देता है, गन्तव्य देता है और गति देता है।

एक बार भगवान ने अर्जुन से पूछा—हे अर्जुन! मैं तुझे इतना सब कुछ बता चुका हूँ, अब तू अपना निर्णय स्वयं कर, जो तेरे लिए उचित हो, वह कर। बस! यहीं से गीता अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुँची। यह शिखर है—निर्णय का। गीता का उद्देश्य है—निर्णय की क्षमता का विकास करना। गीता का यह उपदेश आधुनिक युग के सबसे बड़े संकट का निवारण करता है।

आज मनुष्य आत्मनिर्भर नहीं रहा, वह निर्बल, निस्तेज और निरुद्देश्य बन गया है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वह दूसरों पर आश्रित रहता है। उसे न अपने विचारों पर विश्वास है, न अपने कार्यों में श्रद्धा और न अपने भविष्य में आशा। गीता इसी आत्महीनता को समाप्त करने के लिए निर्णय-शक्ति को जाग्रत करती है। वह अपने चिन्तन में निष्पक्षता लाती है और कर्तव्य का निर्णय करने की शक्ति प्रदान करती है।

गीता का योग किसी जटिल साधना का निर्देश नहीं करता। वह तो प्रत्येक व्यक्ति से यही कहता है कि तुम अपना कर्म करो, उसी में तुम्हारा धर्म है, वही तुम्हारा योग है, और वही तुम्हारा यज्ञ है।

गीता मनुष्य को तटस्थता की शिक्षा देती है। निष्काम-कर्मयोग उसका मूलमन्त्र है। गीता प्रत्येक परिस्थिति में सही निर्णय लेने की सामर्थ्य देती है। व्यक्ति अपने मूल स्वभाव को जानकर, परिस्थिति को पहचानकर और धर्म का विवेकपूर्वक निर्णय कर उचित कर्तव्य का पालन करे—यही गीता की शिक्षा है।

इस प्रकार व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक फल गीता सिद्ध करती गई है। इसके जैसै निकट कोई ग्रंथ देखने नहीं आता।

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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