यह घटना लगभग ४०० वर्ष पुरानी है। दिल्ली नगर में 'परमेष्ठी' नाम के एक दर्जी रहते थे। वे वस्त्र सीने का कार्य करते थे, किन्तु उनका मन हर क्षण ईश्वर की भक्ति में लीन रहता था।
एक बार दिल्ली के बादशाह ने परमेष्ठी को बुलाकर आज्ञा दी, 'परमेष्ठी, हमारे लिए दो ऐसे बहुमूल्य तकिये तैयार करो, जो अत्यंत सुंदर हों।'
परमेष्ठी ने कठोर परिश्रम कर दो भव्य तकिये बनाए। कार्य पूर्ण होने पर, वे अपनी आदत के अनुसार भगवान के ध्यान में मग्न हो गए। ध्यान की गहराई में उन्होंने देखा कि जगन्नाथ पुरी के मंदिर में भगवान की मूर्ति को विश्राम के लिए एक तकिये की आवश्यकता है।
परमेष्ठी का हृदय भक्ति से भर गया। उन्होंने वहीं बैठे-बैठे, भाव-विभोर होकर उन दो में से एक तकिया मानसिक रूप से भगवान जगन्नाथ को अर्पित कर दिया। जब उनका ध्यान टूटा, तो चमत्कार हो चुका था! वहां सचमुच एक ही तकिया शेष था, दूसरा तकिया वहां से लुप्त गायब हो चुका था।
जब बादशाह को पता चला कि एक तकिया गायब है, तो उन्होंने इसे चोरी का अपराध माना। परमेष्ठी की भक्ति की बात उन्हें समझ नहीं आई और उन्होंने भक्त को कारागार में बंदी बना लिया।
परमेष्ठी कारागार में भी शांत रहे। वे वहां भी प्रभु के ध्यान में बैठे रहे। एक दिन वहां एक अद्भुत घटना घटी - कारागार के सभी द्वार स्वयं खुल गए! किन्तु परमेष्ठी वहां से भागे नहीं, वे तो शांत चित्त से ध्यान में बैठे रहे।
उसी रात्रि, बादशाह को एक भयभीत करने वाला स्वप्न आया। इस स्वप्न और कारागार के चमत्कार ने बादशाह की आँखें खोल दीं। उन्हें यह सीख मिली कि ईश्वर के सच्चे भक्त को दंड देना अनुचित है और ईश्वरीय सत्ता के आगे राजा की शक्ति तुच्छ है।
अगले ही दिन, सत्य को समझते हुए बादशाह ने परमेष्ठी को ससम्मान मुक्त कर दिया।
मानसिक समर्पण से भौतिक वस्तु के लुप्त होने का क्या तात्पर्य है?
यह घटना 'मानसी सेवा' की पराकाष्ठा को दर्शाती है। जब भक्त की भावना और एकाग्रता अत्यंत गहन होती है, तो स्थूल और सूक्ष्म जगत का भेद समाप्त हो जाता है। परमेष्ठी द्वारा मानसिक रूप से अर्पित वस्तु को ईश्वरीय सत्ता ने इतना यथार्थ मानकर स्वीकार किया कि वह भौतिक जगत से स्थानांतरित हो गई। यह सिद्ध करता है कि ईश्वर के लिए भक्त का भाव ही पदार्थ है।
क्या आज के समय में भी मानसिक पूजा का इतना प्रभाव संभव है?
शास्त्रों में मानसिक पूजा को बाह्य उपचारों से अधिक श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि इसमें दिखावे का कोई स्थान नहीं होता। यदि चित्त पूर्ण रूप से एकाग्र हो और भावना में पवित्रता हो, तो मानसिक रूप से किया गया जप या अर्पण, भौतिक पूजा से अधिक फलदायी होता है। यह एक आंतरिक विज्ञान है, जो साधक की चेतना के स्तर पर निर्भर करता है।
तर्क के आधार पर किसी भौतिक वस्तु का केवल सोचने मात्र से गायब हो जाना कैसे स्वीकार्य है?
इसे आधुनिक विज्ञान के 'द्रव्य और ऊर्जा' के परिवर्तन के सिद्धांत या क्वांटम भौतिकी के संदर्भ में देखा जा सकता है, जहाँ पर्यवेक्षक का प्रभाव पदार्थ पर पड़ता है। आध्यात्मिक विज्ञान का मत है कि सम्पूर्ण सृष्टि चेतना का ही विस्तार है; अतः एक उच्च कोटि की चेतना पदार्थ को प्रभावित या रूपांतरित कर सकती है। इसे 'अणिमा' या 'प्राप्ति' जैसी योग सिद्धियों के अंतर्गत समझा जाना चाहिए, जो सामान्य भौतिक नियमों का अतिक्रमण करती हैं।
कारागार के द्वार खुलने पर भी भक्त वहां से भागे क्यों नहीं?
सच्चा भक्त सुख और दुख, बंधन और मुक्ति को समान भाव से देखता है। परमेष्ठी जानते थे कि वे शारीरिक रूप से भले ही कारागार में हों, किंतु उनकी आत्मा सदैव ईश्वर के चरणों में स्वतंत्र है। उन्हें अपने निर्दोष होने और ईश्वर की न्याय व्यवस्था पर पूर्ण विश्वास था, इसलिए उन्होंने परिस्थिति से भागने के स्थान पर ईश्वरीय इच्छा की प्रतीक्षा करना उचित समझा।
सामान्य व्यक्ति विपत्ति आने पर धैर्य क्यों खो देता है, जबकि भक्त शांत रहता है?
सामान्य व्यक्ति परिस्थितियों को अपने अहंकार और सीमित बुद्धि से नियंत्रित करने का प्रयास करता है, जिससे भय उत्पन्न होता है। इसके विपरीत, भक्त यह मानता है कि जीवन की प्रत्येक घटना ईश्वरीय विधान के अंतर्गत घटित हो रही है। इस 'शरणागति' के भाव के कारण भक्त घोर संकट में भी विचलित नहीं होता, क्योंकि उसका केंद्र बिंदु समस्या नहीं, अपितु ईश्वर होता है।
यदि ईश्वर रक्षा कर रहे थे, तो भक्त को बादशाह द्वारा बंदी बनने ही क्यों दिया गया?
यह घटना बादशाह के अहंकार को तोड़ने और समाज के समक्ष भक्ति की शक्ति को प्रमाणित करने के लिए आवश्यक थी। यदि भक्त को कष्ट न मिलता, तो बादशाह को सत्य का बोध न होता और न ही कारागार का वह चमत्कार घटित होता। ईश्वर अपने भक्तों के माध्यम से कई बार लीला रचते हैं ताकि सत्ता के मद में चूर लोगों की आंखें खुल सकें और वे धर्म के मार्ग पर आ सकें।
बादशाह को स्वप्न और भय के माध्यम से ही सत्य का ज्ञान क्यों हुआ?
जब व्यक्ति पद और शक्ति के मद में अंधा हो जाता है, तो तर्क या विनय की भाषा उसे समझ नहीं आती। अवचेतन मन में आया हुआ स्वप्न और भय व्यक्ति के कठोर अहंकार को चोट पहुँचाता है और उसे आत्म-निरीक्षण के लिए विवश करता है। बादशाह के लिए यह एक 'दैवीय चेतावनी' थी जिसने उसे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह सर्वशक्तिमान नहीं है।
क्या ईश्वर द्वारा बादशाह को भयभीत करना उचित था?
बादशाह का प्राथमिक कर्तव्य न्याय करना और निरपराध की रक्षा करना है। जब शासक अपने कर्तव्य से विमुख होकर केवल भौतिक हानि (तकिये की चोरी) को महत्व देता है, तो प्रकृति उसे सुधारने के लिए दंडित करती है। यह भय बादशाह को नष्ट करने के लिए नहीं, अपितु उसे सही मार्ग पर लाने के लिए था, जिससे भविष्य में वह किसी अन्य साधु या निर्दोष के साथ अन्याय न करे।
एक स्वप्न को सत्य मानकर किसी को मुक्त करना क्या बादशाह की अंधविश्वासी मानसिकता नहीं है?
बादशाह ने केवल स्वप्न पर विश्वास नहीं किया, अपितु उसने कारागार के द्वार खुलने की प्रत्यक्ष घटना को भी देखा था। जब स्वप्न और जाग्रत अवस्था के प्रमाण एक ही दिशा में संकेत करते हैं, तो उसे स्वीकार करना बुद्धिमानी है, अंधविश्वास नहीं। यह बादशाह की ग्रहणशीलता थी कि उसने संकेतों को समझा और अपने निर्णय में सुधार किया, जो एक कुशल प्रशासक का गुण है।
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