परेशानी मुक्त जीवन व स्वास्थ्य के लिए अथर्ववेद मंत्र

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परेशानी मुक्त जीवन व स्वास्थ्य के लिए अथर्ववेद मंत्र

यदग्निरापो अदहत्प्रविश्य यत्राकृण्वन् धर्मधृतो नमांसि ।

तत्र त आहुः परमं जनित्रं स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन् ॥१॥

यद्यर्चिर्यदि वासि शोचिः शकल्येषि यदि वा ते जनित्रम् ।

ह्रूडुर्नामासि हरितस्य देव स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन् ॥२॥

यदि शोको यदि वाभिशोको यदि वा राज्ञो वरुणस्यासि पुत्रः ।

ह्रूडुर्नामासि हरितस्य देव स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन् ॥३॥

नमः शीताय तक्मने नमो रूराय शोचिषे कृणोमि ।

यो अन्येद्युरुभयद्युरभ्येति तृतीयकाय नमो अस्तु तक्मने ॥४॥

मंत्र 1
हे तक्ष्मन् (ज्वर)! तुम्हारा उद्गम अग्नि, जल और दैवी शक्तियों से जुड़ा है। ज्ञानी तुम्हारे मूल को जानते हैं। अब तुम हमें छोड़कर अपने स्थान को लौट जाओ।

मंत्र 2
यदि तुम अग्नि की ज्वाला में रहते हो, प्रकाश में रहते हो, या किसी अन्य स्रोत से उत्पन्न हुए हो — हम तुम्हारे स्वरूप को जानते हैं। इसलिए हमें छोड़ दो।

मंत्र 3
यदि तुम दुःख, क्लेश या दैवी कारणों से उत्पन्न हुए हो, तब भी हम तुम्हें पहचानते हैं। तुम यहाँ से दूर हो जाओ।

मंत्र 4
शीत ज्वर, उष्ण ज्वर, प्रतिदिन आने वाला ज्वर, एक दिन छोड़कर आने वाला ज्वर, या तीसरे दिन आने वाला ज्वर — सभी प्रकार के ज्वर को नमस्कार करके दूर भेजते हैं।


क्या इस मंत्र को सुनने के लिए दीक्षा आवश्यक है?

नहीं। दीक्षा केवल तब आवश्यक होती है जब आप मंत्र साधना करना चाहते हैं, सुनने के लिए नहीं।

लाभ प्राप्त करने के लिए बस हमारे द्वारा दिए गए मंत्रों को सुनना पर्याप्त है।

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