धरती पर भी एक स्वर्ग हुआ करता था

क्या आपको पता है, एक नहीं, दो कुरुक्षेत्र हैं?

भारतवर्ष में जो है, वह एक कुरुक्षेत्र है। एक कुरुक्षेत्र शृङ्गगिरि के उत्तर में हुआ करता था। इसे उत्तर कुरु कहते थे। शृङ्गगिरि नेपाल में है। ब्रह्माण्ड-पिण्डांड इस तत्व के अनुसार, जो कुछ भी पृथ्वी-अंतरिक्ष-स्वर्ग नामक दिव्य त्रिलोक में होता है, ठीक वही भौमत्रिलोक में भी होगा। ठीक वही उदरगुहा-उरोगुहा-शिरोगुहा, इन तीनों से बना हुआ मनुष्य शरीर रूपी त्रिलोक में भी होगा।

भौमत्रिलोक क्या है? एशिया। दक्षिण समुद्र से हिमालय तक पृथ्वी। हिमालय से मंगोलिया तक अंतरिक्ष। मंगोलिया से उत्तर समुद्र तक अंतरिक्ष। इसका अर्थ यह नहीं है कि आकाश में स्वर्ग नहीं है। वैदिक काल में, वैदिक युग में, भूमि में उसके साथ-साथ स्वर्ग हुआ करता था। अगर वेद में कुछ ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में बताया गया है, तो वे घटनाएं पृथ्वी पर भी हुई हैं, समानांतर रूप से। एक पिक्चर रिलीज होती है, वह एक साथ ही लखनऊ में भी चलती है और मुंबई में भी चलती है, सौ जगहों पर एक साथ चलती है। इसी प्रकार, वेद में अगर बताया है कि देवों और असुरों के बीच संग्राम हुआ, तो वह संग्राम धरती पर भी हुआ रहेगा, कब? वैदिक काल में।

वैदिक काल का स्वर्ग भूमि में कहां हुआ करता था? आज हम जिस प्रदेश को साइबेरिया कहते हैं, वहां, रूस में। और असुर जाति कहां रहती थी? अफ्रीका में। ऐसा मत सोचिए आज के रूसी देव हैं और अफ्रीका वाले असुर हैं। बहुत पहले की बात है यह। उसके बाद बहुत कुछ बदला है। देवों ने सबसे पहले अग्निविद्या का प्रयोग किया। उन्होंने अग्नि की शक्ति को, यज्ञ की शक्ति को समझा और यज्ञ द्वारा असुरों को पराजित किया। असुर केवल शारीरिक बल पर ही विश्वास रखते थे। इस दृष्टिकोण से अगर देखा जाए, तो आजकल हम सुरक्षा जैसे मामलों में दैवी शक्ति को उपयोग में लाने का सोचते ही नहीं हैं। पहले जैसे असुर करते थे, वैसे हम भी करने लगे हैं।

तो वैदिक काल का धरती पर स्वर्ग था साइबेरिया, और असुरों का देश था अफ्रीका। जैसे वेद में बताया है ब्रह्मलोक, विष्णुलोक और इंद्रलोक, ये तीनों पृथ्वी पर भी विद्यमान थे, पामीर से उत्तर की ओर। पामीर का प्राचीन नाम था प्राङ्मेरु। इन्हें त्रिविष्टप कहते हैं। यह वेद का शब्द है। भूदेवों ने इन तीनों के विष्टपों के बीच यज्ञ वेदी बनाकर बड़े-बड़े यज्ञ करते थे। इन देवों को पहले स्वर्ग को प्राप्त किया ही यज्ञ द्वारा। ये भूदेव हैं, मानव हुआ करते थे। यज्ञ द्वारा अपने आप को पवित्र करके उन्होंने स्वर्ग को प्राप्त किया। इन सब का प्रमाण आपको कई जगहों पर मिलेंगे, आपस्तंब धर्म सूत्र।

भास्कराचार्य जी सिद्धांत शिरोमणि में कहते हैं:
लङ्का कुमध्ये यमकोटिरस्याः प्राक् पश्चिमे रोमकपत्तनं च ।
अधस्ततः सिद्धपुरं सुमेरुः सौम्येऽथ याम्ये वडवानलश्च ॥
कुवृत्तपादान्तरितानि तानि स्थानानि षड्गोलविदो वदन्ति ।
वसन्ति मेरौ सुरसिद्धसङ्घा और्वे च सर्वे नरकाः सदैत्याः ॥

महत्वपूर्ण बात यह है कि कल्पादि से कल्पांत तक दिव्य त्रिलोक शाश्वत है, पर भौमत्रिलोक चंद समय के लिए ही है।

महाभारत के भीष्म पर्व में भी इस उत्तर कुरुक्षेत्र या स्वर्गीय कुरुक्षेत्र का उल्लेख है। देवता लोग यहां यज्ञ करते थे, इसलिए इसका नाम भी कुरुक्षेत्र बन गया, उत्तर कुरुक्षेत्र।
कुरुक्षेत्रं वै देवानां देवयजनमास
कजाकिस्तान में एक झील है, बाल्काश झील। यहां पर उस समय की सरस्वती नदी थी, प्राचीन सरस्वती। रूसी भाषा में आज भी इस इलाके को Semirechye कहते हैं, इसका अर्थ है सप्त नदी, जो सप्त नदी भारतवर्ष में भी है। यज्ञ के अंत में उसके फल को प्राप्त करने अवभृत स्नान करते हैं। वैदिक काल के भूदेव इस प्राचीन सरस्वती में अवभृत स्नान किया करते थे।

सिंधु नदी मानसरोवर के पास से निकलकर कराची के दक्षिण में अरब सागर में आकर मिलती है। उस जमाने में सिंधु के पश्चिम में पश्चिमी भारतवर्ष, कहां तक? सिंधु से मेडिटेरेनियन समुद्र तक। मेडिटेरेनियन का नाम था मही सागर। सिंधु से पूर्व में पूर्व समुद्र तक पूर्वी भारतवर्ष, ताइवान तक। आज भी देखिए, ताइवान के राजा की उपाधि है राम।

और इस दिशा में, दक्षिण समुद्र से हिमालय तक, हिमालय में कहां तक? लाहौल स्पीति तक। यह है असली भारतवर्ष, ईरान से ताइवान तक, और दक्षिण सागर से हिमालय तक।

वसिष्ठजी का आश्रम सिंधु के पश्चिमी किनारे में था। इसके पास भी एक सरस्वती नदी है। पूर्वी भारतवर्ष में कुरुक्षेत्र में भी एक सरस्वती है। अफगानिस्तान का बल्ख शहर वरुण देव की राजधानी थी।

तो अभी तक हमने दो कुरुक्षेत्रों के बारे में देखा, एक सूर्यमंडल वाला और एक भूमि के स्वर्ग में।

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