
हमने व्यापारी और महात्मा की कथा में सुना था कि राम जी ने भी नवरात्र व्रत का आचरण किया। कब किया और कैसे किया, यह व्यास जी हमें विस्तार से बताते हैं। इसी के साथ संक्षेप रूप में व्यास जी रामायण को भी देवी भागवत के अंदर बताते हैं। अयोध्या में सूर्यवंश के राजा दशरथ राज किया करते थे। उनकी तीन पत्नियाँ थीं। कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा। कौशल्या के पुत्र थे श्री राम जी। कैकेयी के भरत और सुमित्रा के दो पुत्र थे, लक्ष्मण और शत्रुघ्न। एक बार विश्वामित्र मुनि राम और लक्ष्मण को अपने यज्ञ की रक्षा करने के लिए ले गए थे। रास्ते में जाते-जाते राम जी ने ताटका नामक राक्षसी का वध कर दिया। राम जी ने सुबाहु का भी वध किया और मारीच को अपने बाणों से दूर फेंक के यज्ञ की रक्षा की। फिर जनकपुरी में शिव धनु को तोड़ने से राम जी ने जनक नंदिनी सीता जी से स्वयंवर कर लिया। लक्ष्मण ने भी सीता की बहन उर्मिला से विवाह कर लिया। भरत और शत्रुघ्न ने भी राजा कुशध्वज की पुत्रियां मांडवी और श्रुतकीर्ति से विवाह कर लिया। महाराज दशरथ ने अपने पहले पुत्र श्रीराम जी को राजा बनाने का सोचा। तब कैकेयी ने उनसे दो वचन मांगे। पहला था कि उनके पुत्र भरत को राजा बनाया जाए और दूसरा था कि राम जी को 14 वर्षों के लिए वनवास भेजा जाए। राम जी भी पिता के आज्ञा के अनुसार लक्ष्मण और सीता के साथ दंडकारण्य में वनवास करने चले गए। दशरथ ने भी इस शोक के कारण देह त्याग कर दिया। भरत ने भी राम जी से अन्याय ना करने की इच्छा से राज्य को स्वीकार नहीं किया। एक दिन रावण की सहोदरी शूर्पणखा ने राम जी से विवाह करने की इच्छा रखी। लक्ष्मण ने उसका नाक काटकर उसको कुरूप बना दिया। रावण ने राम जी को मारने के लिए खर, दूषण आदि राक्षसों को भेजा। राम जी ने उन सबका संहार कर दिया। फिर रावण ने माया से मारीच को हिरण जैसे वेश धारण करा के राम जी के पास भेजा। सीता को उस हिरण ने आकर्षित कर लिया। सीता की इच्छा से राम जी भी उसे पकड़ने के लिए उसका पीछा करते चले गए। राम जी ने अपने बाण से मारा तो मारिच राम जी के आवाज में चिल्लाया। लक्ष्मण, मैं मारा गया हूं, मुझे बचाओ। इसको सुनकर सीता ने लक्ष्मण को जाकर उन्हें बचाने के लिए कहा। लक्ष्मण ने कहा कि राम जी ने मुझे कहा है कि मैं आपकी रक्षा करूं और उनके आने तक आपको छोड़कर कहीं ना जाऊं। इस भूमि में श्री राम को मारने की क्षमता किसी में भी नहीं है। आप निश्चिंत रहिए। सीता ने कहा, मैं अपने पति राम के बिना जी नहीं पाऊंगी। उनको कुछ नहीं होना चाहिए। तुम जाओ। और उनको वापस लेकर आओ। अगर उनको कुछ हुआ तो मैं भी अपना प्राण त्याग दूंगी। लक्ष्मण भी सीता के इन दुखपूर्वक वचनों को सुनकर राम जी को ढूंढते हुए वन के तरफ चले गए। उस समय रावण एक साधु के वेश में सीता के पास आया। सीता ने उसे कोई सन्यासी समझकर आदर और भिक्षा प्रदान किया। सीता ने उसे अपना सारा वृत्तांत भी एक दिव्य साधु समझकर सुनाया। फिर रावण ने सीता का अपहरण करने के लिए उनका हाथ पकड़ लिया और बताया कि मैं रावण हूं। तुम्हारे पति ने मेरे लोगों को मारा है। मेरी बहन शूर्पणखा का भी अपमान किया है। इस कारण मैं आज तुम्हारा अपहरण कर रहा हूं। श्री जगदंबा ये नमः।
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