कृणुष्व पाजः प्रसितिं न पृथ्वीं याहि राजेवामवाꣳ इभेन ।
तृष्वीमनु प्रसितिं द्रूणानो ऽस्तासि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः ॥
हे अग्निदेव! अपनी शक्ति को प्रकट करो और पृथ्वी की तरह अपने प्रभाव-क्षेत्र को विस्तृत करो। एक शक्तिशाली राजा की भाँति अपने सेवकों (या हाथियों) के साथ आगे बढ़ो। अपने विनाशकारी आक्रमण का अनुसरण करते हुए, तुम एक धनुर्धर हो, अतः राक्षसों को अपने अत्यंत ज्वलंत और तापयुक्त बाणों से बींध डालो।
इस मन्त्र में ऋषि अग्निदेव का आवाहन एक पराक्रमी योद्धा के रूप में कर रहे हैं। अग्नि की शक्ति की तुलना पृथ्वी की व्यापकता से की गई है, जिसका अर्थ है कि जैसे पृथ्वी सर्वव्यापी है, वैसे ही अग्नि का प्रभाव भी हर जगह हो, जिससे कोई भी दुष्ट शक्ति बच न सके। 'राजा इव अमवान् इभेन' की उपमा अग्नि को एक ऐसे सम्राट के रूप में दर्शाती है जो अपनी पूरी सेना के साथ विजय के लिए कूच कर रहा हो। अग्नि की लपटों को 'तपिष्ठैः' अर्थात सबसे तप्त बाणों के समान बताया गया है, जो राक्षसों और नकारात्मक शक्तियों का निश्चित रूप से संहार करने में सक्षम हैं। यह केवल भौतिक शत्रुओं के विनाश की प्रार्थना नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक और मानसिक बाधाओं को दूर करने का भी प्रतीक है।
तव भ्रमास आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः ।
तपूꣳष्यग्ने जुह्वा पतंगानसंदितो वि सृज विष्वगुल्काः ॥
हे अग्नि! तुम्हारी ज्वालाएं तीव्रता से चहुँओर फैलती हैं। अपनी प्रज्वलित दीप्ति से तुम निर्भीकतापूर्वक उनका स्पर्श करते हो (जिन्हें भस्म करना है)। हे अग्निदेव! अपनी ज्वाला-रूपी जिह्वा से इन उड़ते हुए पतंगों (शत्रुओं) पर प्रहार करो और बिना किसी बंधन के चारों दिशाओं में अपनी चिंगारियों को उल्काओं की तरह फेंको।
इस मन्त्र में अग्नि की गति और तीव्रता का वर्णन है। 'भ्रमास आशुया पतन्ति' का अर्थ है कि अग्नि की लपटें या ज्वालाएं भ्रमित करने वाली गति से चारों ओर फैलती हैं, जिससे शत्रु को संभलने का अवसर नहीं मिलता। अग्नि को 'शोशुचानः' अर्थात अत्यंत देदीप्यमान कहा गया है, जो अपने प्रकाश और ताप से सब कुछ भस्म कर सकता है। यहाँ शत्रुओं की तुलना 'पतंगों' से की गई है, जो अग्नि की ओर आकर्षित होकर स्वयं ही नष्ट हो जाते हैं। ऋषि प्रार्थना करते हैं कि अग्नि अपनी विनाशक चिंगारियों को उल्काओं की तरह हर दिशा में फैला दें ताकि कोई भी दुष्ट शक्ति कहीं भी छिप न सके।
प्रति स्पशो वि सृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्या अदब्धः ।
यो नो दूरे अघशꣳसो यो अन्त्यग्ने माकिष्ट व्यथिरादधर्षीत् ॥
हे अग्नि! अपने गुप्तचरों (ज्वालाओं) को चारों ओर भेजो और अत्यंत शीघ्रता करो। इस प्रजा के ऐसे रक्षक बनो जिसे कोई धोखा न दे सके। जो कोई भी दुष्ट और पापपूर्ण बातें करने वाला शत्रु हमसे दूर हो या समीप हो, हे अग्नि! उनमें से कोई भी हमें कष्ट न पहुँचा सके और हम पर आक्रमण करने का साहस न कर सके।
इस मन्त्र में अग्नि की ज्वालाओं को 'स्पशः' अर्थात गुप्तचर कहा गया है। जैसे एक राजा के गुप्तचर राज्य में घूमकर शत्रुओं का पता लगाते हैं, वैसे ही अग्नि की ज्वालाएं हर कोने में जाकर दुष्ट शक्तियों का पता लगा लेती हैं। अग्नि को 'अदब्धः पायुः' अर्थात एक ऐसा रक्षक बनने के लिए कहा गया है जिसे कोई भी छल या कपट से पराजित नहीं कर सकता। ऋषि प्रार्थना करते हैं कि चाहे शत्रु दूर हो ('दूरे') या पास ('अन्ति'), चाहे वह गुप्त हो या प्रकट, अग्निदेव अपनी शक्ति से उन सभी को निष्क्रिय कर दें ताकि वे यजमान को कोई हानि न पहुँचा सकें।
उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्व न्यमित्राꣳ ओषतात्तिग्महेते ।
यो नो अरातिꣳ समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यतसं न शुष्कम् ॥
हे तीक्ष्ण अस्त्रों वाले अग्निदेव! उठो, हमारे सामने प्रकट होओ और अपनी शक्ति का विस्तार करो। शत्रुओं को सर्वथा जला डालो। हे समिधा से प्रदीप्त होने वाले देव! जिस शत्रु ने हमें हानि पहुँचाने का कर्म किया है, उसे नीचे गिराकर उसी प्रकार जला दो जैसे सूखी घास को जलाया जाता है।
इस मन्त्र में अग्नि से प्रत्यक्ष रूप में सक्रिय होने की प्रार्थना है। 'उदग्ने तिष्ठ' का अर्थ है कि हे अग्नि, अब आप शांत न रहें, उठ खड़े हों और हमारे रक्षण के लिए तैयार हो जाएं। 'तीग्महेते' (तीक्ष्ण अस्त्रों वाले) विशेषण अग्नि की विनाशक शक्ति को दर्शाता है। ऋषि कहते हैं कि जो भी शत्रु ('अरातिम्') उनके विरुद्ध षड्यंत्र करता है या उन्हें कष्ट देता है, अग्नि उसे उसी तरह सहजता से भस्म कर दें जैसे आग सूखी घास के ढेर को पल भर में राख कर देती है। यह अग्नि की तत्काल और संपूर्ण विनाश करने की क्षमता पर विश्वास का प्रतीक है।
ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने ।
अव स्थिरा तनुहि यातुजूनां जामिमजामिंप्र मृणीहि शत्रून् ॥
हे अग्नि! ऊँचे उठो (प्रकट होओ) और हमारे शत्रुओं को बींध डालो। अपनी दिव्य शक्तियों को प्रकट करो। जो राक्षस और जादू-टोना करने वाले हैं, उनके स्थिर धनुषों की प्रत्यंचाओं को उतार दो (उन्हें शक्तिहीन कर दो)। चाहे शत्रु संबंधी ('जामि') हो या गैर-संबंधी ('अजामि'), उन सभी का नाश कर दो।
यहाँ 'ऊर्ध्वो भव' का आवाहन अग्नि की ज्वालाओं को ऊपर उठने और अधिक प्रभावी होने के लिए है। ऋषि अग्नि से अपनी दिव्य शक्तियों ('दैव्यानि') को प्रकट करने की प्रार्थना करते हैं ताकि वे साधारण उपायों से न मरने वाले शत्रुओं का भी नाश कर सकें। 'यातुजूनां स्थिरा अव तनुहि' एक बहुत महत्वपूर्ण पंक्ति है, जिसमें 'यातुजू' अर्थात जादू-टोना करने वालों और राक्षसी शक्तियों का उल्लेख है। उनके 'स्थिर' धनुषों को शक्तिहीन करने का अर्थ है कि उनकी योजनाओं और आक्रमण करने की क्षमता को ही नष्ट कर दिया जाए। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि दुष्टता करने वाला चाहे कोई अपना हो या पराया, उसे दंड अवश्य मिलना चाहिए।
स ते जानाति सुमतिं यविष्ठ य ईवते ब्रह्मणे गातुमैरत् ।
विश्वान्यस्मै सुदिनानि रायो द्युम्नान्यर्यो वि दुरो अभि द्यौत् ॥
हे सबसे युवा (नित्य नवीन) अग्नि! जो यजमान स्तुति करने वाले पुरोहित के लिए मार्ग बनाता है (उसे दान आदि से संतुष्ट करता है), वह तुम्हारी कृपा को जानता है और प्राप्त करता है। स्वामी के समान तुम उस यजमान के लिए धन, यश और सभी शुभ दिनों के द्वार खोल देते हो और उन्हें प्रकाशित करते हो।
अब स्तुति का रुख रक्षक से दाता की ओर मुड़ता है। इस मन्त्र में कहा गया है कि जो यजमान प्रार्थना ('ब्रह्मणे') करने वाले विद्वान का सम्मान करता है और यज्ञ-कर्म को सुगम बनाता है, वही तुम्हारी 'सुमति' अर्थात अनुग्रह को प्राप्त करने का अधिकारी है। अग्नि को यहाँ 'यविष्ठ' (सबसे युवा) कहा गया है, क्योंकि यज्ञ की अग्नि प्रतिदिन नई जलाई जाती है, वह सदा नवीन रहती है। ऐसे समर्पित यजमान के लिए अग्नि एक स्वामी ('अर्यः') की तरह सभी प्रकार के ऐश्वर्य ('रायः'), प्रसिद्धि ('द्युम्नानि') और अच्छे दिनों ('सुदिनानि') के द्वार खोल देते हैं, अर्थात उसका जीवन हर प्रकार से समृद्ध हो जाता है।
सेदग्ने अस्तु सुभगः सुदानुर्यस्त्वा नित्येन हविषा य उक्थैः ।
पिप्रीषति स्व आयुषि दुरोणे विश्वेदस्मै सुदिना सासदिष्टिः ॥
हे अग्नि! वही मनुष्य सौभाग्यशाली और उत्तम दानी होता है, जो तुम्हें अपने घर में नित्य हविष्य और स्तोत्रों द्वारा प्रसन्न करना चाहता है। उसके लिए सभी दिन शुभ होते हैं और उसकी सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं।
यह मन्त्र पिछले मन्त्र के भाव को आगे बढ़ाता है। इसमें बताया गया है कि सच्चा सौभाग्यशाली ('सुभगः') और श्रेष्ठ दानी ('सुदानुर्यः') कौन है। वह वही है जो अपने घर ('दुरोणे') में प्रतिदिन ('नित्येन') हवि ('हविषा') और प्रार्थनाओं ('उक्थैः') से अग्नि की उपासना करता है। ऐसे भक्त के लिए, जो अग्नि को प्रसन्न करने की इच्छा रखता है ('पिप्रीषति'), उसके जीवन के सभी दिन मंगलमय हो जाते हैं और उसकी प्रत्येक इच्छा ('इष्टिः') सरलता से पूरी हो जाती है। यह नित्य उपासना के महत्व को दर्शाता है।
अर्चामि ते सुमतिं घोष्यर्वाक् सं ते वावाता जरतामियं गीः ।
स्वश्वास्त्वा सुरथा मर्जयेमास्मे क्षत्राणि धारयेरनु द्यून् ॥
(हे अग्नि!) मैं तुम्हारे अनुग्रह की स्तुति करता हूँ, और मेरी यह प्रार्थना तुम्हारे सामने उच्च स्वर में घोषित हो। मेरी यह स्तुति तुम्हारे मन को भाए। हम तुम्हें उत्तम घोड़ों और सुंदर रथों से सुसज्जित करें। तुम हमारे लिए प्रतिदिन क्षात्रबल (शक्ति और पराक्रम) को धारण कराओ।
इस मन्त्र में ऋषि अपनी प्रार्थना को सीधे अग्नि तक पहुँचा रहे हैं। 'घोष्यर्वाक्' का अर्थ है कि यह प्रार्थना धीमी नहीं, बल्कि जोर से और स्पष्ट रूप से की जा रही है। ऋषि कामना करते हैं कि उनकी स्तुति ('गीः') अग्निदेव को प्रसन्न करे। वे अग्नि को भौतिक समृद्धि, जैसे अच्छे घोड़े ('स्वश्वा') और अच्छे रथ ('सुरथा') अर्पित करने का संकल्प लेते हैं, जो उस समय धन और शक्ति का प्रतीक थे। इसके बदले में वे अग्नि से प्रार्थना करते हैं कि वे उपासकों में प्रतिदिन ('अनु द्यून्') 'क्षत्राणि' अर्थात बल, तेज और शासन करने की शक्ति प्रदान करें।
इह त्वा भूर्या चरेदुप त्मन् दोषावस्तर्दीदिवाꣳसम् अनु द्यून् ।
क्रीडन्तस्त्वा सुमनसः सपेमाभि द्युम्ना तस्थिवाꣳसो जनानाम् ॥
(हे अग्नि!) इस यज्ञ में प्रचुर हवि तुम तक पहुँचे। हम प्रसन्न मन से खेलते हुए, दिन-रात निरंतर प्रज्वलित रहने वाले तुम्हारी सेवा करें। हम लोगों के बीच यशस्वी होकर तुम्हारी शरण में रहें।
यह एक आत्मीय प्रार्थना है, जिसमें ऋषि अग्नि के साथ एक घनिष्ठ संबंध की कामना करते हैं। वे कहते हैं कि इस यज्ञ में बहुत सारी आहुतियाँ ('भूरि') अग्नि को प्राप्त हों। 'दोषावस्तः' का अर्थ है रात और दिन, अर्थात हम हर समय तुम्हारी सेवा में रहें। 'क्रीडन्तः सुमनसः' का भाव है कि यह सेवा बोझ न लगे, बल्कि हम आनंद और प्रसन्नता के साथ तुम्हारी उपासना करें। अंतिम इच्छा यह है कि हम समाज में यशस्वी ('द्युम्ना तस्थिवांसो जनानाम्') बनें और तुम्हारी कृपा छत्र में रहें।
यस्त्वा स्वश्वः सुहिरण्यो अग्न उपयाति वसुमता रथेन ।
तस्य त्राता भवसि तस्य सखा यस्त आतिथ्यमनुषग्जुजोषत् ॥
हे अग्नि! जो यजमान अच्छे घोड़ों, उत्तम स्वर्ण और धन से युक्त रथ के साथ तुम्हारे पास आता है, तुम उसके रक्षक और मित्र बन जाते हो; जो तुम्हारे आतिथ्य-सत्कार को निरंतर प्रेमपूर्वक करता है।
इस मन्त्र में वैदिक धर्म के लेन-देन या पारस्परिकता के सिद्धांत का सुंदर वर्णन है। जो उपासक अग्नि को अपना सर्वश्रेष्ठ अर्पण करता है - अच्छे घोड़े, सोना, और धन से भरा रथ - अर्थात जो अपनी समृद्धि को देवता के साथ साझा करता है, अग्नि भी उसके प्रति अपना कर्तव्य निभाते हैं। अग्नि ऐसे यजमान के केवल रक्षक ('त्राता') ही नहीं, बल्कि मित्र ('सखा') भी बन जाते हैं। यह दिखाता है कि सच्ची भक्ति और उदारता से देवता के साथ एक व्यक्तिगत और मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किया जा सकता है।
महो रुजामि बन्धुता वचोभिस्तन्मा पितुर्गोतमादन्वियाय ।
त्वं नो अस्य वचसश्चिकिद्धि होतर्यविष्ठ सुक्रतो दमूनाः ॥
मैं अपने वचनों से (आपसे) इस महान रिश्तेदारी को पुनः स्थापित करता हूँ, जो मुझे मेरे पिता गोतम से विरासत में मिली है। हे यज्ञ के होता, हे नित्य युवा, हे उत्तम कर्म वाले, हे घर के स्वामी अग्नि! तुम हमारे इन वचनों को समझो और स्वीकार करो।
यह मन्त्र एक व्यक्तिगत स्पर्श देता है। ऋषि यहाँ अपने पूर्वज 'गोतम' का उल्लेख करते हैं, जो एक प्रसिद्ध वैदिक ऋषि थे और जिनका अग्नि के साथ विशेष संबंध था। ऋषि कहते हैं कि मैं उसी वंशानुगत भक्ति और संबंध ('बन्धुता') को अपनी प्रार्थनाओं ('वचोभिः') के माध्यम से फिर से जागृत कर रहा हूँ। वह अग्नि को विभिन्न उपाधियों - 'होतर्' (देवताओं का आवाहन करने वाला), 'यविष्ठ' (सबसे युवा), 'सुक्रतो' (श्रेष्ठ कर्मों वाला) और 'दमूनाः' (घर का स्वामी) - से संबोधित करते हुए कहते हैं कि आप हमारे इस वंश-परंपरागत निवेदन को समझें और इसका मान रखें।
अस्वप्नजस्तरणयः सुशेवा अतन्द्रासो ऽवृका अश्रमिष्ठाः ।
ते पायवः सध्रियञ्चो निषद्याऽग्ने तव नः पान्त्वमूर ॥
हे कभी न भ्रमित होने वाले अग्नि! तुम्हारी जो रक्षक ज्वालाएं हैं, वे कभी सोती नहीं, वे शीघ्रता से कार्य करती हैं, परम कल्याणकारी हैं, आलस्य रहित हैं, किसी को हानि नहीं पहुँचाती (केवल दुष्टों को छोड़कर), और कभी थकती नहीं हैं। वे एक साथ मिलकर हमारी रक्षा के लिए बैठें और हमारा पालन करें।
यहाँ अग्नि की रक्षक शक्तियों, अर्थात उनकी ज्वालाओं के गुणों का वर्णन है। वे 'अस्वप्नजः' (न सोने वाली), 'अतन्द्रासः' (आलस्यहीन) और 'अश्रमिष्ठाः' (न थकने वाली) हैं, जिसका अर्थ है कि अग्नि की सुरक्षा चौबीसों घंटे उपलब्ध है। वे 'तरणयः' (तेज) और 'सुशेवाः' (कल्याणकारी) हैं। 'अवृकाः' का अर्थ है 'भेड़ियों की तरह हिंसक नहीं', जो यह दर्शाता है कि वे भक्तों के लिए सौम्य हैं। ऋषि प्रार्थना करते हैं कि ये सभी शक्तिशाली और सतर्क रक्षक ज्वालाएं एक साथ ('सध्रियञ्चो') मिलकर उनकी रक्षा करें।
ये पायवो मामतेयं ते अग्ने पश्यन्तो अन्धं दुरितादरक्षन् ।
ररक्ष तान्त् सुकृतो विश्ववेदा दिप्सन्त इद्रिपवो ना ह देभुः ॥
हे अग्नि! तुम्हारे जिन रक्षक ज्वालाओं ने अंधकार में देखते हुए 'मामतेय' (ममता के पुत्र) को पाप से बचाया था, उन सत्कर्मी रक्षकों की तुमने भी रक्षा की। सब कुछ जानने वाले (तुमने यह सुनिश्चित किया कि) उन्हें हानि पहुँचाने की इच्छा रखने वाले शत्रु उन्हें धोखा न दे सकें।
यह मन्त्र एक प्राचीन घटना का संदर्भ देता है, जिसमें अग्नि की रक्षक शक्तियों ने 'मामतेय' नामक किसी ऋषि को किसी बड़े संकट ('दुरितात्') से बचाया था, जब वह अंधकार में फँस गए थे। यहाँ अग्नि को 'विश्ववेदाः' (सब कुछ जानने वाला) कहा गया है। इस घटना का उल्लेख करके ऋषि यह विश्वास पुष्ट कर रहे हैं कि जैसे तुमने अतीत में अपने भक्तों की रक्षा की थी, वैसे ही आज भी करो। यह बताता है कि जो दूसरों की रक्षा करते हैं (अग्नि की ज्वालाएं), स्वयं देवता उनकी रक्षा करते हैं और शत्रुओं को सफल नहीं होने देते।
त्वया वयꣳ सधन्यस्त्वोतास्तव प्रणीत्यश्याम वाजान् ।
उभा शꣳसा सूदय सत्यतातेऽनुष्ठुया कृणुह्यह्रयाण ॥
हे सत्य के स्वामी अग्नि! तुम्हारे द्वारा संरक्षित होकर हम धन-धान्य से युक्त हों और तुम्हारे मार्गदर्शन में हम अन्न और बल को प्राप्त करें। हे निष्पाप! निंदा करने वाले और स्तुति करने वाले, दोनों (के फलों) को शीघ्र प्रदान करो और (हमारे कर्मों को) तत्काल सफल बनाओ।
इस मन्त्र में भक्त अग्नि से अपनी भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि की कामना कर रहा है। 'त्वया ऊताः' (तुम्हारे द्वारा रक्षित) होकर हम 'सधन्यः' (धनवान) बनें। 'तव प्रणीति' (तुम्हारे नेतृत्व में) हम 'वाजान्' (अन्न, बल, विजय) प्राप्त करें। 'उभा शंसा सूदय' एक रोचक पंक्ति है, जिसका अर्थ है कि जो हमारी प्रशंसा करता है उसे उसका फल मिले, और जो हमारी निंदा ('शंस') या बुराई करता है, उसे भी उसके कर्म का फल शीघ्र मिले। यह न्याय की प्रार्थना है। 'अह्रयाण' अर्थात जो कुटिल या पापी नहीं है, ऐसे अग्नि से तत्काल कृपा की याचना की गई है।
अया ते अग्ने समिधा विधेम प्रति स्तोमꣳ शस्यमानं गृभाय ।
दहाशसो रक्षसः पाह्यस्मान् द्रुहो निदो मित्रमहो अवद्यात् ॥
हे अग्नि! हम इस समिधा (यज्ञ की लकड़ी) से तुम्हारी सेवा करते हैं। हमारी इस स्तुति को, जो कही जा रही है, स्वीकार करो। क्रूर राक्षसों को जला दो, और हे मित्रों के प्रति उदार देव! हमें द्रोह, निंदा और अपमान से बचाओ।
यह एक समर्पण और प्रार्थना का मन्त्र है। भक्त अग्नि को समिधा अर्पित कर रहा है, जो यज्ञ का एक मूल तत्व है। वह अपनी स्तुति ('स्तोमम्') को स्वीकार करने का निवेदन करता है। इसके बाद वह तीन प्रकार की सुरक्षा मांगता है: पहला, 'अशंसः रक्षसः' अर्थात क्रूर और हिंसक राक्षसों से; दूसरा, 'द्रुहः' अर्थात द्रोह या विश्वासघात से; और तीसरा, 'निदः अवद्यात्' अर्थात निंदा और अपमानजनक बातों से। अग्नि को 'मित्रमहः' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे अपने मित्रों (भक्तों) के प्रति अत्यंत उदार और कृपालु हैं।
रक्षोहणं वाजिनमा जिघर्मि मित्रं प्रतिष्ठमुप यामि शर्म ।
शिशानो अग्निः क्रतुभिः समिद्धः स नो दिवा स रिषः पातु नक्तम् ॥
मैं राक्षसों का नाश करने वाले, बलवान, सुप्रतिष्ठित मित्र और सुख प्रदाता (अग्नि) को प्रज्वलित करता हूँ। यज्ञ कर्मों द्वारा प्रदीप्त और तीक्ष्ण हुए अग्नि हमारी दिन में और रात में भी हिंसा से रक्षा करें।
यहाँ ऋषि स्पष्ट रूप से अग्नि को 'रक्षोहणं' (राक्षसों का हंता) और 'वाजिनम्' (शक्तिशाली) कहकर उनकी स्तुति कर रहे हैं। अग्नि को एक 'सुप्रतिष्ठित मित्र' और 'शर्म' (सुख और शरण) का स्रोत बताया गया है। यज्ञ की आहुतियों और कर्मों ('क्रतुभिः') से अग्नि और भी तीक्ष्ण और शक्तिशाली हो जाते हैं। अंतिम प्रार्थना यह है कि यह प्रज्वलित अग्नि हमारी केवल दिन में ही नहीं, बल्कि रात में भी ('दिवा नक्तम्') सभी प्रकार की हिंसा और हानि ('रिषः') से रक्षा करें।
वि ज्योतिषा बृहता भात्यग्निराविर्विश्वानि कृणुते महित्वा ।
प्रादेवीर्मायाः सहते दुरेवाः शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे ॥
अग्नि अपनी विशाल ज्योति से प्रकाशित होते हैं और अपनी महिमा से सब कुछ प्रकट कर देते हैं। वे दुष्ट राक्षसी मायाओं को नष्ट कर देते हैं। वे राक्षसों का संहार करने के लिए अपने सींगों (ज्वालाओं) को तेज करते हैं।
यह मन्त्र अग्नि के प्रकाशमान स्वरूप का वर्णन करता है। उनका प्रकाश ('ज्योतिषा बृहता') इतना शक्तिशाली है कि वह सभी छिपी हुई वस्तुओं और सत्यों को प्रकट कर देता है। यही प्रकाश 'अदेवीः मायाः' अर्थात आसुरी या राक्षसी भ्रम और छल-कपट को समाप्त करता है। 'शृङ्गे' (सींग) अग्नि की नुकीली और ऊँची उठती हुई ज्वालाओं का प्रतीक हैं, जिन्हें वे राक्षसों पर प्रहार करने ('विनिक्षे') के लिए और भी तेज ('शिशीते') करते हैं। यह अग्नि के ज्ञान-प्रकाश और संहारक शक्ति, दोनों रूपों का चित्रण है।
उत स्वानासो दिवि षन्त्वग्नेस्तिग्मायुधा रक्षसे हन्तवा उ ।
मदे चिदस्य प्र रुजन्ति भामा न वरन्ते परिबाधो अदेवीः ॥
अग्नि के गर्जन करते हुए और तीक्ष्ण अस्त्रों वाले (दूत) स्वर्ग में भी राक्षसों का वध करने के लिए उपस्थित रहें। जब अग्नि अपने हर्ष में होते हैं, तो उनकी ज्वालाएं (शत्रुओं को) तोड़-फोड़ देती हैं। आसुरी शक्तियां और बाधाएं उन्हें रोक नहीं सकतीं।
यह सूक्त का समापन मन्त्र है, जो अग्नि की अपराजेय शक्ति की घोषणा करता है। अग्नि की शक्तियाँ केवल पृथ्वी पर ही नहीं, बल्कि 'दिवि' (स्वर्ग में) भी सक्रिय हैं। 'मदे चित्' का अर्थ है कि जब अग्नि अपनी पूरी शक्ति और आनंद में होते हैं, तो उनकी दीप्ति ('भामा') सभी बाधाओं को चूर-चूर कर देती है। कोई भी आसुरी शक्ति ('अदेवीः परिबाधः') उनके मार्ग में नहीं टिक सकती। यह एक पूर्ण आश्वासन है कि अग्नि की शक्ति सर्वोच्च है और वह अपने भक्तों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है।
कृणुष्व पाजः प्रसितिं न पृथ्वीं याहि राजेवामवाꣳ इभेन ।
तृष्वीमनु प्रसितिं द्रूणानो ऽस्तासि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः ॥
तव भ्रमास आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः ।
तपूꣳष्यग्ने जुह्वा पतंगानसंदितो वि सृज विष्वगुल्काः ॥
प्रति स्पशो वि सृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्या अदब्धः ।
यो नो दूरे अघशꣳसो यो अन्त्यग्ने माकिष्ट व्यथिरादधर्षीत् ॥
उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्व न्यमित्राꣳ ओषतात्तिग्महेते ।
यो नो अरातिꣳ समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यतसं न शुष्कम् ॥
ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने ।
अव स्थिरा तनुहि यातुजूनां जामिमजामिंप्र मृणीहि शत्रून् ॥
स ते जानाति सुमतिं यविष्ठ य ईवते ब्रह्मणे गातुमैरत् ।
विश्वान्यस्मै सुदिनानि रायो द्युम्नान्यर्यो वि दुरो अभि द्यौत् ॥
सेदग्ने अस्तु सुभगः सुदानुर्यस्त्वा नित्येन हविषा य उक्थैः ।
पिप्रीषति स्व आयुषि दुरोणे विश्वेदस्मै सुदिना सासदिष्टिः ॥
अर्चामि ते सुमतिं घोष्यर्वाक् सं ते वावाता जरतामियं गीः ।
स्वश्वास्त्वा सुरथा मर्जयेमास्मे क्षत्राणि धारयेरनु द्यून् ॥
इह त्वा भूर्या चरेदुप त्मन् दोषावस्तर्दीदिवाꣳसम् अनु द्यून् ।
क्रीडन्तस्त्वा सुमनसः सपेमाभि द्युम्ना तस्थिवाꣳसो जनानाम् ॥
यस्त्वा स्वश्वः सुहिरण्यो अग्न उपयाति वसुमता रथेन ।
तस्य त्राता भवसि तस्य सखा यस्त आतिथ्यमनुषग्जुजोषत् ॥
महो रुजामि बन्धुता वचोभिस्तन्मा पितुर्गोतमादन्वियाय ।
त्वं नो अस्य वचसश्चिकिद्धि होतर्यविष्ठ सुक्रतो दमूनाः ॥
अस्वप्नजस्तरणयः सुशेवा अतन्द्रासो ऽवृका अश्रमिष्ठाः ।
ते पायवः सध्रियञ्चो निषद्याऽग्ने तव नः पान्त्वमूर ॥
ये पायवो मामतेयं ते अग्ने पश्यन्तो अन्धं दुरितादरक्षन् ।
ररक्ष तान्त् सुकृतो विश्ववेदा दिप्सन्त इद्रिपवो ना ह देभुः ॥
त्वया वयꣳ सधन्यस्त्वोतास्तव प्रणीत्यश्याम वाजान् ।
उभा शꣳसा सूदय सत्यतातेऽनुष्ठुया कृणुह्यह्रयाण ॥
अया ते अग्ने समिधा विधेम प्रति स्तोमꣳ शस्यमानं गृभाय ।
दहाशसो रक्षसः पाह्यस्मान् द्रुहो निदो मित्रमहो अवद्यात् ॥
रक्षोहणं वाजिनमा जिघर्मि मित्रं प्रतिष्ठमुप यामि शर्म ।
शिशानो अग्निः क्रतुभिः समिद्धः स नो दिवा स रिषः पातु नक्तम् ॥
वि ज्योतिषा बृहता भात्यग्निराविर्विश्वानि कृणुते महित्वा ।
प्रादेवीर्मायाः सहते दुरेवाः शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे ॥
उत स्वानासो दिवि षन्त्वग्नेस्तिग्मायुधा रक्षसे हन्तवा उ ।
मदे चिदस्य प्र रुजन्ति भामा न वरन्ते परिबाधो अदेवीः ॥
नहीं। दीक्षा केवल तब आवश्यक होती है जब आप मंत्र साधना करना चाहते हैं, सुनने के लिए नहीं।
लाभ प्राप्त करने के लिए बस हमारे द्वारा दिए गए मंत्रों को सुनना पर्याप्त है।
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