भारत के उत्तर-मध्य भाग में स्थित यह मंदिर हिन्दू शिल्पकला एवं वास्तुकला के सोने-युग का एक अद्वितीय नमूना है। इसका विशेष महत्व है, न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि कला-इतिहास के अध्ययन में भी।
यह मंदिर उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में, देओघर (Deogarh) नामक स्थान के पास बेतवा नदी की घाटी में स्थित है। पहाड़ियों, जलप्रवाह और शांत वातावरण के बीच यह एक खासी प्रभावशाली उपस्थिति रखता है।
मंदिर का निर्माण लगभग पाँचवीं-छठी शताब्दी ईस्वी के आसपास माना जाता है। यह गुप्त युग की शैली में बना हुआ है और उन कम संख्या में पत्थर-निर्मित मंदिरों में से है जो आज तक अच्छी तरह बचे हैं।
संरचनात्मक एवं शिल्प-कला दृष्टि से इसका स्थान मंदिर निर्माण के इतिहास में बहुत ऊँचा है।
मंदिर एक उंचे मंच (जगति) पर स्थित है, जिस पर कदमों द्वारा चढ़ा जाता है।
केंद्रीय गर्भगृह (संकटस्थल) की योजना चतुर्भुज है, जिसे बाहरी मण्डप एवं उप-श्रीनों द्वारा समृद्ध किया गया था।
पश्चिम-दिशा की ओर मुख है, जिससे सूर्यास्त की किरणें गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए अनुकूल थीं।
गर्भगृह के ऊपर शिखर-विन्यास था, हालांकि उसका अधिकांश भाग आज खंडित है।
बाहरी दीवारों पर श्रृंखलाबद्ध रूप से frieze-पैनल लगे हैं, जिनमें रामायण-महाभारत-कथाएँ, यौवन-प्रेम के दृश्य, दैनिक जीवन के पहलू आदि अंकित हैं।
गर्भगृह के दरवाजे के ऊपर, तथा बाहरी दीवारों में बड़ी-बड़ी उभरी हुई कलाकृतियाँ (‘रिलीफ पैनल’) स्थापित हैं। इनमें से कुछ प्रमुख दृश्य हैं-
गजेन्द्र मोक्ष: हाथी गजेन्द्र की मुक्ति का संस्कार-दृश्य।
नरा-नारायण तपस्या: देव-ऋषि-स्वरूप में बैठे पात्र।
अनन्तशयि विष्णु: सर्प अनन्त पर शयित भगवान विष्णु की मुद्रा।
द्वार तथा उसके उपर की मूर्तियाँ-देवताओं के बीच स्थल-प्रवेश का भाव देते हैं। नदी-देवियाँ गंगा-यमुना भी अपने वाहन सहित द्वार के द्वारस्थ पैनलों में हैं।
‘मिथुन’ अर्थात् यौवन-प्रेम के दृश्य भी यहाँ पाए जाते हैं, जो उस युग के सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों को उजागर करते हैं।
यह मंदिर उत्तर भारतीय नागर-शैली की प्रारंभिक अवस्था दर्शाता है, जिसे आगे आने वाली शताब्दियों में विस्तारित रूप मिला।
शिल्प-कला की दृष्टि से यह उन मंदिरों में है जिन्हें अध्ययन-संसाधन के रूप में प्रमुखता मिली है।
धार्मिक दृष्टि से यह विष्णु-उपासना का केन्द्र रहा है, तथा आर्किटेक्टोनिक दृष्टि से एक आदर्श-मॉडल माना जाता है जिसके अनुरूप बाद के मंदिरों ने विकास किया।
आज मंदिर खंडित स्थिति में है, परन्तु पर्याप्त संरचना बची हुई है जिससे अध्ययन-विचार संभव है। आसपास के क्षेत्र में जैन-मंदिरों एवं अन्य पुरातात्विक अवशेषों की स्थिति भी है, जिससे यह क्षेत्र सांस्कृतिक दृश्य से समृद्ध है।
स्थानीय तथा क्षेत्रीय संरक्षण-उपक्रम द्वारा रख-रखाव किया जा रहा है, ताकि इस अनमोल धरोहर को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखा जा सके।
यदि आप इस मंदिर का आदर्श दर्शन करना चाहते हैं, तो सुबह के समय जाना लाभदायी होगा क्योंकि प्राकृतिक प्रकाश-दृष्टि से शिल्प-स्थिति स्पष्ट दिखती है।
आरामदायक जूते व हल्की पोशाक पहनना उत्तम रहेगा, क्योंकि स्थल प्राकृतिक ढांचे में है और चढ़ाई-उतराई हो सकती है।
मंदिर के अंदर मूर्ति-स्थिति सीमित है; मुख्य आकर्षण बाहरी Relief और वास्तु-रचना ही हैं।
दर्शन के साथ आसपास की घाटी, नदी-किनारा व प्राकृतिक छटा भी देखें — यह एक संपूर्ण अनुभव प्रदान करेगा।
दशावतार मंदिर, देवगढ़ एक मंदिर मात्र नहीं, बल्कि कला-विचार, धार्मिक भक्ति और स्थापत्य-उत्कर्ष का संगम है। यदि आप हिन्दू मंदिरवास्तुकला, गुप्त-युगीन शिल्प और भारत की सांस्कृतिक-धरोहरों में रुचि रखते हैं, तो यह स्थल अवश्य देखने योग्य है।
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