त्रिकोण यंत्र शास्त्र में

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त्रिकोण यंत्र शास्त्र में

साधना शास्त्र के अनुसार, यह संपूर्ण प्रपंच ही शिव शक्तियात्मक है। शिव शुद्ध ज्ञान है तो शक्ति माया। शिवात्मक शुद्ध ज्ञान का ही रूपांतरण है माया रूपी विश्व। जब सृष्टि होती है तो, यह शुद्ध शिव स्वरूपी ज्ञान तत्वों की एक श्रृंखला से होते हुए पंचभूतात्मक प्रपंच में बदल जाता है। सहार में इसका ठीक विपरीत होता है। पंचभूतात्मक विश्व शुद्ध ज्ञान में बदल जाता है। इस ज्ञान को चेतना भी कह सकते हैं, चित्त भी कह सकते हैं। तो चेतना का ही एक परिवर्तित रूप है पंचभूतात्मक पदार्थ। जिसे माया रूपी शक्ति कहते हैं। इसलिए कहा जाता है कि यह प्रपंज महामाया शक्ति का ही भिन्न-भिन्न रूपों से भरा हुआ है। जो खुद ही ज्ञान स्वरूपी शिव का ही रूपांतर है। शिव जब शक्ति में बदलते हैं तो इसे मंत्र शास्त्र में, साधना शास्त्र में अधोमुखी त्रिकोण के रूप में प्रतीकत्व करते हैं। जहां भी जैसे श्री यंत्र में या किसी भी यंत्र में आपको अधोमुखी त्रिकोण यानी जिसका अग्र नीचे की तरफ हो दिखे तो समझे कि वह शक्ति या सृष्टि क्रम का प्रतीक है। जहां ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण दिखे तो समझ लेना कि वो शिव का प्रतीक है, संहार क्रम का। जहां षट्कोण दिखे। एक अधोमुखी और एक ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण से षट्कोण बनता है। वहां शिव और शक्ति दोनों का सामंजस्य है। यानी स्थिति की अवस्था। दोनों की संतुलित अवस्था। जो भी यंत्र हो उसमें देखिए क्या है। अधोमुखी त्रिकोण या ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण या षट्कोण। इससे आपको पता चलेगा कि वह सृष्टियात्मक है या संहारात्मक या स्थित्यात्मक। कई यंत्रों में आपको तीनों मिलेंगे। या इनमें से दो। अर्थात उनका प्रभाव मिश्र होगा। श्री यंत्र नौ त्रिकोणों से बनता है। इसमें भी दो प्रकार हैं। या तो पांच ऊर्थमुखी और चार अधोमुखी या पांच अधोमुखी और चार ऊर्ध्वमुखी। इसमें अगर ऊर्ध्वमुखी अधिक हैं तो वो सहारात्मक है जिसकी उपासना मोक्ष की इच्छा रखने वाले साधक करते हैं। अगर अधोमुखी त्रिकोण अधिक है तो वो संपत्ति इत्यादि भोग प्रदान करने वाला श्री यंत्र है।

 

  • साधना शास्त्र के अनुसार इस दृश्य जगत का मूल स्वरूप क्या है?
    साधना शास्त्र के अनुसार यह संपूर्ण प्रपंच शिव और शक्ति का सम्मिलित रूप है। इसमें शिव शुद्ध ज्ञान अथवा चेतना के प्रतीक हैं और शक्ति उसी ज्ञान का माया रूपी रूपांतरण है। यह दृश्य जगत वास्तव में चेतना का ही पदार्थ रूप में परिवर्तन है।
  • सृष्टि और संहार की प्रक्रिया में तत्वों का संचलन किस प्रकार होता है?
    सृष्टि काल में शुद्ध शिव स्वरूपी ज्ञान विभिन्न तत्वों की श्रृंखला से होते हुए पंच महाभूतों में परिवर्तित हो जाता है। इसके विपरीत, संहार काल में यह पंचभूतात्मक प्रपंच पुनः सूक्ष्म होकर शुद्ध ज्ञान अथवा चेतना में विलीन हो जाता है।
  • यंत्र शास्त्र में अधोमुखी त्रिकोण किस रहस्य को प्रकट करता है?
    जिस त्रिकोण का मुख नीचे की ओर होता है, वह शक्ति का प्रतीक है। यह सृष्टि क्रम को दर्शाता है, जहाँ चेतना नीचे की ओर प्रवाहित होकर पदार्थ और विस्तार का रूप लेती है। यह ऊर्जा के प्रकटीकरण और सृजन का सूचक है।
  • ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
    ऊपर की ओर मुख वाला त्रिकोण शिव का प्रतीक है। यह संहार क्रम अथवा निवृत्ति मार्ग को दर्शाता है। इसका अर्थ है पदार्थ से पुनः शुद्ध चेतना की ओर लौटना। यह साधक की ऊर्ध्वगति और मोक्ष प्राप्ति का संकेत है।
  • षट्कोण की संरचना किन दो अवस्थाओं के सामंजस्य को दर्शाती है?
    जब एक अधोमुखी और एक ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण एक दूसरे में समाहित होते हैं, तो षट्कोण बनता है। यह शिव और शक्ति के पूर्ण संतुलन का प्रतीक है। यह ब्रह्मांड की स्थिति अवस्था को दर्शाता है, जहाँ सृजन और विसर्जन समान वेग में स्थित रहते हैं।
  • श्रीयंत्र की बनावट में त्रिकोणों की संख्या का क्या महत्व है?
    श्रीयंत्र नौ त्रिकोणों के योग से निर्मित होता है। इन त्रिकोणों के विन्यास के आधार पर ही यंत्र की प्रकृति निर्धारित होती है कि वह भोग प्रदाता होगा अथवा मोक्ष प्रदाता।
  • संहारात्मक श्रीयंत्र की पहचान क्या है और इसके साधक कौन होते हैं?
    जिस श्रीयंत्र में पांच ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण और चार अधोमुखी त्रिकोण होते हैं, वह संहारात्मक श्रेणी में आता है। ऐसे यंत्र की उपासना वे मुमुक्षु साधक करते हैं जिनकी एकमात्र इच्छा संसार के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करने की होती है।
  • भौतिक समृद्धि और ऐश्वर्य के इच्छुक साधकों के लिए किस प्रकार का श्रीयंत्र उपयुक्त है?
    जिन साधकों को संपत्ति, ऐश्वर्य और सांसारिक भोग की कामना होती है, उनके लिए वह श्रीयंत्र श्रेष्ठ है जिसमें पांच अधोमुखी त्रिकोण और चार ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण होते हैं। यह सृजनात्मक ऊर्जा की अधिकता के कारण भौतिक उन्नति प्रदान करता है।
  • क्या एक ही यंत्र में सृष्टि, स्थिति और संहार तीनों का प्रभाव हो सकता है?
    हाँ, कई यंत्रों में इन तीनों त्रिकोणों का सम्मिश्रण होता है। यदि किसी यंत्र में अधोमुखी, ऊर्ध्वमुखी और षट्कोण तीनों उपस्थित हों, तो उसका प्रभाव मिश्रित होता है और वह साधक को संतुलित फल प्रदान करता है।
  • माया और शुद्ध ज्ञान के अंतर्संबंध को साधना शास्त्र कैसे समझाता है?
    साधना शास्त्र यह मानता है कि माया शिव से पृथक कोई वस्तु नहीं है। जैसे जल ही बर्फ का रूप ले लेता है, वैसे ही शुद्ध ज्ञान स्वरूप शिव ही शक्ति के माध्यम से जगत के रूप में भासित होते हैं। अतः यह प्रपंच महामाया का ही स्वरूप है जो मूलतः शिव ही है।
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