तारक-माया की कथा

प्राचीन काल में, तारक-माया नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली असुर हुआ। उसकी शक्ति का स्रोत उसकी मांसपेशियाँ या शस्त्र नहीं, अपितु उसका मायाजाल था। अपने छल-कपट से वह मिथ्या को भी पूर्ण सत्य का रूप दे सकता था। वह धुएँ से भव्य नगरों की रचना कर सकता था, परछाइयों से विशाल सेनाएँ खड़ी कर सकता था और यहाँ तक कि आकाश को भी खंड-खंड होकर गिरता हुआ दिखा सकता था।

शीघ्र ही तारक-माया अहंकार में चूर हो गया। उसने स्वर्ग पर आधिपत्य करने की ठानी और देवों पर आक्रमण कर दिया। उसकी माया ने देवताओं को भ्रम के जाल में उलझा दिया। जब देव अपने बाण चलाते, तो वे लक्ष्य से भटक जाते। जब वे वज्र का प्रहार करते, तो वह कहीं और जा गिरता। समस्त ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ गया। सूर्य और नक्षत्रों ने भी अपना तेज खो दिया।

देवगण भयभीत हो उठे। वे जानते थे कि इस संकट से केवल जगत के पालक, भगवान विष्णु ही उनकी रक्षा कर सकते हैं। उन्होंने करबद्ध होकर, नेत्र मूँदकर प्रार्थना की, ‘हे नारायण, हमारी रक्षा करें। आप ही हमारी अंतिम आशा हैं।’

सहसा, सम्पूर्ण ब्रह्मांड में एक गहन शांति छा गई। तूफ़ान थम गए, मेघों का गर्जन मौन हो गया। उसी नीरवता के मध्य से एक दिव्य ज्योतिपुंज प्रकट हुआ और उस प्रकाश से स्वयं भगवान विष्णु प्रकट हुए।

उनका वर्ण वर्षाकालीन मेघों के समान श्याम था। उनके पीताम्बर विद्युत की भाँति दमक रहे थे। उनकी चतुर्भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और धनुष सुशोभित थे। उनके नेत्र शांत और करुणा से परिपूर्ण थे। वे आकाश में स्थित थे, एक ही साथ परम शांत और परम शक्तिशाली।

तारक-माया उन्हें देखकर अट्टहास कर उठा और बोला, ‘विष्णु, तुम मुझसे युद्ध नहीं कर सकते! मैं तुम्हें भी अपने मायाजाल में बंदी बना लूँगा!’ यह कहकर उसने स्वयं के सहस्रों प्रतिरूप रच दिए। हर दिशा में केवल तारक-माया ही दिखाई दे रहा था—और प्रत्येक रूप इतना वास्तविक था कि असली और नकली में भेद करना असंभव था।

किंतु भगवान विष्णु अविचलित रहे। वे न तो क्रोधित हुए और न ही युद्ध के लिए आतुर दिखे। उन्होंने शांति से सभी मायावी रूपों को देखा। उनका सुदर्शन चक्र तीव्र गति से घूमने लगा और स्वयं माया के आवरण को ही छिन्न-भिन्न करने लगा। देखते ही देखते, एक-एक करके सारे मिथ्या रूप विलीन होने लगे, जब तक कि केवल वास्तविक तारक-माया शेष न रह गया।

तब भगवान विष्णु ने अपने पांचजन्य शंख का नाद किया। उसकी दिव्य ध्वनि ब्रह्मांड के कोने-कोने में गूँज उठी। आकाश निर्मल हो गया, अंधकार का लोप हो गया। तारक-माया का भ्रमजाल पूर्णतः टूट चुका था। उसका अहंकार चूर-चूर हो गया। भगवान के देदीप्यमान चक्र ने एक अंतिम बार घुसकर उस असुर की समस्त आसुरी शक्तियों को सदा के लिए नष्ट कर दिया।

देवताओं ने जय-जयकार की। पवन पुनः शीतल हो उठी, सरिताएँ कल-कल कर बहने लगीं और तारे अपने स्थानों पर लौट आए। देवों ने भगवान विष्णु को शीश नवाकर कहा, ‘प्रभु, आपने हमारी रक्षा की!’

भगवान विष्णु मंद-मंद मुस्कुराए और बोले, ‘स्मरण रहे, वास्तविक विजय किसी शत्रु पर नहीं, अपितु स्वयं के भीतर बैठे अज्ञान और अहंकार पर होती है। तारक-माया की शक्ति का आधार उसका अहंकार ही था। जब तुम स्वयं को सबसे श्रेष्ठ समझने लगते हो, तो तुम अपने ही भ्रमजाल की रचना करते हो। सदैव मेरा स्मरण करना, फिर माया तुम्हें कभी अपने बंधन में नहीं बाँध पाएगी।’

इतना कहकर भगवान विष्णु धीरे-धीरे अंतर्धान हो गए। उनका तेज आकाश में विलीन होकर सृष्टि के कण-कण में समा गया—पवन में, जल में, नक्षत्रों में और समस्त प्राणियों के हृदय में।

देवता समझ गए कि यह युद्ध केवल विष्णु और तारक-माया के बीच नहीं था। यह एक लीला थी, एक पाठ था—कि अधर्म का आरम्भ तब होता है, जब हम यह भूल जाते हैं कि इस सृष्टि का सच्चा सूत्रधार कौन है। भगवान विष्णु विनाश के लिए नहीं, अपितु धर्म, संतुलन और शांति की पुनर्स्थापना के लिए युद्ध करते हैं।

और इस प्रकार, ब्रह्मांड में पुनः शांति स्थापित हो गई। लोग भक्ति में लीन हो गए, ऋषि-मुनि वेदों का गान करने लगे और संसार अपनी लय में चलने लगा। सभी यह जान गए कि जब-जब अंधकार की शक्तियाँ प्रबल होंगी, तब-तब भगवान विष्णु अवतार लेंगे—केवल विश्व के उद्धार के लिए नहीं, बल्कि यह स्मरण कराने के लिए कि माया और अहंकार पर सदैव सत्य और आस्था की ही विजय होती है।

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