
श्रद्धारूपी भवानी और विश्वासरूपी शंकर की वन्दना करके श्री तुलसीदासजी फिर से भगवान शंकर की महिमा के बारे में बताते हैं और शंकररूपी अपने गुरु को नमन करते हैं –
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।
यमाश्रितोऽपि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते।।
लोक में टेढ़े लोगों को सम्मान नहीं मिलता। वक्र या कुटिल लोग घृणा ही पाते हैं। लेकिन यहां देखिए – महादेव के मस्तक पर जो चन्द्रमा है वह वक्र है, टेढ़ा है।
शुक्ल पक्ष द्वितीया का चन्द्रमा है वह – बिल्कुल वक्र। लेकिन महादेव के मस्तक पर रहते हुए भी उस चन्द्रमा की पूजा होती है। अन्यत्र अलग से भी उसकी पूजा होती है।
यह कैसे – टेढ़ा होते हुए भी चन्द्रमा की पूजा? यह तो विरोधाभास है – यह कैसे?
एक ही कारण है इसका – 'गुरुं शंकररूपिणं आश्रितः चन्द्रः'।
चन्द्रमा ने महादेव का आश्रय लिया है। वक्र होने पर भी महादेव का आश्रय लेने से चन्द्रमा में पूज्यता आ गई है।
इसी प्रकार तुलसीदासजी चाहते हैं कि – मैं भी शंकरजी का आश्रित हूं, मेरे गुरु हैं शंकरजी, मैं उनका चेला हूं। इस वजह से मेरे द्वारा निर्मित यह मानस भी यश को पाए, भले मेरी बुद्धि वक्र हो, अल्प हो।
'गुरुं शंकररूपिणम्' – तुलसीदासजी के दो गुरुत्व हैं – एक मानस सम्बन्धी और एक मन्त्र सम्बन्धी। इनमें मानस का गुरुत्व भगवान शंकर से चलकर उनके अपने गुरु तक आया है। मन्त्र सम्बन्धी गुरुत्व का उद्गम है साक्षात श्रीरामचन्द्रजी से।
गुरुत्व नित्य है – यह गुरु–शिष्य परंपरा के रूप में आगे बढ़ता ही रहता है।
गीता में कहा गया है – यच्छ्रद्धः स एव सः।
जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह भी उसका अनुरूप हो जाता है। यह गुरु–शिष्य परंपरा ही ऐसी है – शिष्य की गुरु के ऊपर श्रद्धा होने के कारण वह गुरु का अनुरूप बन जाता है, गुरु जैसे ही बन जाता है।
ऐसे चलते-चलते परंपरा का हर गुरु आदि गुरु का ही स्वरूप प्राप्त कर लेता है। यहां पर मानस के आदि गुरु हैं शंकरजी।
और यह गुरु परंपरा नित्य होने के कारण, अखण्ड होने के कारण, श्रद्धा का सिलसिला भी अटूट होने के कारण, तुलसीदासजी के अपने गुरु भी आदि गुरु शंकर के समान हैं, शंकरस्वरूपी हैं।
'भक्ति, भक्त, भगवंत, गुरु' – चार नाम हैं, पर इनका स्वरूप एक ही है।
'यस्य देवे परा भक्ति: यथा देवे तथा गुरौ' – देव भक्ति और गुरु भक्ति एक जैसी ही हैं।
हर गुरु परंपरा की शुरुआत किसी न किसी देवता से ही होती है। और वह परंपरा अटूट होने के कारण, श्रद्धा के कारण, उसके किसी भी समय के गुरु उस देवता के स्वरूपी ही होते हैं – 'यच्छ्रद्धः स एव सः' के अनुसार।
'गुरुर्ब्रह्मा …'
'नामप्रसाद संभु अविनाशी' – शंभु जैसे अविनाशी हैं, वैसे ही गुरु भी अविनाशी हैं, नित्य हैं।
क्योंकि गुरु उस शंभु के ही स्वरूप हैं – 'नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्'।
'बोधमयम्' –
गुरु शब्द का अर्थ –
'गु' शब्दस्त्वन्धकारः
'रु' शब्दस्तन्निरोधकः
'गु' का अर्थ है अन्धकार।
'रु' का अर्थ है – उसका विनाश करने वाला।
अन्धकार क्या है – अज्ञान।
'महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर' – उस महामोह के घोर अन्धकार को विनाश करनेवाले सूर्यकिरणों के समूह हैं गुरु।
'बिनु गुरु होइ कि ज्ञान?'
'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत' – उस ज्ञान के लिए गुरु के पास ही जाएं।
कैसे गुरु –
'समित पाणिः' – जिनके हाथ में समिधा है, यज्ञानुष्ठान करने वाले।
'श्रोत्रियं' – वेदाध्ययन किए हुए।
'ब्रह्मनिष्ठम्' – जो ब्रह्म में स्थित हैं।
तुलसीदासजी कहते हैं – महादेव द्वारा आश्रय दिए जाने पर ही टेढ़े चन्द्रमा को सम्मान मिलता है। मेरे गुरुजी शंकरजी के ही अनुरूप हैं, स्वरूपी हैं। मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनका आश्रय मिला है।
और उनके सहारे से ही मेरी वक्र बुद्धि में मानस का प्रकाश हो रहा है।
तुलसीदासजी ने खुद को चन्द्रमा से क्यों जोड़ा है?
क्योंकि जैसे चन्द्रमा टेढ़ा होते हुए भी शिवजी के मस्तक पर रहने से पूज्य बन गया, वैसे ही तुलसीदास अपनी सीमित बुद्धि के बावजूद अपने गुरु के आश्रय से मान्य बनना चाहते हैं। यह दिखाता है कि आत्मबल से अधिक महत्त्व आश्रय का होता है।
क्या साधक सीमित क्षमताओं के बावजूद सफल हो सकता है?
हाँ, यदि वह सच्चे गुरु के शरण में जाए। जब समर्पण पूर्ण होता है, तो ईश्वर और गुरु उस साधक को उठाकर ले जाते हैं — उसकी सीमा बाधा नहीं बनती।
क्या यह सम्मान केवल संबंध के कारण मिलना उचित है?
हाँ, जब संबंध सच्चा और समर्पित हो, तो उसका प्रभाव भी वैध होता है। केवल गुण नहीं, गुण के स्रोत से जुड़ाव भी सम्मान योग्य होता है।
तुलसीदासजी गुरु को नित्य और शंकरस्वरूप क्यों कहते हैं?
क्योंकि गुरु केवल व्यक्ति नहीं, परंपरा से प्रवाहित होने वाला ज्ञानप्रवाह हैं। वह ज्ञान शंकर से चला है, और गुरु उसी स्वरूप को आगे बढ़ाता है। इसलिए वह नित्य, अखंड और शंकरस्वरूपी है।
क्या हर गुरु को दिव्य मानना चाहिए?
यदि वह गुरु परंपरा का वाहक है, वेद में निपुण है और ब्रह्मनिष्ठ है — तो हाँ, उसे दिव्यता का माध्यम माना जाता है। श्रद्धा से ही वह देवस्वरूप होता है।
क्या यह सोच अंधभक्ति को बढ़ावा नहीं देती?
नहीं, अगर गुरु के लक्षण शास्त्रसम्मत हों। सच्चा गुरु विवेक देता है, मोह नहीं। विश्वास हो लेकिन विवेक के साथ — यही संतुलन आवश्यक है।
गुरु को ‘बोधमय’ क्यों कहा गया है?
क्योंकि वे केवल ज्ञान देने वाले नहीं, स्वयं ज्ञानरूपी होते हैं। जैसे सूर्य अंधकार को नष्ट करता है, वैसे ही गुरु अज्ञान को हटाकर आत्मप्रकाश करते हैं।
सच्चे गुरु की पहचान कैसे करें?
जो वेद में पारंगत हो (श्रोत्रिय), ब्रह्म में स्थित हो (ब्रह्मनिष्ठ), और यज्ञशील हो — वही सच्चा गुरु है। ऐसे लक्षणों से ही हम दिशा पा सकते हैं।
यदि कोई ऐसा गुरु न मिले तो क्या करें?
शुद्ध भावना से प्रयास करते रहना चाहिए। जब साधक तैयार होता है, तब गुरु स्वयं प्रकट होते हैं। तब तक शास्त्र, प्रार्थना और आत्मचिंतन से जुड़े रहना चाहिए।
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