
नैमिषारण्य में सूत जी ऋषियों से कहते है भक्ति ही सारे शास्त्रों का सार है।
तब एक सवाल उठता है। मोक्ष के लिए ज्ञान और वैराग्य बताया है। षट्-संपत्ति: शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान। इन संपत्तियों का विकास होने से ज्ञान और वैराग्य की उत्पत्ति और पोषण होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। वहां तो भक्ति के बारे में नहीं बताया है। भक्ति से ज्ञान और वैराग्य क्या प्राप्त हो सकते हैं? या फिर भक्ति मार्ग दूसरे ग्रंथों में बताए गए मार्ग से भिन्न है क्या? ज्ञान मार्ग से भिन्न है क्या?
भक्ति माँ है और ज्ञान और वैराग्य उनके बच्चे हैं। जैसे नन्हे बच्चे अपनी माँ पर आश्रित रहते हैं वैसे ही ये बच्चे ज्ञान और वैराग्य अपनी माँ भक्ति पर आश्रित रहते हैं। जहां माँ जाती है पल्लू लटके पीछे-पीछे चले जाते हैं दोनों।
एक बार नारद महर्षि ने वृंदावन में एक सुंदर युवती को देखा। उनके साथ दो वृद्ध भी थे जो उनके पुत्र जैसे मालूम पड़ते थे। नारद जी ने पूछा, 'कौन हो तुम और ये तुम्हारे साथ ये दोनों कौन हैं?'
युवती बोली, 'भक्ति हूँ मैं और ये दोनों मेरे बच्चे ज्ञान और वैराग्य। इनके साथ क्या हो गया पता नहीं, मैं इनको लेकर दुखी हूँ। इतने दुर्बल हो गए हैं। कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति। माता की ख़ुशी अपने बच्चों की प्रसन्नता में ही होती है। माता भक्ति का ही सम्मान है वृंदावन में पर ज्ञान और वैराग्य की ओर कोई मुड़कर भी नहीं देख रहा है। इसलिए वे दोनों जीर्ण-शीर्ण हो गए हैं। पुत्र माता को तुच्छ समझकर त्याग सकते हैं लेकिन माता नहीं करेगी कभी। भले पुत्रों से उसकी हानि हो। बच्चा संक्रामक रोग से पीड़ित हो, माँ साथ में ही रहेगी। अपनी हानि नहीं देखेगी। सचमुच देखा जाए तो ज्ञान और वैराग्य भक्ति की हानि करते हैं। ज्ञान-वैराग्य जो हो भक्ति प्रवेशाय उपयोगिता ईषत् प्रथममेवेति नाङ्गत्वमुचितं तयोः। यही कहा गया है। भक्ति तक पहुँचने तक ही सहायता लो। ज्ञान और वैराग्य कभी भक्ति के अंग नहीं बन सकते।
भक्ति दृढ़ हो जाने पर ज्ञान और वैराग्य की आवश्यकता नहीं है। ज्ञान और वैराग्य भक्ति के लिए बाधा बन सकते हैं उसके बाद। आस्था है, श्रद्धा है गणेश जी के ऊपर कि वे विघ्नों के निवारक हैं। लेकिन उसके पीछे पड़ोगे: 'पता तो करो क्या है उनमें कि वे विघ्नों को दूर कर सकते हैं?' पता चल सकता है लेकिन साधन है आपके पास? कोई विद्वान है आपके पास जो इसे स्पष्ट कर देगा? किस ग्रंथ में देखोगे? ये ज्ञान की खोज आगे जाकर आपको बीच में लटका देगा। ये खोज आपकी श्रद्धा को शक्तिहीन कर सकती है, उसका अंत कर सकती है।
पहले गुरुकुलों में उत्तरोत्तर क्रमशः ज्ञान दिया करते थे। आज हमारे पास ये नहीं है। बचे अंग्रेजी के कुछ अधूरे पुस्तक और व्हाट्सएप के कुछ संदेश। इसके भरोसे अध्यात्म ज्ञान की खोज में जाओगे तो जो है उसको भी खो बैठोगे। यूट्यूब में कोई गुरुजी बोलेंगे कि मंदिर पूजा-पाठ के लिए नहीं बने हैं। हमारे मंदिरों में परमाणु शक्ति है। ये सब है ज्ञान के स्रोत आजकल। इनको लेकर आगे बढ़ोगे तो जो श्रद्धा है उसे भी खो बैठोगे।
एक विद्वान कहेगा 'कर्म ही सबकुछ है, कर्म ही फल देता है ईश्वर नहीं। इसे स्थापित करके भी दिखाएगा। दूसरा कहेगा, 'क्यों पत्थर की पूजा करते हो, क्यों पाषाण की पूजा करते हो? ज्ञान ही सबकुछ है।' वो भी स्थापित कर देगा अपने मत को। दोनों सुनने वाला बीच में फंसेगा। ज्ञान से यही होता है।
थोड़ा तो चाहिए ज्ञान। नहीं तो ये कैसे पता चलेगा कि भगवान श्री कृष्ण हैं? पर इस ज्ञान का स्रोत भी सही होना ज़रूरी है। वैराग्य में भी यही बात है। इतना भी विरागी न बन जाएं कि भगवान के प्रति भी वैराग्य हो गया। मोक्ष के प्रति भी वैराग्य हो गया। क्या करना है मोक्ष पाकर?
इसलिए कहते हैं कि जहां भक्ति है वहां ज्ञान और वैराग्य के बारे में सोचने की भी ज़रूरत नहीं है क्योंकि दोनों सही मात्रा में अपने आप आ जाते हैं। सही मात्रा में—न ज़्यादा न कम।
तो वृंदावन में ज्ञान और वैराग्य दुबले-पतले और निर्बल इसलिए हो गए थे कि उनको लेने वाला कोई नहीं था। वहां हर कोई भक्ति की लहर में था। तब भी माता तो माता है। नारद जी ने कहा, 'मैं कुछ करता हूँ।' नारद जी ने उन दोनों को अर्थ सहित वेद सुनाया। उपनिषद सुनाया, गीता सुनाया। कुछ नहीं हुआ। जगह-जगह जाकर तीर्थ से तीर्थ जाकर पूछा नारद जी ने तपस्वियों से, संतों से—कैसे ज्ञान और वैराग्य के शरीर में यौवन और ऊर्जा लाएं। किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। कुछ तो हल निकालना है, माता खिन्न है। नारद जी ने तपस्या करना शुरू कर दी। उनको एक आकाशवाणी सुनाई दी। ये सनकादि कुमारों की आवाज़ थी। 'सफल हो जाएंगे आप। दोनों को श्रीमद् भागवत सुनाइए।'
नारद जी को शंका: कैसे? भागवत में भी वही है—वेदों के तत्व, उपनिषदों के तत्व, गीता के तत्व। ये सब सुनाने के बाद भी कुछ नहीं हुआ।
कुमार बोले, 'शक्कर निकलता है गन्ने से। दोनों की मिठास में फर्क है कि नहीं? गन्ने का सार है शक्कर। वेद, उपनिषद, गीता का सार है भागवत जिसकी मिठास भी ज़्यादा है। निगम कल्पतरोर्गलितं फलम्। वेद नामक कल्पवृक्ष का फल है भागवत—मीठा फल।'
नारद जी ने दोनों को भागवत सुनाया। दोनों तंदुरुस्त हो गए। भक्ति ही मुख्य है। जहां भक्ति है वहां जितना चाहिए उतना ज्ञान और वैराग्य भी आ जाएगा। मोक्ष भी अपने आप आ जाएगा। भक्ति को पाने के लिए ज्ञान और वैराग्य मार्ग हो सकते हैं। ज्ञान और वैराग्य कभी भक्ति के बराबर नहीं हो सकते। भक्ति के बच्चे बनकर उनके आश्रय में रह सकते हैं। यह है भक्ति की महिमा, भक्ति की श्रेष्ठता, भक्ति की प्रधानता।
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