जैसी भावना वैसी सिद्धि

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जैसी भावना वैसी सिद्धि

रामचरितमानस के भाषा का नवम मंगलाचरण। इसमें भी गोस्वामी तुलसीदास जी गुरुचरण के रज का वर्णन करते हैं। 

'जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥।' 

यह गुरु के चरण का रज शिष्य के मन के मैल को हरने वाला है, और इसके तिलक करने से सभी गुणों को अपने वश में करने की शक्ति प्राप्त होती है।

'जनमनमंजु' से यह स्पष्ट होता है कि स्वभावतः मन निर्मल होता है, लेकिन संसार के पापों से घिर जाने के कारण वह मलिन हो जाता है। जब मन की गुरुचरणों में स्थित धूलि पर भक्ति हो जाती है, तब वह स्वभावतः पुनः निर्मल हो जाता है। वह दर्पण की तरह, शीशे की तरह स्वच्छ और चमकदार बन जाता है।

यहाँ एक प्रश्न उठता है — इतनी सी धूलि इतने पापों को कैसे हर सकती है? इसका उत्तर है — जैसी भावना, वैसी सिद्धि। विद्वानों ने कहा है, 'देवे तीर्थ धुजे मंत्रे देव जने भेषजे गुरव आदर्शी भावना यस्य सिद्धिर भवति तादर्शी।'

भगवान में, तीर्थस्थलों में, संतों में, मंत्रों में, ज्योतिष शास्त्र में, वैद्यों में और गुरु में हम जैसी भावना रखते हैं, वही उनके प्रभाव का परिणाम होता है। यदि भावना शुद्ध और श्रद्धामय हो, तो फल भी श्रेष्ठ होता है। इसी भाव से तुलसीदास जी गुरु के चरण की धूलि को अपने गुरु के समान मानते हैं।

इसलिए उनके गुरु के चरण का रज उनके मन के मैल और पापों को हरने की शक्ति रखता है। अब यह संदेह उठता है कि मन स्वतः निर्मल कैसे माना जाए? इसका समाधान है — मन वह स्थान है जहाँ श्रीराम जी निवास करते हैं। सभी के हृदय में राम जी ही विराजमान हैं।

चाहे कोई राम जी का भक्त हो या न हो, चाहे कोई उन्हें मानता हो या न, या जानता हो या नहीं — सभी के मन में वही राम जी बसते हैं। क्योंकि राम जी सर्वव्यापक हैं, इसलिए मन स्वभावतः पवित्र है। राम जी परम कृपालु हैं, जो सबके भीतर व्याप्त हैं।

यहाँ तक कि गुरु के चरण कमलों में विद्यमान धूलि में भी वही राम जी बसे हैं। वे जगत के कण-कण में उपस्थित हैं। इस कारण गुरुचरण की धूलि को प्रणाम करना राम जी को प्रणाम करने के समान है।

'वश्यतिलक' के विषय में कहा गया है कि उसे धारण करने से व्यक्ति दूसरों को अपने वश में कर सकता है। उसी प्रकार गुरुचरण की पवित्र धूलि ने सभी श्रेष्ठ गुणों को अपने वश में कर रखा है। जब उस गुरुचरण रज को तिलक रूप में धारण किया जाता है, तो वे सभी उत्तम गुण हमारे भीतर आ जाते हैं। ऐसे गुरुचरण रज को मेरा नमस्कार।

पिछले मंगलाचरण का दूसरा भाग 'मंजुल मंगल मोदप्रसूति' दर्शाता है कि गुरुचरण की धूलि में सृष्टि करने की शक्ति निहित है। इससे ज्ञात होता है कि यह गुरुचरण रज सृष्टि, स्थिति और संहार — तीनों कार्यों में समर्थ है। वह पापों का विनाश करने, भक्तों की रक्षा करने और जगत को संतुलित रखने की क्षमता रखता है। ऐसे अद्भुत गुरुचरण रज को मेरा नमस्कार।

गुरुचरण की धूलि मन के मैल को कैसे हरती है?
गुरुचरण की धूलि शिष्य के अहंकार और पापों को दूर करती है, क्योंकि यह समर्पण और श्रद्धा का प्रतीक है। जब मन विनम्र होकर गुरु के चरणों में झुकता है, तो उसकी अशुद्धियाँ मिटती हैं और चित्त निर्मल हो जाता है। यही धूलि भक्ति का माध्यम बनती है।

क्या केवल धूलि लगाने से ही मन शुद्ध हो सकता है?
यह केवल धूलि नहीं, बल्कि उसके प्रति श्रद्धा और भाव का प्रभाव है। यदि वही धूलि बिना श्रद्धा के लगाई जाए तो वह साधारण धूलि ही रहती है। भक्ति और समर्पण से वह तपस्वी तत्व बन जाती है।

क्या यह विचार अंधविश्वास नहीं है कि धूलि पाप मिटा सकती है?
यह प्रतीकात्मक सत्य है। भौतिक धूलि नहीं, बल्कि गुरुचरणों की स्मृति और श्रद्धा मन को रूपांतरित करती है। जैसे दीपक का प्रकाश अंधकार मिटाता है, वैसे ही श्रद्धा का प्रकाश भीतर की मलिनता को दूर करता है।


मन को स्वभावतः निर्मल क्यों कहा गया है?
क्योंकि प्रत्येक जीव के भीतर परमात्मा का वास है। मन उसी चेतना का प्रतिबिंब है, जो मूल रूप से शुद्ध और शांत है। संसार के पाप और वासनाएँ उस स्वच्छता को ढक देती हैं।

यदि मन में भगवान का वास है, तो लोग पाप क्यों करते हैं?
क्योंकि अज्ञान से वे अपने भीतर के दिव्य तत्व को पहचान नहीं पाते। जैसे धूल से ढका दर्पण अपनी चमक खो देता है, वैसे ही वासनाओं से ढका मन अपनी शुद्धता खो देता है।

क्या सबके मन में भगवान होना न्यायसंगत है, भले वे उन्हें न मानें?
हाँ, क्योंकि ईश्वर सर्वव्यापक हैं। स्वीकार या अस्वीकार उनका अस्तित्व नहीं बदलता। सूर्य सब पर समान रूप से प्रकाश देता है, चाहे कोई उसकी ओर देखे या नहीं।


‘जैसी भावना वैसी सिद्धि’ का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि मनुष्य की श्रद्धा और दृष्टिकोण ही उसके अनुभवों को गढ़ते हैं। जब भाव पवित्र होता है, तो साधारण वस्तु भी चमत्कारी बन जाती है।

क्या भावना वास्तव में परिणाम को बदल सकती है?
हाँ, क्योंकि भावना ऊर्जा है। जैसे जल का स्वरूप पात्र के अनुसार बदलता है, वैसे ही दिव्यता भी भाव के अनुसार अनुभव होती है। भक्ति से वही गुरुचरण रज साधक को पवित्र कर देती है।

क्या यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव है या आध्यात्मिक सत्य?
यह दोनों स्तरों पर सत्य है। मानसिक रूप से श्रद्धा आत्मविश्वास जगाती है, और आध्यात्मिक रूप से वही भावना चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाती है।


गुरुचरण की रज में सृष्टि, स्थिति और संहार की शक्ति कैसे मानी गई है?
क्योंकि गुरु स्वयं परम तत्व के प्रतिनिधि हैं। उनकी चरणधूलि वह शक्ति है जो ज्ञान का सृजन, अहंकार का विनाश और साधक के जीवन का संतुलन करती है।

क्या यह अतिशयोक्ति नहीं कि धूलि में ब्रह्म की शक्ति है?
नहीं, क्योंकि यह प्रतीक है। धूलि उस विनम्रता का संकेत है जहाँ अहंकार शून्य हो जाता है, और वही अवस्था सृष्टि की मूल ऊर्जा से जुड़ती है।

क्या यह शक्ति सबके लिए समान रूप से कार्य करती है?
नहीं, यह श्रद्धा पर निर्भर करती है। जैसे बीज केवल उपजाऊ भूमि में अंकुरित होता है, वैसे ही यह दिव्य शक्ति केवल श्रद्धामय हृदय में फल देती है।

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