पांच प्रकार के चित्त वृत्तियों में से पहला प्रमाण।
इसके बारे में हम देख रहे हैं।
इसके तीन भेद हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम।
प्रत्यक्ष में इन्द्रियों द्वारा वस्तु के सामान्य गुण और विशेष गुण, ये सब पता चलता है।
अनुमान द्वारा विशेष गुणों का पता नहीं चल सकता है।
आगम में श्रोता को केवल वक्ता के शब्दों द्वारा वस्तु के बारे में पता चलता है।
अब दूसरे प्रकार की चित्त वृत्ति।
विपर्यय।
यह मिथ्याज्ञान है।
कमल को देखकर गुलाब समझना।
एक को देखकर दो समझना।
संशय होना – क्या यह गुलाब है कि कमल, क्या ये तुलसी के पत्ते हैं या और कुछ।
किसी वस्तु का जो सही आकार या स्वभाव है, उसकी जगह पर कुछ और समझ लेना, यह है विपर्यय।
ऐसा क्यों होता है।
चित्त में पांच प्रकार का मल हो सकता है।
अगर चित्त में ऐसा मल है, तो वह सच्चे ज्ञान को बाधित करके उसे मिथ्या ज्ञान बना देता है।
क्या क्या हैं ये मल।
अस्मिता, अविद्या, राग, द्वेष और अभिनिवेश।
इनके बारे में विस्तार से आगे देखेंगे।
अब तीसरी वृत्ति, विकल्प।
इसकी भी उत्पत्ति शब्दों से ही होती है।
पर जिस शब्द को आप सुनते हो, वह शब्द चित्त में कई विकल्पों को उत्पन्न कर देता है।
क्या तुमने उसकी नई इन्नोवा कार देखी।
इसको सुनते ही मन में, चित्त में, कई विकल्प आ जाते हैं।
सफेद रंग की कार, लाल रंग की कार, चांदी के रंग की कार।
उसके घर के सामने खड़ी है।
रोड से जा रही है।
ये वास्तविक नहीं है।
ये सारे आपके मन के अंदर ही हो रहे हैं।
ये सारी आपकी कल्पनाएं हैं।
इसे कहते हैं विकल्प चित्त वृत्ति।
आगम में वास्तविक वस्तु या घटना होती है।
भले वक्ता आपको सही ढंग से नहीं बता पा रहा हो, आप उसे गलत समझ रहे हो।
तब भी वहां विकल्प नहीं होते।
यहां पर कई विकल्प होते हैं।
चौथी प्रकार की वृत्ति – निद्रा।
सोकर उठने के बाद हम ऐसे कैसे कह पाते हैं कि,
मैं सुख से सोया।
मैं बेचैनी से सोया।
इसके लिए सोते हुए ही इसका अनुभव होते रहना जरूरी है।
उस अनुभव की स्मृति मात्र से ही हम कह पाते हैं कि,
मैं सुख से सोया, अच्छे से सोया, या बेखबर सोया।
इस अनुभव को सोते समय चित्त में जो वृत्ति प्रवृत्त रहती है, वह है निद्रा नामक चित्त वृत्ति।
अब पांचवी – स्मृति।
किसी विषय के बारे में स्मृति अनुभूत भी हो सकती है, कल्पित भी।
जगे हुए हो, और उस समय जिस विषय का अनुभव हुआ, उसका स्मरण वास्तविक है, अनुभूत स्मृति।
सपने में सांप को देखा।
जगने के बाद उसका स्मरण कल्पित स्मृति है।
जिंदगी भर हम लाखों वस्तुओं को देखते जाते हैं।
सुनते जाते हैं।
चखते जाते हैं।
सूंघते जाते हैं।
स्पर्श करते जाते हैं।
इनमें से कुछ मन में ही रह जाते हैं।
ये हैं स्मृतियां।
प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, इन सारे अनुभवों से स्मृति उत्पन्न हो सकती है।
ये सारी वृत्तियां या तो सुख का अनुभव देने वाली हैं,
या तो दुख का अनुभव देने वाली हैं,
या मन में अविद्या को उत्पन्न करने वाली हैं।
जो वस्तु सुख देती है, उसके प्रति राग उत्पन्न होता है।
जो वस्तु दुख देती है, उसके प्रति द्वेष उत्पन्न होता है।
और अविद्या, अज्ञान, सर्वदा क्लेश को ही उत्पन्न करती है।
यह इन वृत्तियों का दोष है।
इन सब का अवरोध होने से ही योगावस्था में पहुंच पाएंगे।
समाधि की अवस्था में पहुंच पाएंगे।
इनका अवरोध कैसे हो सकता है।
अभ्यास और वैराग्य से।
इसके बारे में आगे देखेंगे।
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