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गरुड देवों से अमृत छीनने स्वर्ग लोक की ओर जा रहे थे ।
उनको बहुत भूख लगी ।
गरुड के पिताजी कश्यप प्रजापति ने उनसे कहा कि उस तालाब मे एक बडा हाथी और एक बडा कछुआ जो आपस मे लड रहे हैं उन्हें खा लो ।
उन्हें पंजों से झपटकर गरुड अलम्बतीर्थ की ओर चले गये और वहां एक वट वृक्ष की सौ योजन लम्बी शाखा मे बैठे तो वह शाखा टूट गयी ।
उसे अपनी चोंच से पकड लिया ।
क्यों?
गरुड ने देखा कि उस शाखा में से कुछ तापस लोग उल्टा लटक रहे थे?
वे तापसे थे वालखिल्य ।
गरुड के आकार को देखकर वालखिल्य स्वयं विस्मित हो गये ।
४८ मील ऊंचा हाथी ।
कछुए का व्यास ८० मील ।
इनको अपने पंजों में पकडकर एक पक्षी आया है ।
उन महर्षियों ने कहा -
गुरुं भारं समासाद्योड्डीन एष विहंगमः ।
गरुडस्तु खगश्रेष्ठस्तस्मात् पन्नगभोजनः ॥
गरुड का नामकरण गरुड इस प्रकार नामकरण इन्होंने ही किया था ।
गुरुं आदाय उड्डीन इति गरुडः
गुरु का अर्थ है महान ।
महान भार को लेकर यह पक्षी उडकर आया है । इसलिए इसका नाम होगा गरुड ।
जब गरुड पर्वतों के पास से उडते थे तो पर्वत कांपते थे ।
गरुड के पंखों से तूफान उठता था ।
उस वटवृक्ष की शाखा को जिससे वालखिल्य महर्षि जन लटक रहे थे उसे चोंच मे लेकर गरुड उडते रहे उडते रहे और गन्धमादन पर्वत पहुंच गये ।
वहां फिर से अपने पिताजी से मिलन हुआ ।
कश्यपजी तपस्या कर रहे थे ।
उन्होंने अपनी आंखें खोली ।
देखा क्या हो रहा था ।
बोला - बेटा सम्हालना । उग्र तापस हैं । कुछ गलत हुआ तो क्षण भर में तुम्हें भस्म कर देंगे ।
देखिए तप शक्ति का प्रभाव ।
गरुड को पहाडों को कंपाते थे उनको भी ये नन्हे से महर्षि जन भस्म कर सकते हैं।
कश्यपजी कहते हैं ये वालखिल्य सूर्य की किरणों को पीते हैं ।
उनको कोई हानी नहीं पहुंचनी चाहिए ।
कश्यपजी ने वालखिल्यों से विनती की - आप लोग कृपा करके गरुड को जाने देजिए । वह एक महान कार्य के लिए उद्यत है जिसमे सबकी भलाई है ।
वालखिल्य वृक्ष की शाखा से उतरे और हिमालय की ओर चले गये ।
गरुड ने कश्यपजी से पूछा - इस शाखा को मैं कहां रखूं?
कश्यपजी ने एक बर्फीला पर्वत शिखर दिखाया, गरुड ने वहां उसे रखकर हाथी और कछुए को खा लिया ।
इस बीच स्वर्ग लोक में आपत्ति की पूर्वसूचनाएं दिखाई देने लगी ।
उल्कापात होने लगा ।
हत्यार अपने आप एक दूसरे से लडने लगे ।
खुले आसमान से मेघों का गर्जन सुनाई देने लगे ।
देवों ने जिन हारों को पहन रखा था , उनके फूल मुरझाने लगे ।
खून की बारिश बरसने लगी ।
आंधी होने लगी और उसकी धूल ने देवों के मकुटों को निष्प्रभ कर दिया ।
देव अपने गुरु बृहस्पति के पास गये ।
गुरुजी यह सब क्या है ? इसका अर्थ क्या है ।
बृहस्पति ने इन्द्र से कहा - तुम्हारी गलती है ।
तुम्हारी घमंड की नतीजा है यह ।
कश्यप और विनता का पुत्र आ रहा है ।
अमृत ले जाने ।
उसके जन्म के पीछे वालखिल्य महर्षियों की तप शक्ति है ।
उसे रोक नहीं पाऒगे ।
इन्द्र ने उन देवों को जो अमृत की सुरक्षा में लगे थे उन्हें सावधान रहने कहा ।
अन्य देवता भी अपने आयुधों को लेकर अमृते कुम्भ की चारों ओर खडे हो गये ।
स्वर्ग लोक इन आयुधों की रोशनी से चमक उठा ।
इन्द्र देव भी स्वयं वज्रायुध को लेकर अमृत की रक्षा के लिए खडे हो गये ।
आगे देखेंगे गरुड और देवों के बीच हुई लडाई के बारे में ।
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