गणेश एकाक्षर मंत्र का स्वरूप

अब गणेशविद्या – सैषा गणेशविद्या।
गणादिं पूर्वमुच्चार्य …
गणेशजी का एकाक्षर मंत्र है 'गं'।

मंत्र शास्त्र में आता है 'मन्त्रोद्धार' –
मन्त्रोद्धार में यह बताया जाता है कि कोई मंत्र बनता कैसे है और इसके घटक क्या-क्या हैं।
'गणादिं पूर्वमुच्चार्य' से लेकर 'संहिता सन्धिः' तक गणेशजी के एकाक्षर मंत्र का उद्धार बताया गया है।

  • गणादिं पूर्वमुच्चार्य – 'गणादि' यानी 'ग' का हलंत स्वरूप – 'ग्' – न कि 'ग'।
  • वर्णादि – जो सोलह स्वराक्षर हैं – 'अ' से लेकर 'अः' तक – इनमें सबसे पहला है 'अ'।
    ग् के साथ 'अ' जोड़ा तो 'ग' हो गया।
  • अनुस्वारः परतरः – उसके बाद आता है अनुस्वार।
    ग् + अ + अनुस्वार – 'गं' हो गया।

अनुस्वार भी कैसा?
अर्धेन्दु लसितम् – नासिक्य (नाक से उच्चारित) अनुस्वार।
संस्कृत में अनुनासिक अनुस्वार को एक अर्धचन्द्र और बीच में बिन्दु के साथ लिखा जाता है।
यह है अर्धेन्दु लसितम् – अर्धचन्द्र युक्त अनुस्वार, जो नाक से बोला जाता है।

तारेण रुद्धम्
यहाँ 'तारा' का अर्थ है ॐकार।
गं को ॐकार से युक्त करें – 'ॐ गं' या 'ॐ गं ॐ'।
एतत्तव मनु स्वरूपम् – यह है आपके मंत्र का स्वरूप।
'ॐ गं' या 'ॐ गं ॐ'।

इसे और विस्तार में समझाते हैं –

  • गकारः पूर्वरूपं, अकारो मध्यमरूपं, अनुस्वारश्च अन्त्यरूपं, बिन्दुरुत्तररूपं।
  • गकार, अकार, और अनुनासिक अनुस्वार।

नादः सन्धानम्
इन वर्णों को 'नाद' से, जैसे फूलों को धागे में पिरोकर हार बनाते हैं, वैसे इन वर्णों को नाद के द्वारा जोड़ते हैं।
यहाँ विवक्षा है बोलने वाले मंत्र की, लिखे हुए मंत्र की नहीं, क्योंकि लिखे हुए मंत्र में नाद नहीं होता, केवल ध्वनि ही होती है।

संहिता सन्धिः – इन सबको जोड़ने को संहिता कहते हैं।
संहिता सन्धिः।

सैषा गणेश विद्या – यह है गणेश विद्या – गणेश मंत्र।
इसके ऋषि हैं गणक, इसका छन्द है निचृद्गायत्री।
गायत्री छन्द के एक पाद में छह अक्षर होते हैं।
इससे कम अक्षर वाले छन्दों को सामान्य रूप से निचृद्गायत्री कहते हैं, जैसे उक्ता, अत्युक्ता, मध्या, प्रतिष्ठा, और सुप्रतिष्ठा छन्द।
और इस मंत्र के देवता हैं गणपति।

मंत्र है –
'ॐ गं' या 'ॐ गं ॐ'।

'ॐ गं गणपतये नमः' जो आमतौर पर बोला जाता है, वैसा अथर्वशीर्ष में नहीं है।
यहाँ पर ॐकार के साथ 'गं' ही है – 'ॐ गं' या 'ॐ गं ॐ'।

एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात्
यह है गणेश गायत्री मंत्र।

गणेशजी को एकदन्त क्यों कहते हैं?
इसके द्वारा भी वे कुछ बताते हैं।
जैसे गज का सिर अपनाकर बताते हैं कि परमात्मा और जीवात्मा दोनों मैं ही हूँ – वैसे ही।

एकशब्दात्मिका माया तस्याः सर्वं समुद्भवम्।
श्रान्तिदं मोहदं पूर्णं नानाखलात्मिकं किल।
दन्तः सत्ताधरस्तत्र मायाचालक उच्यते।
बिम्बेन मोहयुक्तश्च स्वयं स्वानन्दगो भवेत्।
माया भ्रान्तिमयी प्रोक्ता सत्ता चालक उच्यते।
तयोर्योगं गणेशोयं एकदन्तः प्रकीर्तितः।

इस न्याय के अनुसार – 'एक' का अर्थ है माया,
'दन्त' का अर्थ है उसे चलाने वाला, उसका पालन करने वाला।
इसलिए 'एकदन्त' का मतलब है – जो माया का स्वामी और नियंता है।

व्यासजी के लिए पुराण लिखते समय उन्होंने यह लीला की थी – अपनी सूँड को तोड़कर उसे कलम बनाया,
हमें यह बताने के लिए कि इस मायावी संसार का संचालन मैं ही करता हूँ।

वक्रतुण्ड – तुण्ड का अर्थ है सूँड।
'वक्र' यानी टेढ़ा – मनुष्य की बुद्धि को टेढ़ा करने वाली चीज क्या है? माया।
उसी माया का संचालन करने वाला उनकी सूँड है।

तुण्ड का एक और अर्थ है 'सिर'।
उनका तुण्ड, सिर वक्र है – किससे? संसार से, माया से।
यानी उनका सिर परम ज्ञान, ब्रह्मज्ञान का प्रतीक है।

धीमहि – ध्यायेम – हम उनके ऊपर ध्यान करते हैं।
दन्ती – दंतवाले ईश्वर हमें प्रचोदयात् – प्रेरणा दें, अच्छे कर्म की ओर, पुण्य की ओर, ज्ञान की ओर।

यह है गणेश गायत्री मंत्र।

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