
अग्नि पुराण में अग्निदेव द्वारा महर्षि वशिष्ठ को उपदेशित कूर्म अवतार की कथा सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाली है। क्षीरसागर मंथन और उससे सम्बद्ध अवतार कथा का वर्णन तृतीय अध्याय में किया गया है।
देवताओं की पराजय और महर्षि दुर्वासा का शाप
प्राचीन काल में हुए देवासुर संग्राम में असुरों ने देवताओं को पराजित कर दिया। इसके अतिरिक्त, महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण देवताओं का ऐश्वर्य पूर्णतः नष्ट हो गया। असहाय देवता ब्रह्मा जी को साथ लेकर क्षीरसागर में विश्राम कर रहे भगवान महाविष्णु की शरण में गए।
समुद्र मंथन का उपक्रम और कूर्म अवतार
देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान महाविष्णु ने उन्हें अपना ऐश्वर्य पुनः प्राप्त करने के निमित्त असुरों के साथ अस्थायी रूप से सन्धि करने का परामर्श दिया। भगवान ने निर्देश दिया कि अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन करना होगा और इस कार्य में असुरों की सहायता लेनी होगी। भगवान ने यह आश्वासन भी दिया कि अमृत असुरों को प्राप्त नहीं होगा, अपितु केवल देवताओं को ही मिलेगा।
तत्पश्चात्, मन्दराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रज्जु के रूप में उपयोग करके उन्होंने समुद्र मंथन आरम्भ किया। भगवान के निर्देशानुसार देवताओं ने नाग की पूंछ की ओर और असुरों ने मुख की ओर से पकड़ा। वासुकि की श्वास की उष्णता से श्रान्त (थके हुए) देवताओं को भगवान विष्णु ने शीतलता प्रदान कर आश्वस्त किया। जब मंथन आरम्भ हुआ, तो कोई आधार न होने के कारण पर्वत समुद्र में डूबने लगा। तब भगवान महाविष्णु ने एक विशाल कूर्म (कछुए) का रूप धारण किया और समुद्र के तल में जाकर पर्वत को अपनी पीठ पर धारण कर लिया।
विष और दिव्य रत्न
क्षीरसागर को मथने पर सर्वप्रथम विश्व-विनाशक 'हलाहल' नामक विष उत्पन्न हुआ। विश्व की रक्षा के निमित्त भगवान शिव ने उस विष का पान किया और उसे अपने कण्ठ में ही रोक लिया, जिसके कारण वे 'नीलकण्ठ' कहलाए। तत्पश्चात् वारुणी देवी, पारिजात वृक्ष, कौस्तुभ मणि, कामधेनु और अप्सराएँ प्रकट हुईं। साथ ही ऐश्वर्य की देवी भगवती लक्ष्मी अवतरित हुईं और उन्होंने भगवान महाविष्णु का वरण किया। देवी लक्ष्मी की कृपा दृष्टि से देवताओं को उनका लुप्त ऐश्वर्य पुनः प्राप्त हो गया।
अमृत, मोहिनी अवतार और राहु
अन्ततः आयुर्वेद के प्रणेता और साक्षात् विष्णु स्वरूप भगवान धन्वन्तरि अमृत से पूर्ण कलश लेकर प्रकट हुए। असुरों ने अमृत कलश बलपूर्वक छीन लिया। यह देखकर भगवान महाविष्णु ने अत्यन्त कमनीय 'मोहिनी' का रूप धारण किया। मोहिनी के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर असुरों ने उससे अपनी पत्नी बनने और अमृत वितरित करने का आग्रह किया। मोहिनी ने इसे स्वीकार कर लिया और कौशलपूर्वक केवल देवताओं को ही अमृत का पान कराया।
इसी मध्य राहु नामक एक असुर ने चन्द्रमा का रूप धारण करके छलपूर्वक अमृत पान कर लिया। यह देखकर सूर्य और चन्द्रमा ने भगवान को सूचित किया, और विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से राहु का मस्तक धड़ से छिन्न कर दिया। परन्तु अमृत पान के कारण अमरत्व प्राप्त कर चुके राहु ने भगवान की स्तुति की। भगवान ने वरदान दिया कि राहु द्वारा सूर्य और चन्द्रमा को ग्रसने की घटना ही 'ग्रहण' कहलाएगी, और उस काल में किए गए दान-पुण्य से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होगी।
भगवान शिव और मोहिनी
अमृत वितरण के पश्चात् भगवान महाविष्णु ने मोहिनी रूप त्याग दिया। परन्तु भगवान शिव ने उस रूप के पुनः दर्शन की इच्छा प्रकट की। जब भगवान ने पुनः मोहिनी का मायावी रूप धारण किया, तो उस सौन्दर्य पर मुग्ध होकर भगवान शिव माता पार्वती को विस्मृत कर बैठे और उन्मत्त होकर मोहिनी के पीछे दौड़ पड़े। उस काल में भगवान शिव का वीर्य पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ गिरा, वे सभी स्थान शिवलिंगों और स्वर्ण के पवित्र तीर्थों (महातीर्थों) में परिवर्तित हो गए। अन्ततः सत्य का बोध होने पर शिव जी अपने वास्तविक स्वरूप में आ गए। भगवान विष्णु ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि पृथ्वी पर शिव के अतिरिक्त अन्य कोई उनकी माया का अतिक्रमण नहीं कर सकता।
युद्ध में विजय और फलश्रुति
अमृत प्राप्त न होने के कारण असुर दुर्बल हो गए। तत्पश्चात् हुए युद्ध में अमृत का पान करने वाले देवताओं ने असुरों को सरलतापूर्वक पराजित कर दिया और स्वर्ग पुनः प्राप्त कर लिया। पुराणों में वर्णित है कि कूर्म अवतार की इस पुण्य कथा का पठन-श्रवण करने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
प्रश्न 1: भगवान महाविष्णु ने देवताओं को अपने शत्रु असुरों के साथ सन्धि करने का उपदेश क्यों दिया? इसका दार्शनिक अर्थ क्या है?
उत्तर: यह दर्शाता है कि जब किसी महान लक्ष्य की सिद्धि के लिए केवल अपनी शक्ति पर्याप्त न हो, तो शत्रुओं की क्षमताओं का भी विवेकपूर्वक उपयोग करना चाहिए। धर्म की रक्षा के निमित्त कभी-कभी शत्रुओं के साथ अस्थायी रूप से सहयोग करना पड़ता है। समुद्र मंथन जैसे भगीरथ कार्य के लिए असुरों के शारीरिक बल की आवश्यकता थी।
प्रश्न 2: अमृत प्राप्त होने से पूर्व हलाहल विष उत्पन्न होने का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?
उत्तर: क्षीरसागर मनुष्य के मन का प्रतीक है। ईश्वर साक्षात्कार रूपी अमृत प्राप्त करने के लिए जब मन का मंथन (ध्यान) किया जाता है, तो सर्वप्रथम भीतर छिपी हुई दूषित वासनाएँ और मलिनता बाहर निकलती हैं। जब तक इन मानसिक अशुद्धियों को ईश्वर को समर्पित नहीं किया जाता, जैसे भगवान शिव ने विष पान किया था, तब तक आध्यात्मिक अमृत की प्राप्ति असम्भव है।
प्रश्न 3: सर्वसंग परित्यागी भगवान शिव मोहिनी की माया में क्यों मुग्ध हो गए? इसका रहस्य क्या है?
उत्तर: यह संसार को यह बोध कराने के लिए है कि भगवान की माया शक्ति कितनी प्रबल है। यदि सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ योगी भगवान शिव भी प्रकृति के आकर्षण में फँस सकते हैं, तो सामान्य मनुष्य की स्थिति कितनी दयनीय है, यह इस घटना से प्रमाणित होता है। तथापि, तत्काल ही सत्य का बोध कर अपने वास्तविक स्वरूप में लौट आना सच्चे ज्ञानी का लक्षण भी है।
प्रश्न 4: भगवान विष्णु ने अवतार के लिए कूर्म (कछुए) को ही क्यों चुना?
उत्तर: कूर्म योग शास्त्र में 'प्रत्याहार' (इन्द्रिय निग्रह) का प्रतीक है। जिस प्रकार कूर्म अपने अंगों को अपने कवच के भीतर खींच लेता है, उसी प्रकार जब मनुष्य अपनी इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर भीतर की ओर मोड़ता है, तभी मन को एकाग्रता प्राप्त होती है। यदि मन रूपी समुद्र को मथकर अमृत प्राप्त करना है, तो इन्द्रिय संयम से युक्त दृढ़ बुद्धि को कूर्म की भाँति आधार बनना चाहिए।
प्रश्न 5: अमृत पान करने वाले राहु के द्वारा ग्रहण लगने और उस काल में दान-पुण्य करने का निर्देश देने के पीछे भगवान का क्या दार्शनिक विचार है?
उत्तर: यह दर्शाता है कि ब्रह्माण्ड में सत्प्रवृत्तियों के साथ-साथ दुष्प्रवृत्तियों का भी अपना स्थान है। ज्ञान रूपी सूर्य और चन्द्रमा को अज्ञान रूपी राहु द्वारा अस्थायी रूप से आच्छादित कर लेना ही ग्रहण है। इस अन्धकार के काल में सांसारिक सुखों का त्याग कर दान-पुण्य और ईश्वर स्मरण का अभ्यास करना पापों का नाश करता है और मनुष्य को पुण्य की ओर अग्रसर करता है। यह प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों को ईश्वर चिन्तन के लिए उपयोग करने का उपदेश है।
आपत्ति 1: एक विशाल पर्वत को मथानी बनाकर और सर्प की रज्जु से समुद्र को मथना क्या एक अवैज्ञानिक और असम्भव कपोल-कल्पित कथा नहीं है?
उत्तर: पुराण बहुधा आध्यात्मिक तत्त्वों को सामान्य जनों को समझाने के लिए प्रतीकात्मक कथाओं (रूपकों) के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। यह कोई बाह्य भौतिक घटना नहीं है, अपितु मानव के आन्तरिक स्तर पर होने वाली एक मनोवैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक प्रक्रिया है। समुद्र मानव मन है, पर्वत बुद्धि है, और सर्प हमारी वासनाएँ हैं। यह कथा प्रतीकात्मक रूप से मन के मंथन (ध्यान प्रक्रिया) को दर्शाती है।
आपत्ति 2: असुरों को भी अमृत देने का वचन देकर भगवान विष्णु ने उनके साथ छल नहीं किया? क्या ईश्वर इस प्रकार का पक्षपात कर सकता है?
उत्तर: ईश्वर व्यक्तियों का नहीं, अपितु 'धर्म' का पक्ष लेता है। असुर स्वार्थ, अहंकार और विश्व-विनाशकारी प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं। यदि विश्व को नष्ट करने की क्षमता रखने वालों के हाथ में अमरत्व जैसी परम शक्ति आ जाए, तो यह ब्रह्माण्ड के विनाश का कारण बनेगा। अतः, विश्व की रक्षा के लिए दुष्ट शक्तियों को कूटनीति से पराजित करने में कोई अधर्म नहीं है।
आपत्ति 3: राहु नामक असुर द्वारा सूर्य और चन्द्रमा को निगलना ग्रहण है, क्या यह विज्ञान के विरुद्ध नहीं है? आज सभी जानते हैं कि पृथ्वी और चन्द्रमा की छाया पड़ने से ग्रहण होता है।
उत्तर: पुराण आधुनिक विज्ञान के ग्रन्थ नहीं हैं, अपितु मनुष्य को धर्म का उपदेश देने वाले काव्य हैं। प्राचीन भारत में आर्यभट्ट जैसे खगोलविदों और गणितज्ञों को ग्रहण का वास्तविक वैज्ञानिक कारण शताब्दियों पूर्व से ही भली-भाँति ज्ञात था। पुराणों ने सामान्य जनता को खगोलीय परिवर्तनों के काल में ईश्वर स्मरण और दान-पुण्य की ओर प्रवृत्त करने के लिए ऐसी कथाओं का उपयोग किया।
आपत्ति 4: यह कहना कि भगवान शिव जैसा महान देवता कामुक होकर एक स्त्री के पीछे दौड़ा और उनका वीर्य पृथ्वी पर गिरा, क्या यह अश्लील नहीं है?
उत्तर: इसे सांसारिक और भौतिक अर्थों में नहीं समझा जाना चाहिए। तान्त्रिक योग शास्त्र के अनुसार, शिव का 'वीर्य' केवल एक शारीरिक द्रव नहीं है, अपितु यह ब्रह्माण्ड की सर्वाधिक शुद्ध चेतना (ऊर्जा) है। जब यह शुद्ध ईश्वरीय चेतना प्रकृति अर्थात् 'माया' के सम्पर्क में आती है, तो वहाँ विशाल ऊर्जा केन्द्र उत्पन्न होते हैं। उन्हीं आध्यात्मिक ऊर्जा केन्द्रों को हम पवित्र तीर्थों और शिवलिंगों के रूप में पूजते हैं।
आपत्ति 5: असुरों ने कठोर परिश्रम किया, परन्तु उसका सम्पूर्ण फल उन देवताओं को प्राप्त हुआ जिन्होंने अधिक श्रम नहीं किया। क्या यह अन्याय नहीं है?
उत्तर: असुरों ने विश्व कल्याण के लिए श्रम नहीं किया था, अपितु केवल अपने लिए आधिपत्य प्राप्त करने के उद्देश्य से किया था। यह सिखाता है कि केवल स्वार्थ और अंहकार से किए गए कर्मों का स्थायी शुभ फल कभी प्राप्त नहीं होता। देवता ब्रह्माण्ड में 'सत्त्व गुण' के प्रतीक हैं। ब्रह्माण्ड के सुचारू संचालन के लिए सत्प्रवृत्तियों की विजय अनिवार्य है। अतः, ब्रह्माण्ड के नियम सदैव धर्म के पक्ष में ही कार्य करते हैं।