
कुछ भी हम देखते हैं या सुनते हैं, ये सब हमारे मन में उत्कीर्ण हो जाते हैं। जैसी आजकल जो टैटू बनाते हैं, वैसे ये सब बहुत जल्दी मिटते नहीं हैं। दस साल पहले भी, बीस साल पहले भी आपने जो भी देखा होगा, वह आपके स्मरण में आज भी रहता है क्योंकि वह वहां उत्कीर्ण हो गया है। मन में मन इसे उत्कीर्ण होने भी नहीं देता है। एक को दूसरे के साथ जोड़कर, ऐसे संबंध बना-बना कर इन नक्शों को ताजा बनाए रखता है मन।
एक की दूसरे के साथ तुलना करना, एक को देखने पर या सुनने पर दूसरा याद आना, इन सबके द्वारा मन इनको ताजा रखता है। इनमें से बहुत कुछ संस्कार बन जाते हैं। बाहर से उत्तेजन आने पर यही संस्कार अनुक्रिया के रूप में काम करने लगते हैं। ये चित्त की वृत्तियां न केवल जागते समय, सोते समय भी सपनों के रूप में चलती रहती हैं। इनका निरोध है समाधि, योग।
एक तालाब में जब तरंग हैं तो उसका तल आपको दिखाई नहीं देगा। यह तल है हमारा वास्तविक स्वरूप। इसे देखने के लिए पहले ये तरंग शांत हो जानी चाहिए। तरंग शांत हो गई तो तल अपने आप दिखाई देने लगता है। ये तरंग हैं चित्त वृत्तियां, तल है हमारा वास्तविक स्वरूप। इस अवस्था को हम प्राप्त करते हैं योग द्वारा। अपना वास्तविक स्वरूप का पता करके उसमें स्थिर रहना है मोक्ष।
एक बार इसे देख लिया तो फिर काम आसान है। आंधी तूफान चल रही है, एक सुरक्षित जगह मिल गया तो कभी निकलकर बाहर आएंगे क्या? खींचकर निकाला तो भी नहीं आएंगे। बस उसका अनुभव हो जाना चाहिए, बाहर से नहीं, अंदर से। जिसका मन विक्षिप्त है, उसकी अवस्था ऐसी है कि न वह बाहर है न अंदर। दरवाजे पर खड़ा है, एक पैर अंदर। अंदर की सुरक्षा को थोड़ा-थोड़ा देख पा रहा है। तब तक संसार उसे खींचकर बाहर डाल देता है।
ध्यान में रखिए, समाधि और योग पर्यायवाची शब्द नहीं हैं। संप्रज्ञात समाधि के बारे में कुछ और देखते हैं। हमें पता है संप्रज्ञात समाधि लगती है एकाग्र मन में, निरुद्ध मन में लगने वाली समाधि है असंप्रज्ञात।
संप्रज्ञात समाधि में कोई एक वस्तु तो रहती है, पर उसके बारे में केवल शुद्ध ज्ञान ही रहेगा। मान लीजिए आपका चित्त एक दीप के ऊपर एकाग्र है, समाधि में चला गया है। 'यह दीप मेरा है, इसको मैंने पांच सौ रुपये देकर खरीदा था, महंगा पड़ गया, बेटे को बताना है जब खरीदने जाएगा तो दूसरे दुकान से ले ले, वहां सस्ता मिलता है' — ये सारे चिंतन उस दीप से संबंधित हैं लेकिन अनावश्यक हैं। इन चिंतनों को वही दीप, वही वस्तु सक्रिय करता है। लेकिन इन चिंतनों में अस्मिता, लाभ, नुकसान आदि दोष हैं।
इसलिए ये शुद्ध नहीं हैं। आप एक पहाड़ को देखते हैं सामने से — यहां तक यह शुद्ध है। 'अरे उसके शिखर पर बर्फ भी होता तो और अच्छा दिखता' — अशुद्ध हो गया। 'अगर मेरा घर इस तलहटी में होता तो कितना अच्छा होता' — अशुद्ध हो गया। जब ऐसे चिंतन आ जाते हैं मन में, तो वह वस्तु पूर्ण रूप से शुद्ध रूप से प्रकाशित हो जाना बंद हो जाता है।
क्लेश कहां से उत्पन्न होते हैं? अविद्या से। 'यह मेरा है, यह तेरा है' — ऐसे विचारों से। 'वह सुंदर है, मैं कुरूप हूं, उसके पास जो है वह मेरे पास नहीं है' — ऐसे विचारों से। ये विचार चित्त में अपने नक्शे छोड़ते हैं, जो हमें इनके परिहार के लिए काम करने प्रेरित करते हैं। इसे करते-करते हम पाप कर बैठते हैं, जिससे क्लेश की उत्पत्ति होती है, दुरित की उत्पत्ति होती है।
चित्त से यह अज्ञान जब गायब हो जाता है, या चित्त में अज्ञान की वृत्ति होने को कैसे रोकना है यह हमें जब पता चलता है, तो पाप करना बंद हो जाता है। क्लेश की उत्पत्ति बंद हो जाती है। विद्या अविद्या को, जो पहले की भी अविद्या है, उसको जला डालती है।
इस अवस्था में जो प्रारब्ध कर्म है, पिछले जन्म में किया हुआ कर्म वही रह जाता है। इस जन्म में किया हुआ कर्म भुगतने के लिए किसी अदृष्ट परिणाम को नहीं छोड़ता। संप्रज्ञात योग सफल हो जाने पर अविद्या और इस जन्म के कर्म, इन दोनों का उन्मूलन हो जाता है।
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