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क्या श्रीमद् भागवत का उद्देश्य यह है कि हम भगवान के बारे में सब कुछ जान पाए? नहीं। बल्कि उल्टा है। भागवत का उद्देश्य यह है इसे समझने की हम भगवान के बारे में अंश मात्र ही समझ पाएंगे। भगवान कैसे हैं, क्या करते हैं, जो भी करते हैं उसे क्यों करते हैं। उनके करोड़ों नाम, उनकी करोड़ों लीलाएं, कितना हम समझ पाएंगे। इस छोटे दिमाग के द्वारा भगवान वेदों के जैसे हैं, अग्राह्य। अगर कोई कहता है कि मैं वेद जानता हूं, कितना बड़ा दुस्साहस होगा सोचिए। व्यास जी कुछ मंत्रों को जो यज्ञ करने में काम आए, ऐसे कुछ मंत्रों को ही संहिदाएं बनाकर हमें दिए। इसे यज्ञ मात्रिक वेद कह सकते हैं जिनकी ऋक, यजु, साम और अधर्व वेद इस प्रकार से चार संविदाएं हैं। इनसे संबंधित ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद हैं। इसके अलावा भी कई प्रकार के वेद हैं। ब्रह्म निश्वसित वेद, गायत्री मात्रिक वेद, ब्रह्म स्वेद वेद, छंदो वेद, वितान वेद, रस वेद, उपलब्धि वेद, उक्तामद वेद, अर्चिर्वेद, महदुग्ध वेद, पुरुष वेद, ऐसे अनंत। हमारे पास आज ये सब नहीं है। सूरज की हर किरण एक मंत्र है। सोचिए कितने होंगे। अरबों अरबों अरबों की संख्या में। चारों वेदों को मिलाकर कुछ हज़ार मंत्र ही हैं आज हमारे पास। क्या कोई कह सकता है कि मैं वेदों का संपूर्ण जानकार हूं? इसी प्रकार है भगवान भी। भागवत को जानने से यह समझ में आएगा कि हम भगवान के बारे में नहीं जान सकते। भागवत भगवान को जानने का नहीं, भगवान तक पहुंचने का मार्ग है। अब भागवत का सबसे पहला श्लोक, प्रथम स्कंध, प्रथम अध्याय, प्रथम श्लोक। जन्माद्यस्य यतोन्वयादिदरतश्चार्थेष्वभिज्ञस्वराड् तेने ब्रह्म हृदया या आदि कवये मुह्यन्दियत् सूरयः। तेजो वायर मृदाम यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्त गुहकं सत्यं परम धीमहि। इस श्लोक में जो धीमहि शब्द है, वह गायत्री की ओर संकेत करता है। भर्गो देवस्य धीमहि। धीमहि का अर्थ है हम ध्यान करते हैं। यह श्लोक गायत्री मंत्र का ही सार है। भागवत की शुरुआत में गायत्री का सार क्यों दिया गया है? क्योंकि गायत्री वेद माता है। गायत्री बीज है, उससे जो कल्प वृक्ष उत्पन्न हुआ, वह है वेद। इस कल्प वृक्ष का मीठा फल है भागवत। पहले इस श्लोक के सामान्य अर्थ को देखते हैं। हम ध्यान करते हैं। किसके ऊपर ध्यान करते हैं? परब्रह्म के ऊपर जिससे प्रपंच की उत्पत्ति हुई है, जिसमें यह प्रपंच स्थित है। जिसमें प्रलय काल में इस प्रपंच का लय भी हो जाएगा। उस परब्रह्म का हम ध्यान करते हैं। उसके ऊपर हम ध्यान करते हैं। अस्य जगतः जन्मादि जन्म स्थिति भंगं यतः भवति तम्। उसके ऊपर हम ध्यान करते हैं। फिर से किसके ऊपर ध्यान करते हैं? उस परब्रह्म के ऊपर जो सब कुछ जानता है। जो मानव के जीवन के चार लक्ष्य हैं, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, इनके बारे में सब कुछ जानता है। लोगों को धर्म के मार्ग पर कैसे चलाया जाए? उनको कौन सा साधन कब दिया जाए? उनके मन में कौन सी इच्छा को कब उत्पन्न किया जाए और उसे पाने उन्हें कर्म में कैसे प्रवृत्त किया जाए? और उनको आत्यंतिक लक्ष्य, मोक्ष, संपूर्ण स्वतंत्रता तक। कैसे ले जाया जाए? परब्रह्म के पास यह पूरा ज्ञान है। अर्थे स्वाभिज्ञः। उसके ऊपर हम ध्यान करते हैं। फिर से किसके ऊपर ध्यान करते हैं? उस परब्रह्म के ऊपर जो सब कुछ जानता है, सब कुछ कराता है तब भी उससे पृथक रहता है। कोई होटल चलाता है, हजारों लोग वहां खाना खाने हर रोज आते हैं। उस होटल के मेनू में ४०० आइटम हैं। सारे स्वादिष्ट हैं, लेकिन वह मालिक, होटल का मालिक कभी अपने होटल में खाना नहीं खाता। वह खाना खाने अपना घर चला जाता है, सोचिए। उस होटल में सब कुछ उस मालिक के अधीन है, उसके हर कार्य से उसका संबंध है। हर कार्य में उसकी सहभागिता है तब भी वहां जो होता है खाना बनाने का, खाना खिलाने का कार्य उसका वो लाभ भोगी नहीं है। अर्थेषु अन्वयादितरतश्च। परब्रह्म भी इसी तरह इस प्रपंच के हर कार्य से संबंध रखता है, हर कार्य को चलाता है, पर उसका लाभ भोगी नहीं होता। परब्रह्म को इससे कुछ पाना ही नहीं है। परब्रह्म जिसका भी आनंद लेता है, वो कोई बाहरी वस्तु नहीं है। जैसे आप किसी दूसरे के गाने का आनंद लेते हो। खुद गाकर भी आनंद ले सकते हो। परब्रह्म का आनंद भी इस प्रकार है जो परतंत्र नहीं है। वो परब्रह्म आनंद स्वरूपी है, अपने ही आनंद का आनंद लेता है। मान लो आप फाइव स्टार सुविधाओं में ही रहने वाले हो, आपको साधारण जगह अच्छा नहीं लगेगा। परब्रह्म के पास आनंद की वो उच्च कोटि है, वो क्यों लौकिक तुच्छ सुख भोग का आनंद लेने लगेगा। अर्थेषु अन्वयादितरतस्य योस्ति तम्। उसके ऊपर हम ध्यान करते हैं। फिर से किसके ऊपर ध्यान करते हैं? स्वराठ। क्या है विराट, क्या है स्वराठ? विराट पुरुष के बारे में आपने सुना ही होगा। इस समस्त विश्व को जिसमें १४ लोक हैं, इसकी हर वस्तु को एक पुरुष के शरीर के अंग मानते हैं, तो वो है विराट पुरुष। उस विराट को जो अंदर से चलाता है, वो है स्वराठ। उसे अंदर से जो नियंत्रण करता है, वो है स्वराठ। क्या है ये स्वराठ? ज्ञान। जो ज्ञान सीखा जाता है, सिखाया जाता है, वो नहीं। न्यूटन ने क्या बताया? पेड़ से एप्पल हमेशा भूमि की ओर गिरेगा क्योंकि गुरुत्वाकर्षण नामक एक शक्ति है। यह ज्ञान नहीं है, यह जानकारी है, इसे ज्ञान नहीं कह सकते क्योंकि न्यूटन से पहले भी यह शक्ति वहां थी। सृष्टि के समय जिसको लेकर यह शक्ति बनाई गई, वह है ज्ञान। उस शक्ति के सारे लक्षण विनिर्देश यह हमारा नहीं है, यह तो केवल सृष्टिकर्ता के पास है। हम तो सिर्फ इस ज्ञान के अंश मात्र को समझते हैं, उससे सिद्धांत बनाते हैं, किताबें लिखते हैं। यह ज्ञान पहले से ही है। इस ज्ञान को कहते हैं स्वराठ, जो विराट को बनाता है। यह क्रिया नहीं, यह ज्ञान है, बनाने की क्रिया नहीं। बनाने की क्रिया इस ज्ञान के ऊपर आधारित है। यह है परब्रह्म। स्वतः सिद्ध ज्ञानवान तम। परब्रह्म ने इसे किसी स्कूल से या कॉलेज से या पुस्तक से नहीं सीखा। यह ज्ञान परब्रह्म ही है जिसका वह जब चाहे प्रयोग कर सकता है। उस परब्रह्म के ऊपर उस परब्रह्म का हम ध्यान करते हैं। इस श्लोक के बारे में आगे और देखते जाएंगे।
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