
उत्तर प्रदेश में गंगा जी के पश्चिम तट पर बसी हुई पुण्य नगरी है काशी।
काशी भारतवर्ष का धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केन्द्र है।
ज्ञान संहिता - कर्मणा कर्षणात् सा वै काशीति परिकथ्यते।
अर्थ - पापों से मुक्ति दिलाने के कारण वह नगरी काशी कहलाती है।
जाबालोपनिषद - श्रद्धालू यहां आकर मुक्ति को प्राप्त करते हैं।
शतपथ ब्राह्मण - काशी यज्ञों की भूमि है।
व्यास जी कहते हैं - शिवलिङ्ग के रूप में यहां एक महाशक्ति प्रकाशित है; इसलिए इसका नाम काशी है।
दक्षयाग में अपमानित होने पर सती देवी ने अपना देह त्याग दिया।
भगवान शिव बेचैन होकर सती के मृत शरीर को लिये जगह जगह घूम रहे थे।
श्रीमन्नारायण को लगा कि जब तक वह शरीर साथ में है शिव जी शोक में ही रहेंगे।
भगवान ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर का टुकडे टुकडे कर दिये।
देवी का सिर मणिकर्णिका में आकर गिरा।
तब से शिव जी ने काशी को अपना शाश्वत निवास स्थान बना लिया।
प्रलय के समय भी काशी का विनाश नहीं होता है।
महाभारत के अनुसार केतुमान काशी के राजा थे।
हैहय वंशियों ने इन्हें युद्ध में मार डाला।
उनके पुत्र भीमरथ भी युद्ध में हैहयों द्वारा मारे गये।
इसके बाद दिवोदास काशी के राजा बने।
मोक्ष की इच्छा से वे एक बार राज्य छोडकर तपस्या करने चले गये थे।
काशी मेम अकाल पडने पर वे ब्रह्मा जी द्वारा वापस बुला लिये गये।
पर दिविदास ने ब्रह्मा जी से आश्वासन पा लिया था कि शिव जी उनके शासन में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
शिव जी काशी में अपना लिङ्ग स्थापित करके अपने गणों सहित मन्दराचल चले गये।
दिवोदास बहुत ही अच्छे शासक थे।
उनके शासन में काशी पुनः संपन्न और समृद्ध बन गया।
देवी पार्वती के साथ विवाह होने के बाद शिव जी अधिकतर हिमालय में रहने लगे।
एक बार पार्वती जी की मां ने शिव जी को बेघर कहकर उनकी निन्दा की।
पार्वती जी इसका सहन नहीं कर पायी और बोली - मुझे आपके ही घर ले चलिए।
पर काशी में शिव जी और दिवोदास का एक साथ में होना जटिल बन सकता था।
इसलिए शिव जी ने अपने गणों से कहा कि दिवोदास को काशी से निष्कासित किया जायें।
शिव जी के गणों ने काशी पहुंचकर वहां कुण्डनाद नामक एक नाई द्वारा गणेश जी की एक मूर्ति (निकुम्भ गणपति) की स्थापना करवाई।
निकुम्भ काशीवासियों के ऊपर अपना अनुग्रह बरसने लगे।
दिवोदास की रानी ने निकुम्भ जी से एक पुत्र के लिए प्रार्थना की।
लेकिन उन्होंने ऐसा वरदान नहीं दिया।
क्रोध में आकर दिवोदास ने निकुम्भ जी का मन्दिर तुडाया।
निकुम्भ जी ने दिवोदास को श्राप दे दिया।
श्राप के कारण काशी में असमाधान असंतुष्टि बढने पर दिवोदास अपने आप को असफल समझकर काशी से निकलकर गंगा-गोमती संगम पर विराट नामक नगरी बसाकर वहां रहने लगा।
तब भी दिवोदास ही काशी में राज करता था।
दिवोदास को हटाने के लिए उसे धर्म के पथ से गिराना जरूरी था।
शिव जी ने इसके लिए ६४ योगिनियों को, १२ आदित्यों को और अन्य सभी देवताओं काशी भेजा।
पर दिवोदास धर्म में अटल रहा।
अन्त में गणेश जी एक ज्योतिषी के रूप में आये।
उन्होंने दिविदास को ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया।
दिवोदास राज्य के प्रति उदासीन हो गया।
गणेश जी ने दिवोदास से कहा - उत्तर से एक महात्मा आएंगे।
उनकी आज्ञा का पालन करने से तुम्हें मोक्ष मिल जाएगा।
जैसे बताया गया था महात्मा आये और उन्होंने दिविदास से विधि के अनुसार शिवलिङ्ग की स्थापना करवाई।
शिव जी का पार्वती जी और अपने गणॊं सहित काशी में सान्निध्य आ गया।
दिविदास ने वरुणा और अस्सी भगवान को समर्पित करके मोक्ष को प्राप्त किया।
दि्वोदास का पुत्र, प्रतर्दन श्रीरामचन्द्र जी के समकालीन था। प्रतर्दन के बाद वत्स, अलर्क, सन्नति, सुनीय, क्षेम्य, केतुमान, सुकेतु, धर्मकेतु, सत्यकेतु, विभु, आनर्त, सुकुमार, कृष्टकेतु, वेणुगोत्र, भर्ग, और भार्गभूमि काशी के राजा बने। काशी के राजा कास्य कहलाते थे।
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