अधिक मास क्या है?

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अधिक मास क्या है?

अधिक मास को मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। यह वैदिक पंचांग की एक विशेष व्यवस्था है, जो समय के संतुलन के लिए बनाई गई है।

हमारा हिन्दू कैलेंडर चन्द्रमा के आधार पर चलता है।
लेकिन सौर वर्ष (सूर्य के अनुसार) और चन्द्र वर्ष (चन्द्रमा के अनुसार) में लगभग 11 दिनों का अंतर होता है।

यह अंतर हर साल बढ़ता रहता है।
करीब 3 साल में यह अंतर लगभग 29-30 दिन हो जाता है।

इसी अंतर को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है।
इसी को ‘अधिक मास’ कहते हैं।

अधिक मास कब आता है?

जब किसी चन्द्र मास में सूर्य का कोई संक्रांति (राशि परिवर्तन) नहीं होता,
तो वह महीना ‘अधिक मास’ बन जाता है।

यह हर 2.5 से 3 साल में एक बार आता है।

अधिक मास का महत्व क्या है?

यह महीना सामान्य महीनों जैसा नहीं माना जाता।

इसे विशेष रूप से साधना, भक्ति और आत्म-शुद्धि के लिए रखा गया है।

इस महीने में:

जप, तप, दान, व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है

भगवान विष्णु की उपासना विशेष फलदायी होती है

श्रीमद्भागवत, गीता, रामायण का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है

इसलिए इसे ‘पुरुषोत्तम मास’ भी कहा जाता है।
क्योंकि यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित है।

इस महीने में क्या नहीं करना चाहिए?

परंपरा के अनुसार:

विवाह

गृह प्रवेश

नए कार्यों की शुरुआत

इनसे बचा जाता है।

क्योंकि यह महीना बाहरी उपलब्धियों के लिए नहीं,
भीतर की शुद्धि के लिए रखा गया है।

इस महीने में क्या करना चाहिए?

सीधे शब्दों में समझिए:

यह महीना ‘रुककर स्वयं को सुधारने’ का समय है।

रोज थोड़ा जप या मंत्र

दान — विशेषकर अन्न दान

व्रत या संयम

धर्मग्रंथों का अध्ययन

छोटे-छोटे प्रयास भी गहरा प्रभाव देते हैं।

सीधी समझ

अधिक मास हमें याद दिलाता है कि
जीवन केवल दौड़ने के लिए नहीं है।

कभी-कभी रुकना भी आवश्यक है।
स्वयं को सुधारना आवश्यक है।
भीतर झांकना आवश्यक है।

यह महीना वही अवसर देता है।

वेदधारा से एक बात

वेदधारा में हम ऐसी परंपराओं को भय या अज्ञान के आधार पर नहीं,
स्पष्ट समझ के साथ प्रस्तुत करते हैं।

ताकि आप उचित समय पर उचित कार्य कर सकें।

यदि यह जानकारी उपयोगी लगी,
तो इसे किसी ऐसे व्यक्ति के साथ अवश्य साझा करें
जो धर्म को समझना चाहता है, केवल मानना नहीं।

प्रश्न 1: क्या अधिक मास में किए गए जप और दान सच में ज्यादा फल देते हैं?
उत्तर: हाँ। यह महीना साधना के लिए अलग से रखा गया है। मन शांत होता है। ध्यान भीतर की ओर जाता है। इसलिए जप, दान और पाठ का प्रभाव गहरा होता है। इसी कारण इसे पुरुषोत्तम मास कहा गया है।


प्रश्न 2: अगर इस महीने में विवाह या नया काम  करते, तो क्या कोई हानि होती है?
उत्तर: हानि का विषय नहीं है। यह समझ का विषय है। यह महीना बाहरी कार्यों के लिए नहीं रखा गया। अगर इस समय बड़े कार्य शुरू करते हैं, तो ध्यान बंटता है। इसलिए परंपरा कहती है — पहले भीतर को मजबूत करो, फिर आगे बढ़ो।


प्रश्न 3: इस महीने में सबसे सरल और उपयोगी क्या कर सकते हैं?
उत्तर: बहुत सरल रखें। रोज थोड़ा मंत्र जप करें। अन्न दान करें। 10-15 मिनट धर्मग्रंथ पढ़ें। और अपने आचरण पर ध्यान दें। छोटी आदतों में सुधार करें। यही अधिक मास का सही उपयोग है।


आपत्ति: यह सब केवल पुरानी परंपरा है। आज के समय में इसका क्या महत्व है?
उत्तर: यह केवल परंपरा नहीं, एक व्यवस्था है। समय-समय पर जीवन को संतुलित करने का तरीका। आज भी लोग विश्राम लेते हैं, काम से दूरी बनाते हैं। अधिक मास वही कार्य आध्यात्मिक स्तर पर करता है। इसमें दिशा स्पष्ट है और उद्देश्य गहरा है।

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