अच्युतं केशवं - कौन कहते है भगवान

अच्युतं केशवं कृष्णदामोदरं
रामनारायणं जानकीवल्लभम्|
कौन कहता है भगवान आते नहीं
तुम मीरा के जैसे बुलाते नहीं|
कौन कहता है भगवान खाते नहीं
बेरशबरी के जैसे खिलाते नहीं|
कौन कहता है भगवान सोते नहीं
माँ यशोदा के जैसे सुलाते नहीं|
कौन कहता है भगवान नाचते नहीं
तुम गोपी के जैसे नचाते नहीं |
अच्युतं केशवं कृष्णदामोदरं
रामनारायणं जानकीवल्लभम्|

 

 

 

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मधुर गीत -भूपेंद्र पाठक

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देवकार्य से पूर्व पितरों को तृप्त करें

देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते । देवताभ्यो हि पूर्वं पितॄणामाप्यायनं वरम्॥ (हेमाद्रिमें वायु तथा ब्रह्मवैवर्तका वचन) - देवकार्य की अपेक्षा पितृकार्य की विशेषता मानी गयी है। अतः देवकार्य से पूर्व पितरों को तृप्त करना चाहिये।

गोवत्स द्वादशी की कहानी क्या है?

एक बार माता पार्वती गौ माता के और भोलेनाथ एक बूढे के रूप में भृगु महर्षि के आश्रम पहुंचे। गाय और बछडे को आश्रम में छोडकर महादेव निकल पडे। थोडी देर बाद भोलेनाथ खुद एक वाघ के रूप में आकर उन्हें डराने लगे। डर से गौ और बछडा कूद कूद कर दौडे तो उनके खुरों का निशान शिला के ऊपर पड गया जो आज भी ढुंढागिरि में दिखाई देता है। आश्रम में ब्रह्मा जी का दिया हुआ एक घंटा था जिसे बजाने पर भगवान परिवार के साथ प्रकट हो गए। इस दिन को गोवत्स द्वादशी के रूप में मनाते हैं।

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हिमांचल प्रदेश की ज्वालामुखी शक्तिपीठ में सती देवी के शरीर का कौन सा अंग गिरा ?
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