गुरु गीता

गुरु गीता

श्री गुरुपादुकापंचक और श्री गुरुगीता का श्लोकानुवाद एवं भाषाभाष्य के साथ प्रकाशन किया जा रहा है। गुरुदेव सिद्धपीठ, गणेशपुरी के स्वामी श्री गीतानन्द जी के कहने से यह कार्य आरंभ किया गया था। बाद में पता चला कि इसका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित होगा। उस अनुवाद में अनेक त्रुटियाँ थीं। गुरुपादुकापंचक के भाषाभाष्य के अंग्रेजी अनुवाद को गुलबर्गा के डॉ. चन्द्रशेखर सी. कपाले के सहयोग से नमूने के रूप में ठीक करके भेजा गया, किन्तु लम्बा समय बीत जाने पर भी यह अनुवाद परिपूर्ण न हो सका। इस विलम्ब को देखते हुए हमने सुझाव दिया कि पहले मूल भाषाभाष्य ही प्रकाशित करा दिया जाय। एक न एक कारण से इसमें भी विलम्ब होता देख हमने शैवभारती शोध प्रतिष्ठान के संस्थापक, काशी के जंगमवाड़ी मठ के ज्ञानसिंहासनाधीश्वर श्री १००८ जगद्गुरु डॉ. चन्द्रशेखर शिवाचार्य महास्वामी जी से इसके प्रकाशन का प्रस्ताव किया और उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। उसी सातत्य में यह ग्रन्थ प्रकाशित हो रहा है। अभी सूचना मिली है कि अब इसका अंग्रेजी अनुवाद भी अमेरिका से प्रकाशित होने जा रहा है।
सन् १९७८ में अन्वयार्था और रहस्यार्था नामक श्लोकानुवाद और भाषाभाष्य के साथ विज्ञानभैरव का प्रकाशन हुआ था। उसी पद्धति से यहाँ इनको प्रस्तुत किया गया है। अन्तर इतना ही है कि विज्ञानभैरव का संस्करण संस्कृत टीकाओं के आधार पर तैयार हुआ था, किन्तु गुरुगीता पर यह कार्य स्वतन्त्र रूप से किया गया है। संस्कृत भाष्यकारों की पद्धति से ही यहाँ प्रसंग प्राप्त अनेक विषयों पर उपयुक्त स्थलों पर प्रकाश डाला गया है। उनकी पुन: यहाँ चर्चा करना अनावश्यक है। ग्रन्थ के अन्त में संलग्न विशेषपद-विवरणी की सहायता से इनको देखा जा सकता है। ग्रन्थग्रन्थकार-मतमतान्तर नामानुक्रमणी की सहायता से यह जाना जा सकता है कि इस भाषाभाष्य के निर्माण में किन-किन ग्रन्थों और ग्रन्थकारों की सहायता से प्रतिपाद्य विषयों को पुष्ट करते हुए विभिन्न मत-मतान्तरों की यहाँ तुलनात्मक समीक्षा की गई है।
गुरुदेव सिद्धपीठ, गणेशपुरी से प्रकाशित श्री गुरुगीता के संस्करण को ही यहाँ आधार रूप में स्वीकृत किया गया है। गुरुगीता के प्रतिपाद्य विषयों का संक्षिप्त परिचय पृ. ११-१२ पर देखा जा सकता है। भारतीय साहित्य में गुरु का अपना स्थान है। आगम-तन्त्रशास्त्र की सभी शाखाओं में समान रूप से गुरु की महिमा वर्णित है। इस प्रसंग में यहाँ (श्लो. १५१) शाक्त, सौर, गाणपत्य, वैष्णव और शैव मतों का उल्लेख मिलता है, जिनकी चर्चा प्रपंचसार, शारदातिलक जैसे ग्रन्थों में पंचायतन पूजा या स्मार्त सम्प्रदाय के रूप में हुई है। गुरुगीता को स्कन्दपुराण का अंश माना जाता है और यह भी स्पष्ट है कि पुराणों पर कृतान्तपंचक (सांख्य, योग, पांचरात्र, पाशुपत एवं वेदारण्यक) का स्पष्ट प्रभाव है। गुरुगीता के अनुशीलन से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि स्कन्दपुराण और शिवपुराण के समान यह भी आगम-तन्त्र शास्त्र से पूरी तरह से अनुप्राणित है।

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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