
संत समाज की तीर्थ स्थान से तुलना की थी तुलसीदास जी ने। अब उसी का विस्तार अगले चार पंक्तियों से कर रहे हैं।
मुद मंगलमय संत समाजू ।
जो जग जंगम तीरथराजू ॥
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा ।
सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा ॥ 4 ॥
बिधि निषेधमय कलि मल हरनी ।
करम कथा रबिनंदनि बरनी ॥
हरि हर कथा बिराजति बेनी ।
सुनत सकल मुद मंगल देनी ॥ 5 ॥
बटु बिस्वास अचल निज धरमा ।
तीरथराज समाज सुकरमा ॥
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा ।
सेवत सादर समन कलेसा ॥ 6 ॥
तुलसीदास जी संतों के समाज में विद्यमान गुणों को नदियों की संख्या दे रहे हैं। प्रयागराज में विद्यमान त्रिवेणी संगम में गंगा, जमुना और सरस्वती नदी एक साथ मिलती हैं। सभी पुण्यतीर्थों में उसको श्रेष्ठतम जैसे मानते हैं, वैसे ही समाजों में संतों के समाज को श्रेष्ठतम मानना चाहिए।
संतों के समाज में तीन विषयों का संगम है — राम जी की भक्ति, परब्रह्म विचार और विधि-निषेधात्मक कर्म कथाएं। इसमें राम भक्ति गंगा रूप है। 'गमायति प्रापयति भगवत्पदम् या सा गंगा' — भगवान के पद तक हमें जो पहुंचाती है, वही गंगा कहलाती है। और श्रीराम जी का पद मिलना है तो श्रीराम जी पर भक्ति से ही संभव है। इसलिए संतों के समाज में श्रीराम भक्ति गंगा के समान है।
ब्रह्म विचार, परब्रह्म विचार सरस्वती नदी के समान है। 'सरो नीरं तद्वत् रसो वा अस्याह इति सरस्वती' अर्थात नीर के जैसे जिसका रस है, वह सरस्वती है। नीर का मतलब — 'नयति प्रापयति स्थानात् स्थानांतरम् इति नीरः' — एक स्थान से दूसरे स्थान को प्राप्त कराने वाला। यह नीर संसार से राम जी के शरण तक प्राप्त कराने वाला है।
संतों के समाज में तीसरा गुण है विधि-निषेधात्मक कर्मों की कथाएं — क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, इनके बारे में कथाएं। संत जन दोनों तरह की कहानियां सुनाते हैं। वे कहते हैं — यह करो, अच्छा फल मिलेगा। और यह भी बताते हैं — यह मत करो, यह पाप है, नरक में जाओगे। वे यह भी बताते हैं कि पहले ऐसा निषेधात्मक कर्म उसने किया और उसके कारण उसे बुरा फल मिला।
सुनने में उनका यह वचन नकारात्मक लग सकता है, कड़वा भी लग सकता है। हम सोचने लग जाते हैं कि मैं तो इनसे ज्ञान प्राप्त करने आया था, ये तो मुझे डरा रहे हैं। पर सोचिए, अगर संत जन हमें पाप का ज्ञान नहीं देते तो इस जगत में आज सिर्फ पाप ही होता।
हम रोग लेकर वैद्य के पास जाते हैं। वह क्या करता है? पहले रोग को बढ़ने से रोकता है, फिर जो रोग है उसे कम कराता है। ऐसे ही संत जन भी कराते हैं। राम जी के शरण में पहुंचाने के लिए संत जन क्या करते हैं? जैसे वैद्य बीमारी को बढ़ने से रोकता है, वैसे ही संत जन पाप कर्म क्या है, यह समझा कर आगे पाप करने से रोकते हैं। उसके बाद जैसे वैद्य बीमारी को मिटाता है, वैसे ही किए हुए पाप कर्मों को मिटाने के लिए राम जी की भक्ति के मार्ग में ले जाते हैं।
इस कार्य को करने से संत जन पाप को हरने वाली यमुना नदी के समान हैं। ऐसे संत जनों में त्रिवेणी संगम की तीनों नदियों के गुण विद्यमान हैं।
संतों का समाज तीर्थराज के समान क्यों माना गया है?
क्योंकि जैसे तीर्थ शरीर के पाप को धोते हैं, वैसे ही संतों का संग अज्ञान और अंतःकरण की मलिनता को दूर करता है। उनके उपदेश और आचरण से मनुष्य के भीतर नई चेतना और भक्ति का उदय होता है। यह शुद्धि स्थायी होती है क्योंकि यह आत्मा के स्तर पर काम करती है।
क्या केवल तीर्थस्नान से उतना ही लाभ मिलता है जितना संतसंग से?
नहीं। तीर्थ शरीर को छूते हैं, पर संतसंग आत्मा को। जब संत अपने अनुभव से हमें ज्ञान देते हैं, वह जीवनभर का आंतरिक स्नान होता है जो पुनः मलिन नहीं होता।
अगर कोई कहे कि संत भी तो मनुष्य ही हैं, तो उन्हें तीर्थराज क्यों कहा जाए?
क्योंकि संत का मन, कर्म और वाणी दिव्यता में रमे रहते हैं। वे स्वार्थरहित होकर जगत का कल्याण करते हैं। उनकी उपस्थिति ही उस चेतना का प्रवाह है जो ईश्वर की स्मृति जगाती है।
संतों के समाज में कौन-सी तीन धाराएँ बताई गई हैं?
भक्ति, ब्रह्मविचार और विधि-निषेध की कथा — ये तीन प्रवाह हैं जो साधक को पूर्ण बनाते हैं। भक्ति हृदय को पवित्र करती है, विचार बुद्धि को स्थिर करता है, और धर्मशिक्षा आचरण को सुधारती है।
इन तीनों धाराओं का संगम क्यों आवश्यक है?
क्योंकि केवल भक्ति से विवेक अधूरा रहता है, केवल ज्ञान से करुणा सूख जाती है, और केवल नियमों से हृदय कठोर हो जाता है। संत इन तीनों को जोड़कर संतुलित जीवन का मार्ग दिखाते हैं।
क्या आधुनिक जीवन में भी इन तीन धाराओं का महत्व है?
हाँ। आज भी मनुष्य को भक्ति से विनम्रता, विचार से स्पष्टता और धर्म से अनुशासन मिलता है। यही त्रिवेणी संगम मन के भीतर बनता है जो जीवन को साधना में बदल देता है।
विधि-निषेध की शिक्षा को नकारात्मक क्यों नहीं मानना चाहिए?
क्योंकि संत केवल डराने के लिए नहीं, बचाने के लिए निषेध बताते हैं। जैसे चिकित्सक पहले रोग को बढ़ने से रोकता है, वैसे ही संत पहले पाप की जड़ काटते हैं। यह रोक ही मुक्ति की पहली सीढ़ी है।
क्या पाप का उल्लेख करने से भय पैदा नहीं होता?
भय उत्पन्न होता है, लेकिन वही सजगता में बदल जाता है। जब हम जानते हैं कि परिणाम क्या होगा, तब विवेकपूर्वक निर्णय लेते हैं। यह संतों का उद्देश्य है — डराना नहीं, जागरूक करना।
क्या केवल भक्ति ही पर्याप्त नहीं है, नियमों की आवश्यकता क्यों?
भक्ति दिशा देती है पर नियम उसे स्थिर करते हैं। बिना अनुशासन के भक्ति भावनाओं तक सीमित रह जाती है। विधि-निषेध उसे कर्म में परिणत करता है जिससे जीवन साकार होता है।
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