समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥
हे देवी, जो समुद्र रूपी वस्त्र धारण करती हो और पर्वत जिन्हें वक्षस्थल के रूप में सुशोभित करते हैं, भगवान विष्णु की पत्नी, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। कृपया मुझे अपने चरणों से स्पर्श करने के लिए क्षमा करें।
समुद्रवसने - जो समुद्र रूपी वस्त्र धारण करती हो,
देवि - हे देवी,
पर्वतस्तनमण्डले - जिनके वक्षस्थल पर्वतों से सुशोभित हैं,
विष्णुपत्नि - भगवान विष्णु की पत्नी,
नमः - प्रणाम,
तुभ्यं - आपको,
पादस्पर्शं - चरणों से स्पर्श करना,
क्षमस्व - क्षमा करें,
मे - मुझे।
यह श्लोक देवी पृथ्वी को एक सुंदर अभिवादन है, उन्हें भगवान विष्णु की दिव्य पत्नी के रूप में मान्यता देते हुए और उन्हें अनिवार्य रूप से स्पर्श करने के कार्य के लिए क्षमा मांगते हुए। यह पृथ्वी के प्रति श्रद्धा और विनम्रता को दर्शाता है और उन्हें एक पोषण करने वाली माता के रूप में मान्यता देता है जो सभी जीवन को सहारा देती है।
इस श्लोक का नियमित जप प्रकृति और पृथ्वी के प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न कर सकता है। यह पर्यावरण के प्रति विनम्रता और कृतज्ञता को उत्पन्न करता है, जिससे सामंजस्यपूर्ण जीवन को बढ़ावा मिलता है। इसके अतिरिक्त, यह पृथ्वी देवी के आशीर्वाद को लाने और प्राकृतिक आपदाओं से बचाने में सहायक माना जाता है।
यह परंपरागत रूप से जागने पर, जमीन पर पैर रखने से ठीक पहले, माँ पृथ्वी से क्षमा मांगने और उनके समर्थन के लिए कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उच्चारित किया जाता है।
यह श्लोक पृथ्वी को देवी क्यों मानता है?
क्योंकि वह समुद्र और पर्वतों से सुशोभित होकर जीवन का आधार बनती हैं और सबका पोषण करती हैं। यह दृष्टि हमें याद दिलाती है कि हम केवल उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि उनके संरक्षण के उत्तरदायी भी हैं।
सुबह ज़मीन पर पैर रखने से पहले यह क्यों बोला जाता है?
क्योंकि दिन की शुरुआत में ही यह स्मरण हो कि पृथ्वी पर चलना उसका स्पर्श करना है। क्षमा माँगने से विनम्रता आती है और मनुष्य अपने व्यवहार में संयम रखता है।
क्या वास्तव में यह श्लोक प्राकृतिक आपदाओं से बचा सकता है?
यह सीधे भूकंप या बाढ़ को रोकने का साधन नहीं है। परंतु जब मनुष्य पृथ्वी के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी से जीता है, तो उसका आचरण पर्यावरण की रक्षा करता है और प्राकृतिक संकटों की संभावना कम होती है।
इस श्लोक के जप से क्या लाभ होता है?
यह मन में नम्रता और आभार का भाव भरता है। इससे व्यक्ति पर्यावरण को केवल संसाधन नहीं बल्कि माता मानता है। यह दृष्टि जीवन में संतुलन और शांति लाती है।
क्या यह श्लोक केवल धार्मिक लोगों के लिए है?
नहीं, इसमें छिपा भाव सार्वभौमिक है। हर व्यक्ति जो पृथ्वी पर चलता है, वह इस आभार और क्षमा की भावना से जुड़ सकता है।
अगर कोई इसे न माने तो क्या फर्क पड़ेगा?
तत्काल कोई दंड नहीं होगा, परंतु जो इस भाव को नहीं मानता, उसका जीवन धीरे-धीरे प्रकृति के साथ असंतुलन में चला जाता है। यह असंतुलन अंततः उसके अपने जीवन को कठिन बना देता है।
क्यों कहा गया है कि पृथ्वी विष्णुपत्नी हैं?
क्योंकि धर्मशास्त्रों में पृथ्वी और विष्णु का संबंध बताया गया है। यह संबंध यह दर्शाता है कि पालन-पोषण और संरक्षण की दोनों शक्तियाँ साथ चलती हैं।
अगर कोई इसे केवल प्रतीक माने तो?
तो भी भाव वही रहता है। प्रतीक रूप में यह सिखाता है कि पृथ्वी और जीवन का पोषण अविभाज्य हैं।
क्या यह विचार केवल हिंदू परंपरा में है?
नहीं, लगभग हर संस्कृति ने पृथ्वी को माता या देवी का स्थान दिया है। यह सार्वभौमिक दृष्टिकोण है जो जीवन के आधार के प्रति कृतज्ञता सिखाता है।
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