प्रजापति दक्ष भगवान शिव के ससुर थे, लेकिन वे शिवजी को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। दक्ष को लगता था कि शिवजी असभ्य हैं क्योंकि वे पहाड़ों में रहते हैं और अपने शरीर पर भस्म (राख) लगाते हैं।
एक बार दक्ष ने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने दुनिया भर के सभी देवी-देवताओं, राजाओं और ऋषियों को आमंत्रित किया, लेकिन जानबूझकर अपनी बेटी सती और उनके पति शिवजी को नहीं बुलाया।
बिना बुलाए भी सती उस समारोह में गयीं। वे अपने पिता से पूछना चाहती थीं कि उन्होंने शिवजी का अपमान क्यों किया। लेकिन वहां सती का स्वागत करने के बजाय, दक्ष ने सबके सामने शिवजी की बहुत बुराई की। अपने पति का अपमान सती से सहा नहीं गया। उन्होंने सोचा कि अब वे इस शरीर को ही त्याग देंगी क्योंकि यह शरीर उनके पिता दक्ष का दिया हुआ है।
पिता के मुंह से पति की बुराई सुनकर सती शांत हो गईं। वे उत्तर दिशा की ओर मुंह करके जमीन पर बैठ गईं और योग की शक्ति से अपने प्राण त्यागने का फैसला किया।
सबसे पहले उन्होंने पानी पीकर खुद को पवित्र किया। आंखें बंद करके उन्होंने अपना पूरा ध्यान शिवजी पर लगाया और अपनी सांसों को नियंत्रित किया। फिर उन्होंने अपनी प्राण-ऊर्जा को नाभि से ऊपर की ओर खींचा। धीरे-धीरे वे इस ऊर्जा को अपने दिल और गले से होते हुए अपनी दोनों भौहों के बीच ले आईं। वे उस शरीर को छोड़ना चाहती थीं जो दक्ष के कारण अशुद्ध हो गया था। अपनी घोर एकाग्रता से उन्होंने अपने शरीर के भीतर ही 'योगाग्नि' (योग की आग) प्रज्वलित कर ली।
शिवजी का ध्यान करते हुए अचानक उनके शरीर में आग लग गई। यह बाहर की आग नहीं थी, बल्कि उनकी अपनी शक्ति से पैदा हुई आग थी। देखते ही देखते उनका शरीर जलकर राख हो गया।
वहां चारों तरफ हाहाकार मच गया। यज्ञ देख रहे देवता और ऋषि-मुनि बहुत दुखी हो गए और डर गए। सब लोग दक्ष को कोसने लगे। वे कहने लगे, "दक्ष कितना दुष्ट है। उसने अपनी ही बेटी को मरने दिया।" सबको लगा कि शिवजी से नफरत करने के कारण दक्ष ने बहुत बड़ा पाप किया है और उसे नर्क भोगना पड़ेगा।
शिवजी ने सती की सुरक्षा के लिए अपने 'गणों' (सेवकों) को भेजा था जो बाहर खड़े थे। जब उन्होंने सती को जलते हुए देखा, तो वे गुस्से से पागल हो गए।
करीब ६०,००० गण हथियार लेकर यज्ञ मंडप में घुस गए। वे गुस्से और दुख में चिल्ला रहे थे। कुछ गण तो इतने दुखी थे कि उन्होंने लड़ने के बजाय अपने ही हथियार से अपना सिर काट लिया ताकि वे भी सती के साथ मर सकें। लगभग २०,००० गणों ने इसी तरह अपनी जान दे दी। बाकी बचे हुए गणों ने दक्ष को मारने के लिए उसे घेर लिया।
यह देखकर महर्षि भृगु ने, जो दक्ष की मदद कर रहे थे, अपनी शक्ति का प्रयोग किया। उन्होंने यज्ञ की आग में आहुति दी और मंत्र पढ़ने लगे। उनके मंत्रों की शक्ति से आग के अंदर से 'ऋभु' नाम के हज़ारों जादुई योद्धा प्रकट हुए। उनके हाथों में जलती हुई लकड़ियाँ थीं।
शिवजी के गणों और ऋभुओं के बीच भयानक लड़ाई हुई। मंत्रों की शक्ति के कारण ऋभु बहुत ताकतवर थे। उन्होंने जलती हुई लकड़ियों से मार-मार कर शिवजी के गणों को हरा दिया और उन्हें वहां से भागना पड़ा। यह हार इसलिए हुई क्योंकि उस समय शिवजी की यही इच्छा थी।
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