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व्रत के नियम

व्रत के नियम

वैदिक धर्म के तीन अङ्ग हैं - यज्ञ, तप और दान।

व्रत इनमें से तप के अन्तर्गत है।

तब भी व्रतों में उपसना रूपी यज्ञ ओर दान भी होते हैं।

व्रत और उपवास पुण्य तिथियों में किये जाते हैं।

व्रत और उपवास रखने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

 

व्रत के नियम

  • व्रत के दिन क्षमा और सहनशीलता के साथ बितायें
  • सत्य का आचरण करें
  • समस्त प्राणियों के साथ दया और करुणा से व्यवहार करें
  • व्रत और उपवास के दिनों में यथाशक्ति दान (अन्नदान इत्यादि) करें
  • शरीर, मन और कपडों को स्वच्छ रखें
  • इन्द्रियों को संयम में रखें
  • मनोरञ्जन से दूर रहें
  • अहिंसा का पालन करें
  • बार बार पानी न पियें
  • ब्रह्मचर्य का पालन करें
  • पान न खायें
  • दिन में न सोयें
  • प्रतिग्रह न करें
  • सुगंधित साबुन इत्यादियों का उपयोग न करें
  • शरीर और बाल में तेल न लगायें
  • गाय के दूध कि सिवा दूसरा दूध न पियें
  • मसुरान्न न खायें
  • सीप का चूना न खायें
  • जंबीरी नींबू न खायें
  • क्षौरकर्म न करें
  • परान्न का भोजन न करें
  • तिलान्न का भोजन न करं
  • श्राद्धान्न का भोजन न करें
  • क्रोध न करें
  • आंसू न गिरायें
  • मन को संतुष्ट और प्रसन्न रखें
  • विधि के अनुसार पूजा पाठ करें
  • जिस देवता के निमित्त व्रत का आचरण हो रहा है, उस देवता का ध्यान, मंत्र जप, पूजन, कथा श्रवण, और नाम संकीर्त्तन करें
  • ब्रह्म मुहूर्त्त में उठकर, शौच और स्नान करके व्रत का प्रारंभ करें
  • कोई बीमारी होने के कारण व्रत में बाधा आने पर पुत्र, पुत्री, भाई, बहन, मित्र या पुरोहित (प्रतिनिधि के रूप में)  उस व्रत का आगे पालन करके समाप्त कर सकते हैं
  • पति के लिए पत्नी और पत्नी के लिए पति व्रत कर सकते हैं
  • व्रत के बीच सूतक लग जाने पर किसी प्रतिनिधि द्वारा व्रत को पूर्ण करें
  • महिलाओं को व्रत के बीच माहवारी पडने पर, उपवास स्वयं रखें और पूजन, दान इत्यादि किसी प्रतिनिधि से करायें

 

परस्पर विरोधी व्रत आने पर

कई व्रतों का एक साथ पडने पर अगर परस्पर विरोधी कार्य आते हैं तो उनमें से एक को स्वयं करके दूसरा प्रतिनिधि से करायें।

अष्टमी, चतुर्दशी इत्यादियों में दिन में भोजन वर्जित है; अगर उसी दिन किसी अन्य व्रत की पारणा आ जाने पर भोजन कर सकते हैं।

रविवार को रात्रि भोजन वर्जित है; अगर अष्टमी इत्यादि रविवार को पडता है तो दिन-रात उपवास रखें।

संकटहर चतुर्थी में रात को भोजन करना चाहिए; अगर रविवार है तो रात को भी भोजन न करें।

पुत्रवान गृहस्थ को संक्रान्ति में उपवास नहीं करना चाहिए; अगर उस दिन अष्टमी पडती है तो उपवास ही रखें।

पुत्रवान गृहस्थ के लिए एकादशी और संक्रान्ति एक साथ आने पर जल, फल, मूल या दूध का सेवन करें।
एकादशी इत्यादियों में किसी अन्य व्रत की पारणा की रुकावट आयें तो जल से पारणा करें।

नित्य (जैसे सोमवार, शनिवार) एवं काम्य (जैसे सत्यनारायण व्रत) व्रत परस्पर विरोधी होने पर काम्य व्रत कि नियमों को ही प्रमुखता दें।

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