
सूतजी ने पहले बताया था कि उन्होंने शुकदेव के साथ बैठकर श्रीमद्देवीभागवत का अध्ययन किया था।
ऋषिगण ने जानना चाहा कि शुकदेव की उत्पत्ति कैसे हुई।
नारदजी के आदेशानुसार व्यासजी सुमेरु पर्वत के ऊपर बैठकर घोर तपस्या करने लगे।
उन्होंने भी ‘ऐं’ इस वाग्बीज मन्त्र का ही जाप किया।
देवी माँ के दिव्य चरणों में ध्यान लगाकर उन्होंने मन में यही संकल्प रखा कि मुझे अग्नि, वायु, भूमि और अन्तरिक्ष इनके बल से युक्त पुत्र प्राप्त हो।
भोजन छोड़कर सौ वर्षों तक उन्होंने तपस्या की — देवी महामाया और साथ में महादेव की।
व्यासजी सोच रहे थे — निर्बल प्राणी का इस जगत में कोई स्थान नहीं होता, कोई उसका सम्मान नहीं करता।
और प्राणी का बल क्या है — उसके अन्दर जो शक्ति है वह।
शक्ति द्वारा ही आदर और सम्मान प्राप्त होते हैं।
इसका मतलब यह है कि वह सम्मान और आदर उसी शक्ति को ही दिए जाते हैं जो उस प्राणी के अन्दर है।
और वह शक्ति है साक्षात् जगदम्बा।
इसलिए महामाया जगदम्बा ही सबके द्वारा सर्वदा पूजनीया है।
व्यासजी की तपश्चर्या का तेज सारे जगत में फैल गया और उनकी जटा अग्नि के समान चमकने लगी।
यह देखकर इन्द्र चिन्ताग्रस्त हो गए — किसी को बलवान देखकर इन्द्र में असुरक्षा की भावना जागृत होती है।
महादेव ने इन्द्र को बताया — आपको चिन्ताग्रस्त होने की कोई आवश्यकता नहीं है — तपस्वी लोग कभी किसी का बुरा नहीं करते।
इन्द्र ने पूछा — लेकिन ये तपस्या क्यों कर रहे हैं, क्या अभिलाषा होगी इनकी।
भगवान शंकर ने कहा — ये पुत्र प्राप्ति के लिए तप कर रहे हैं। एक सौ वर्ष हो चुके हैं। और मैं अब इनका अनुग्रह करने वाला हूँ।
भगवान भोलेनाथ व्यासजी के सामने प्रकट हुए और बोले — तुम्हें कल्याणकारी, ज्ञानी, तेजस्वी, सत्यस्वरूपी, सबका प्रिय पुत्र अवश्य प्राप्त होगा।
आशीर्वाद प्राप्त करके महादेव को प्रणाम करके व्यासजी अपने आश्रम की ओर निकल पड़े।
आश्रम पहुँचकर व्यासजी ने अग्नि मन्थन करना शुरू किया।
हवन यज्ञों के लिए अग्नि का उत्पादन अरणी मंथन से करते हैं।
अरणी मंथन में लकड़ी का एक कुंदा आधार के रूप में और लकड़ी की ही एक मथनी रहती है।
लकड़ी के कुंदे में एक छोटा सा छिद्र यानी गड्ढा बना रहता है।
मथनी का अग्र नोकीला रहता है।
उस छिद्र में मथनी की नोक को रखकर रस्सी से मंथन करते हैं, जैसे दही से मक्खन निकालने के लिए करते हैं।
अग्नि निकलने तक ऐसे घिसते हैं।
व्यासजी अरणी मंथन करते करते सोच में पड़ गए।
मुझे पुत्र प्राप्ति कैसे हो सकती है।
जैसे इस अरणी को घिसने से अग्नि उत्पन्न होता है, वैसे ही पुत्रोत्पत्ति के लिए स्त्री चाहिए, जो मेरे पास नहीं है।
मैं किसी साधारण स्त्री को अपनी पत्नी नहीं बना सकता।
वह तो पैरों की ज़ंजीर बन जाएगी।
उत्तम कुल में उत्पन्न होने पर भी, पतिव्रता होने पर भी, रूपवती होने पर भी, धर्म और अनुष्ठान वाली होने पर भी, स्त्री मतलब बन्धन ही है।
गृहस्थाश्रम मतलब बन्धन ही है।
भगवान शंकर भी इस पाश से बंधे हुए हैं।
मैं कैसे पड़ूँ इस मोह के जाल में।
इतने में आकाश में उन्हें एक अप्सरा दिखाई दी, जिसका नाम था घृताची।
अप्सरा का महर्षि की ओर देखते ही वे कामबाण से घायल हो गए।
व्यासजी तो और संकट में पड़ गए।
क्या करूँ मैं अब।
अगर मैंने इसे स्वीकार किया तो लोग क्या कहेंगे — इतने बड़े तपस्वी, एक साधारण अप्सरा के वश में आ गए, कामान्ध हो गए।
गृहस्थाश्रम इसलिए श्रेष्ठ है कि उससे पुत्र प्राप्ति, स्वर्ग प्राप्ति और मोक्ष प्राप्ति हो सकती है।
स्त्री के बिना पुत्रोत्पत्ति भी नहीं हो सकती।
लेकिन इस अप्सरा से सम्बन्ध रखने से स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति तो नहीं लगता है।
व्यासजी को एक कथा याद आई जो नारद महर्षि ने उन्हें सुनाई थी।
व्यासजी ने बल को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना?
यहाँ बल का अर्थ शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि भीतर की शक्ति है। जो व्यक्ति भीतर से दुर्बल होता है, संसार उसे गंभीरता से नहीं लेता। सम्मान उसी को मिलता है जिसमें स्थिरता, तेज और आत्मबल हो। यह बल तप, संयम और स्पष्ट दृष्टि से पैदा होता है। बिना इस बल के ज्ञान भी निष्प्रभावी हो जाता है।
अगर भीतर का बल इतना जरूरी है, तो वह पैदा कैसे होता है?
स्वाभाविक जिज्ञासा यही होती है कि यह शक्ति आती कहाँ से है। यह अचानक नहीं आती, बल्कि लम्बे अभ्यास से बनती है। जैसे शरीर व्यायाम से मजबूत होता है, वैसे ही मन तप और अनुशासन से मजबूत होता है। लगातार प्रयास ही इसका मूल है। शॉर्टकट यहाँ काम नहीं करते।
क्या आज के समय में लोग भीतर के बल से ही सम्मान पाते हैं?
तर्क से देखें तो बाहरी साधन जल्दी सम्मान दिला सकते हैं, पर वह टिकता नहीं। भीतर की कमजोरी समय के साथ बाहर आ ही जाती है। ऐसे उदाहरण हर दौर में मिलते हैं। स्थायी सम्मान वही होता है जो भीतर की मजबूती पर टिका हो। यही कारण है कि आत्मबल को मूल माना गया है।
व्यासजी ने गृहस्थ जीवन को बंधन क्यों कहा?
उनका विचार था कि संबंध जिम्मेदारियों के साथ आते हैं। ये जिम्मेदारियाँ साधक की स्वतंत्रता को सीमित कर देती हैं। चाहे स्त्री कितनी भी गुणवान हो, बंधन तो बंधन ही रहता है। साधना में लगे व्यक्ति के लिए यह एक बड़ा अवरोध बन सकता है। इसलिए उन्होंने इससे दूरी बनाए रखी।
तो फिर गृहस्थ आश्रम को श्रेष्ठ क्यों कहा जाता है?
यही विरोधाभास जिज्ञासा पैदा करता है। गृहस्थ जीवन से ही संतान, समाज और परंपरा आगे बढ़ती है। यह मार्ग सांसारिक और आध्यात्मिक, दोनों उन्नति का साधन बन सकता है। समस्या आश्रम में नहीं, आसक्ति में है। संतुलन हो तो यही मार्ग उन्नति का साधन बनता है।
अगर गृहस्थ जीवन इतना श्रेष्ठ है, तो उसे बंधन कहना गलत नहीं है?
तर्क की दृष्टि से यह विरोध नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का अंतर है। जो व्यक्ति पूर्ण वैराग्य चाहता है, उसके लिए कोई भी बंधन बाधा है। जो समाज में रहते हुए आगे बढ़ना चाहता है, उसके लिए यही व्यवस्था उपयोगी है। मार्ग व्यक्ति की प्रकृति पर निर्भर करता है। एक ही चीज अलग संदर्भ में अलग अर्थ रखती है।
अरणी मंथन का उदाहरण क्यों दिया गया?
यह उदाहरण बताता है कि परिणाम बिना माध्यम के नहीं मिलता। जैसे अग्नि के लिए अरणी आवश्यक है, वैसे ही संतान के लिए स्त्री का माध्यम आवश्यक है। प्रकृति के नियमों को टाला नहीं जा सकता। इच्छा और वास्तविकता के बीच यही टकराव व्यासजी को उलझाता है। यह जीवन की व्यावहारिक सच्चाई दिखाता है।
क्या हर इच्छा के लिए कोई प्राकृतिक शर्त होती है?
यह प्रश्न स्वाभाविक है। अनुभव बताता है कि हर लक्ष्य के लिए कुछ अनिवार्य शर्तें होती हैं। केवल इच्छा या तप पर्याप्त नहीं होता। साधन और परिस्थिति भी चाहिए। इसे समझना ही परिपक्वता है।
क्या यह सोच मनुष्य को सीमित नहीं कर देती?
तर्क से देखें तो सीमाएँ स्वीकार करना कमजोरी नहीं, यथार्थबोध है। जो व्यक्ति सीमाओं को पहचानता है, वही सही निर्णय लेता है। असंभव की जिद व्यक्ति को भ्रम में डालती है। स्पष्ट समझ जीवन को अधिक संतुलित बनाती है।
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