वायुपुराण में इक्कीसवी कल्प के बारे में बताया है।
इस कल्प का नाम था पीतवासा।
इस कल्प में महादेव के मुंह से माहेश्वरी देवी एक गाय का रूप लेकर उत्पन्न हुई थी।
उनका नाम रखा गया रुद्राणी।
स्कन्दपुराण में भी गौ की महिमा बताई गई है।
आपस्तंब महर्षि बडे तपस्वी थे।
नर्मदा जी में पानी के अंदर वे ध्यान में मग्न थे।
उन को मछवारों ने मछली पकडते वक्त गलती से जाल के द्वारा बाहर खींच लिया।
कहीं गुस्से में आकर महात्मा शाप न दे दें।
वे सब उनके चरण में पडे।
मछलिओं का भारी संख्या में विनाश देखकर आपस्तंब महर्षि मछवारों को बोलने लगे-
अपने सुख के लिए अन्य प्राणियों की हिंसा बडी क्रूरता है।
कोई भी इस बात की ओर ध्यान नही देता।
जो विद्वान हैं, ज्ञानी है वे सब भी स्वार्थता वश खुद के लिए स्वर्ग या मोक्ष की प्राप्ति चाहते हुए जप-तप में लगे रहते हैं।
तुम लोगों को समझाएगा कौन? पुण्य क्या है और पाप क्या है?
इन प्राणियों का दुख मुझसे सहन नहीं हो रहा है।
मैं ने आज तक जितना पुण्य कमाया हो वह सब मैं इन प्राणियों को दे रहा हूं।
जिससे इनकी पीडा का बोझ हल्का हो जावे।
और जिन पापों की वजह से इन प्राणियों को ऐसा क्लेश भुगतना पड रहा है वह सब मैं अपने ऊपर ले रहा हूं।
ये सब सुनकर मछवारे और परेशान हो गए।
उनको मालूम नहीं पड रहा था क्या करें।
उस देश के राजा थे नाभाग।
वे सब दौड कर राजा के पास चले गए और उन्हें जो कुछ भी हुआ सुनाए।
राजा नाभाग तुरंत अपने मन्त्रियों और पुरोहितों के साथ महर्षि का दर्शन करने पहुंचे।
राजा ने महर्षि की पूजा की और उन्हें पूछा, मैं कैसी सेवा करूं आप की?
महर्षि बोले ये मछवारे परेशान हैं और निर्धन हैं।
अपनी भूख मिटाने के लिए उन्हें इन प्राणियों को मारना पडता है।
अपनी मजबूरी की वजह से ये सब निष्ठुर और पाप कर्म में लगे हैं।
मैं इनके जाल में फसा हूं और मेरे ऊपर अब इनका ही हक है।
आप मुझे सही दाम देकर खरीद लीजिए और वह मूल्य इन मछवारों को दे दीजिए ताकि आगे इन्हें यह गलत काम न करना पडे।
राजा ने खुशी से मान लिया।
लेकिन ऋषि आपस्तंब की उचित कीमत क्या होगी?
राजा ने कहा, मैं आप के बदले में इन्हें एक लाख स्वर्ण मुद्रा दे देता हूं।
महर्षि बोले, यह मेरा सही दाम नहीं है।
अपने मन्त्रियों के साथ विचार कीजिए ।
राजा बोले मैं इन्हें एक करोड स्वर्ण मुद्रा दे दूंगा।
और अगर आप को लगे कि यह भी सही नहीं है तो और भी ज्यादा दे दूंगा।
महर्षि ने कहा, यह भी उचित नहीं है।
विद्वानों के साथ विचार कीजिए।
मेरा आधा या पूरा राज्य दे देता हूं।
या फिर आप खुद बताने का कष्ट कीजिए कि कितना दूं? क्या दूं?
महर्षि बोले यह भी सही नहीं है।
ऋषियों के साथ विचार कीजिए।
राजा भयभीत होने लगे।
बात तो सुलझ नहीं रही है।
कहीं महर्षि तो गुस्सा आ गया तो वे तो भस्म कर देंगे सबको।
तब तक लोमश महर्षि वहां आए।
उन्होंने कहा, चिंता मत करो मैं संभाल लूंगा।
लोमश महर्षि ने कहा मूल्य के रूप में गौ दे दो।
इसके अलावा इस महात्मा का सही मूल्य और कुछ नहीं हो सकता।
आपस्तंब जी बोले यह बिल्कुल सही है।
गौ ही मेरे लिए उचित मूल्य हो सकता है।
गौ से श्रेष्ठ और कीमती चीज और कोई नहीं है।
गाय तो सब से पवित्र और सारे पापों का नाश कर देने वाली है।
परिक्रमा करनी चाहिए रोज गाय की।
रोज प्रणाम करना चाहिए गौ माता को।
जगत का सारा मंगल, कल्याण गायों में स्थित है।
गाय का गोबर मंदिर समेत हर स्थान को शुद्ध कर देता है।
गोबर , गोमूत्र, दूध, दही और घी हमेशा शुद्ध रहते हैं और इनसे अन्य सारी चीजें भी शुद्ध हो जाती हैं।
तीनों संध्याओं में जो पवित्र होकर,
गावो मे चाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च।
गावो मे हृदये चैव गवां मध्ये वसाम्यहम्॥
इस श्लोक का पाठ करेगा वह सब पापों से मुक्त हो जाएगा।
हर दिन गौओं को गोग्रास दिया तो समझ लेना तुम ने अग्निहोत्र भी कर लिया, पितरों को भी तृप्त कर लिया और सारे देवताओं को भी तृप्त कर लिया।
गोग्रास देते वक्त इस श्लोक का उच्चारण करना चाहिए,
सौरभेयी जगत्पूज्या नित्यं विष्णुपदे स्थिता।
सर्वदेवमयी ग्रासं मया दत्तं प्रतीक्षताम्।
महात्माओं की सेवा करना, गाय को खुजलाना, और दुर्बल प्राणियों की रक्षा करना, यह मार्ग है स्वर्ग में नित्य निवास पाने का।
गाय के बिना यज्ञ नहीं, यज्ञ के बिना देवता भी नहीं।
स्वर्ग पहुंचने की सीढी है गौ।
उनकी रक्षा करनी चाहिए, सेवा करनी चाहिए, पूजा करनी चाहिए और दान भी करना चाहिए।
आपस्तंब महर्षि ने मछवारों से कहा, इन गायों को स्वीकार करके अपने पापों से मुक्ति पाओ।
अपने तपोबल से आपस्तंब जी ने इन मछलियों को और मछवारों को स्वर्ग पहुंचा दिया ।
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