रामायण से सीखिये मानव जीवन के आदर्श

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रामायण से सीखिये मानव जीवन के आदर्श

रामायण हमें जीना सिखाता है। राम जी हमें दिखाते हैं मानव कैसे जिएं। इसके लिए तो उन्होंने मानव के रूप में अवतार लिया था। रावण को तो भगवान स्वधाम में बैठकर भी मार सकते थे। यह कोई बड़ी बात नहीं थी। अपने जीवन के हर क्षण में, हर कदम में उन्होंने हमें दिखाया कि मानव जिए कैसे। मानव और जानवर में क्या फर्क है? सुख को पाना, दुख को टालना जानवर भी चाहते हैं। जानवर को देखो, छांव में सोएगा, धूप में नहीं। बिल्ली को देखो, घर में जो सबसे सुखदायक स्थान है, वहीं सोएगा, जैसे सोफा, बिस्तर। ये तो हर प्राणी चाहता है। तो ये मानवता नहीं है। मोक्ष पाने की इच्छा। एक चिड़िये को अपने हाथ से जोर से पकड़ कर देखो। क्या-क्या करेगी वो छुटकारा पाने? मोक्ष भी यही तो है। संसार के बंधनों से छुटकारा पाना। फिर आत्मीय और जानवर में क्या भेद है? परीक्षा का समय है, बच्चा नींद को त्याग कर, नींद के सुख को त्याग कर रात में 1:00 बजे, 2:00 बजे तक भी पढ़ता है। इसमें थोड़ा दुख भी है। यह कोई जानवर कर पाएगा? दुख का सहन अपनी मर्जी से जानवर नहीं कर पाएगा। सोच समझ कर, क्योंकि दुख से बचना जानवर के लिए एक अनैच्छिक क्रिया है। हल में जोते जाने पर बैल खुशी से काम नहीं करता। उसके पास कोई विकल्प नहीं है इसलिए वो काम करता है। दुख से बचना जानवर के लिए प्रतिक्रिया या अनिच्छिक क्रिया है। मानव जानबूझकर भी दुख को अपना सकता है, उसका सहन कर सकता है। जो खिलाड़ी हैं, बॉडी बिल्डर हैं, कितना शारीरिक कष्टों को सहन करके आगे बढ़ते हैं। उनका अभ्यास कोई सुख ताए का आसान काम नहीं है, पेशियों में दर्द होता है, तब भी वे छोड़ते नहीं हैं। यह गुण जानवरों में नहीं है। दुख को सहन करने से आगे सुख मिल सकता है। क्या है यह सुख? मानसिक सुख, सफलता का सुख, सम्मान, स्थान, मान का सुख। खिलाड़ी लोग इसी के लिए दुख का सहन करते हैं। शारीरिक दुःख को सहन करके अभ्यास करते हैं, मेहनत करते हैं। यह दूर दृष्टि जानवरों में नहीं है। उनका सोच तात्कालिक है। अभी इस क्षण में इस दुःख से कैसे बचू? इसलिए जानवर जानवर ही रह जाते हैं। कोई ध्यान साधना के आचार्य लोग, गुरुजी लोग कहते हैं, इस क्षण में जियो, इस पल में जियो, पहले का मत सोचो, बाद का मत सोचो। यह सुनकर मुझे तो ऐसा लगता है कि यह अपने चेलों को जानवर ही बना देना चाहते हैं। इसमें ऐसा है कि अगर आप 90% कार्य तात्कालिक दृष्टिकोण से करते हैं और 10% सोच समझ कर करते हैं तो आप 90% जानवर हो और 10% मानव। दूसरी खास बात यह है कि मनुष्य ही प्रगति कर सकता है अपने कर्म से, देवता भी नहीं। स्वर्ग में रहने वाले देवता केवल भोग कर सकते हैं अपने पहले के पुण्य कर्मों के फल को। तो दो विशेष बात, मानव में दूर तक सोचने की क्षमता। इसी से धर्म के तत्व बनते हैं और कर्म करके प्रगति करने की क्षमता। तो मानव को कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि कैसे मैं तत्काल के दुख को टालूं। कैसे मैं तत्काल के सुख को बढ़ाऊं? ये जानवर ही करता है। संपूर्ण रामायण को इस दृष्टिकोण से देखिए, हर संदर्भ में राम जी ने कैसे व्यवहार किया। मानव के रूप में। इसलिए तो हम उन्हें पुरुषोत्तम कहते हैं। रामायण में उनकी दैवी कार्यों से ज्यादा मानवी कार्यों को देखिए। आपको समझ में आएगा जीना कैसे है। कुछ उदाहरण बताता हूं। पिता ने वचन दिया इसके लिए पुत्र राज्य छोड़ देता है। आज का कोई बेटा करेगा? बोलेगा आपने वचन दिया तो आप जानो मैं क्यों कष्ट उठाऊं। वैसे धर्म भी कहता है ज्येष्ठ पुत्र का ही राजा बनने का हक है, अधर्म तो आपने ही किया है। मैं क्यों कष्ट उठाऊं? बोलेगा आज का पुत्र। सारे बंधु बांधवों के साथ उनके व्यवहार को देखिए, चाहे गुरुजन हो, माता हो, विमाता हो, भाई हो, पत्नी हो। कहीं कलंक का एक अंश भी आपको नहीं दिखाई देगा। बंधु बांधवों के साथ-साथ अन्य लोग, बंदर जैसे जानवर शत्रुओं के साथ आदर्श पूर्वक ही व्यवहार सर्वदा। मेरा सुख, मेरा दुख इस सोच का कोई स्थान ही नहीं था उनके जीवन में। धर्म के अनुसार पुत्र को कैसे व्यवहार करना चाहिए? भाई को कैसे व्यवहार करना चाहिए, पति को कैसे व्यवहार करना चाहिए, प्रतिद्वंद्वी को कैसे व्यवहार करना चाहिए। राजा को कैसे व्यवहार करना चाहिए। इसी को अमल में लाते थे। इसके बारे में कैसे पता चलेगा शास्त्रों से। मतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानराः। शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वही नराः। शास्त्र के अनुसार जो चलते हैं, वे हैं मनुष्य। मति के अनुसार चलने वाले बंदर हैं। कुछ गुरुजन कहते हैं अपनी अंदरूनी आवाज को सुनो, उसके ऊपर निर्णय लो, कार्य करो, नहीं, ये तो बंदर और अन्य जानवर करते हैं। मानव तो शास्त्र के ऊपर चलता है। यही राम जी हमें दिखाते हैं। राजा के रूप में भी उन्होंने क्षत्रिय धर्म का ही पूर्णतया पालन किया। अपने बारे में कभी नहीं सोचा। शत्रु से प्रजा की रक्षा। उनका कुशल कल्याण, यही तो क्षत्रिय का धर्म है, राजा का धर्म है। लक्ष्मण जी ने बहुत प्रयास किया इंद्रजित को मारने। सब विफली हो गया था, तब उन्होंने कहा धर्मात्मा सत्य संतश्च रामो दाशरधर यदि समरे च अप्रतिद्वंद्वः शरैनं जहि रावणिम। अगर मेरा राम धर्मात्मा है, सत्यवान है, युद्ध में उनके समान कोई नहीं रहता। अगर ये सब बात सच है तो ये बाण इंद्रजत को मार देगा, मार दिया। क्यों? ये सब सच थे। प्रजा के मन में शंका का दुख ना आए, इसके लिए उन्होंने सीता माता के विरह का दुख को स्वयं सहन किया। आजकल के कुछ शासक और अधिकारी घोटालों में फंसने के बावजूद जांच तक होने नहीं देते। कुछ दशक पहले तक हम सुनते थे, कहीं एक... रेल दुर्घटना हुई और रेल मंत्री ने राजीनामा दे दिया। एक बार एक आदमी राम जी के राजद्वार पर आया और बोला कि मेरे बेटे का अकाल मृत्यु हुआ है जिसका कारण यहां के राजा का कोई पाप है। धर्मिष्ठ शासक के राज्य में कभी ऐसी घटना नहीं घटती। राम जी से कोई पाप हो ये तो हो ही नहीं सकता, पर उन्होंने कहा राज्य में किसी ने पाप किया है। नहीं तो ऐसा नहीं होता। राजा होने के नाते ये मेरी असफलता है कि मैंने उसे रोक नहीं पाया। उसका पता लगाया गया और परिहार भी किया गया। यह एक अपवाद है। उनके 11000 वर्षों के शासनकाल में एकमात्र घटना रामराज्य में। वह भी हमें दिखाने के लिए कि राजा को कितना सतर्क रहना चाहिए। रामायण को इस दृष्टिकोण से देखिए, सुनिए, पठिए, जीवन बदल जाएगा। रामाय नमः।

 

  • भगवान राम ने मनुष्य के रूप में अवतार क्यों लिया जबकि वे रावण का वध अपने धाम से भी कर सकते थे?
    भगवान राम का मुख्य उद्देश्य केवल रावण का वध करना नहीं था, बल्कि मनुष्य को यह सिखाना था कि एक आदर्श जीवन कैसे जिया जाए। उन्होंने अपने हर कदम और निर्णय से मानवता के लिए एक मानक स्थापित किया ताकि आने वाली पीढ़ियां प्रेरणा पा सकें।
  • पशु और मनुष्य की प्रवृत्तियों में मुख्य अंतर क्या है?
    पशु केवल तात्कालिक सुख पाने और तात्कालिक दुख से बचने की अनैच्छिक क्रिया करते हैं। इसके विपरीत, मनुष्य भविष्य के किसी ऊंचे लक्ष्य या धर्म के पालन के लिए अपनी मर्जी से वर्तमान के सुख का त्याग कर सकता है और दुख को सहन कर सकता है।
  • क्या केवल मोक्ष की इच्छा रखना ही मनुष्य को पशु से अलग करता है?
    नहीं, क्योंकि अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष तो एक छोटी चिड़िया भी करती है जब उसे पकड़ा जाता है। मनुष्य की विशेषता यह है कि वह विवेक और दूरदर्शिता के साथ कष्ट सहकर भी प्रगति करने और धर्म के पथ पर चलने की क्षमता रखता है।
  • वर्तमान क्षण में जीने की विचारधारा पर लेखक का क्या दृष्टिकोण है?
    लेखक के अनुसार जो केवल वर्तमान क्षण और तात्कालिक सुख-दुख के बारे में सोचता है, वह पशुवत व्यवहार कर रहा है। मनुष्य वही है जो भविष्य का विचार कर सके, योजना बना सके और धर्म के तत्वों को समझकर दूरगामी परिणाम के लिए कर्म करे।
  • देवताओं की तुलना में मनुष्य को श्रेष्ठ क्यों माना गया है?
    स्वर्ग में रहने वाले देवता केवल अपने पूर्व पुण्यों का फल भोग सकते हैं, वे नया कर्म करके प्रगति नहीं कर सकते। केवल मनुष्य योनि ही ऐसी है जहाँ कर्म करके उन्नति की जा सकती है और परम पद को प्राप्त किया जा सकता है।
  • श्री राम को पुरुषोत्तम क्यों कहा जाता है?
    उन्हें उनके दैवीय चमत्कारों के कारण नहीं, बल्कि उनके मानवीय व्यवहार और आदर्शों के कारण पुरुषोत्तम कहा जाता है। उन्होंने पुत्र, भाई, पति और राजा के रूप में शास्त्रों के अनुसार उत्तम आचरण किया और व्यक्तिगत सुख की अपेक्षा धर्म को ऊपर रखा।
  • शास्त्र के अनुसार चलने वाले और मति के अनुसार चलने वाले में क्या भेद है?
    जो केवल अपनी बुद्धि या मन की आवाज (मति) के अनुसार निर्णय लेते हैं, उन्हें बंदर के समान चंचल माना गया है। वास्तविक मनुष्य वही है जो शास्त्रों के सिद्धांतों को आधार बनाकर अपने जीवन के निर्णय लेता है और मर्यादा का पालन करता है।
  • श्री राम ने पिता के वचन के लिए राज्य का त्याग क्यों किया, जबकि वे इसे अधर्म भी कह सकते थे?
    यद्यपि ज्येष्ठ पुत्र के रूप में उनका अधिकार था, परंतु उन्होंने धर्म और सत्य की रक्षा को प्राथमिकता दी। उन्होंने यह दिखाया कि व्यक्तिगत अधिकार और सुख से ऊपर कुल की मर्यादा, पिता का वचन और धर्म का पालन होता है।
  • राजा के रूप में श्री राम की सजगता का क्या प्रमाण मिलता है?
    जब एक बालक की अकाल मृत्यु हुई, तो राम जी ने इसे अपनी शासन व्यवस्था की असफलता माना। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि एक सच्चे शासक को इतना सतर्क होना चाहिए कि उसके राज्य में कोई भी अधर्म न पनप सके, क्योंकि प्रजा के कष्ट का उत्तरदायी राजा ही होता है।
  • लक्ष्मण जी द्वारा इंद्रजित वध के समय कही गई बात से क्या सिद्ध होता है?
    लक्ष्मण जी ने बाण चलाते समय राम जी की धार्मिकता और सत्यनिष्ठा की शपथ ली थी। बाण का इंद्रजित को मार गिराना यह सिद्ध करता है कि सत्य और धर्म में वह शक्ति है जो अजेय शत्रुओं को भी पराजित कर सकती है। यह राम जी के चरित्र की पवित्रता का अकाट्य प्रमाण है।
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