
मूक होइ वाचाल, पंगु चढइ गिरिवर गहन। जासु कृपा सो दयाल, द्रवउ सकल कलिमलदहन।
मूकं करोति वाचालं, पंगुं लंघयते गिरिं। यत्कृपा तमहं वन्दे, परमानन्द माधवम्।
यह संस्कृत में प्रसिद्ध है। यही है इस सोरठे का आशय भी।
जिनकी कृपा से गूंगा भी समर्थ वक्ता बन जाता है और लूला-लंगड़ा भी दुर्गम और ऊंचे पर्वत पर चढ़ता है, वे जो कलि जनित पापों को जला देते हैं, वे हम पर दया करें।
कौन? कलि कल्मष को जलानेवाले हैं श्री हरि। वेद में कहा है - 'विष्णुः पर्वतानामधिपतिः समावतु'। पर्वतों के अधीश हैं श्री हरि।
सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी। गिरापति – वाक्पति हैं श्री हरि, या फिर सूर्यदेव – श्रीरामजी हैं सूर्यवंशी।
'उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुरु' – रघुकुल के गुरु हैं सूर्यदेव।
गणेश वन्दना के बाद गुरु वन्दना। सूर्य इसलिए कि मूक और पंगु पैदा होनेवाले बच्चे का पालन-पोषण सूर्यदेव ही करते हैं।
विनय पत्रिका में कहा है – 'दीनदयाल दिवाकर देवा, दहन दोष दुख दुरित रुजाली, सारथि पंगु दिव्य रथगामी'।
श्री हरि हो या सूर्य – इसमें कोई विरोध भी नहीं है। 'हरि-संकर-बिधि-मूरति स्वामी' – सब सूर्य नारायण ही हैं।
'एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः' – आदित्य हृदयम्।
मंगलाचरण में पंचोपासना का सूचक भी है यह। अवध वासी पंचोपासना करते थे – उसके द्वारा श्रीरामजी को पाते थे।
'करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि त्रिपुरारि तमारी।'
कोई मूक या पंगु क्यों जन्म लेता है – स्वयं के पापवश। कैसे पाप?
'जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कवि कहहीं।'
बड़े-छोटे पाप – कायिक, मानसिक और वाचिक पाप।
इनकी कृपा से पाप नष्ट होकर वही वाचाल हो जाता है, पहाड़ पर भी चढ़ने लगता है – 'मन क्रम बचन जनित अघ जाई'।
रामकथा एक पहाड़ है – तुलसीदासजी अपने आपको लूला-लंगड़ा मानते हैं और उनको इस पहाड़ पर चढ़ना है।
'करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा।
सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राउ।
मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी।
छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई।'
और कृपा के लिये प्रार्थना करते हैं।
क्या है वह शक्ति जो गूंगे को वाचाल और पंगु को पर्वतारोही बना देती है?
यह कृपा है – एक ऐसी जीवंत शक्ति जो पिछले पापों और बाधाओं को जलाकर छिपी हुई क्षमता को जाग्रत करती है। कृपा के प्रभाव से प्राकृतिक या कर्मजन्य सीमाएँ ढीली पड़ जाती हैं।
कृपा को ज्ञान और प्रयास से अधिक शक्तिशाली क्यों कहा गया है?
क्योंकि जब ज्ञान कम हो या प्रयास असफल लगे, तब भी कृपा अकेली व्यक्ति को असंभव कार्य करने योग्य बना देती है। यह मानव प्रयास की कमी को पूरा कर देती है।
क्या यह केवल चमत्कारों में अंधविश्वास नहीं है?
नहीं। यह इस बात का संकेत है कि अपराध‑बोध, भय और कर्मजन्य बोझ से मुक्त होने पर भीतर की शक्ति स्वतः प्रकट होती है। श्रद्धा और समर्पण कई बार ऐसे जागरण को जन्म देते हैं।
पंचोपासना क्या सिखाती है?
पंचोपासना का अर्थ है – पाँच देवताओं की उपासना के द्वारा एक ही परम लक्ष्य तक पहुँचना। यह दर्शाता है कि सत्य की प्राप्ति केवल एक मार्ग से नहीं, विभिन्न पूजाओं और भावनाओं से भी हो सकती है।
क्या सभी उपासनाएँ एक ही परमेश्वर तक ले जाती हैं?
हाँ। चाहे साधक शिव, विष्णु, सूर्य, गणेश या शक्ति की उपासना करे, यदि भावना निर्मल हो और लक्ष्य मोक्ष हो, तो मार्ग भिन्न होने पर भी लक्ष्य एक ही होता है।
क्या इतने देवताओं की उपासना भ्रम पैदा नहीं करती?
नहीं। जैसे एक ही सूरज की किरणें अलग‑अलग रंगों में दिखती हैं, वैसे ही एक ही ब्रह्म के विभिन्न रूप हैं। विविधता एकता को दर्शाने का ही माध्यम है।
मूक और पंगु जन्म से क्यों होते हैं?
शास्त्रों के अनुसार यह पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम होता है। वाणी, मन और शरीर से किए गए पापों के कारण ऐसी बाधाएँ जन्म में साथ आती हैं।
इन कर्मों को पहचानना और सुधारना कैसे संभव है?
श्रद्धा, सत्कर्म, प्रार्थना, और शुद्ध आचरण के द्वारा धीरे‑धीरे इन कर्मों का शमन होता है। संगति, जप, सेवा और संयम इसके प्रमुख उपाय हैं।
क्या यह दृष्टिकोण पीड़ित को दोषी ठहराता है?
नहीं। यह दृष्टिकोण जिम्मेदारी सिखाता है, न कि आरोप। यह बताता है कि जीवन कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि सीखने और सुधारने का क्रम है।
सूर्य को विशेष रूप से क्यों स्मरण किया गया है?
क्योंकि सूर्य जीवन, ऊर्जा, प्रकाश और स्वास्थ्य के प्रतीक हैं। विशेषकर उन बच्चों के लिए जिनमें वाणी या गति की कमी होती है, सूर्य देव को आराध्य माना गया है।
क्या सूर्योपासना से वास्तव में लाभ होता है?
हाँ। नियमित सूर्यनमस्कार, आदित्यहृदय स्तोत्र, और सूर्योदय में ध्यान लगाने से मानसिक व शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है, यह आयुर्वेद और योग दोनों मानते हैं।
क्या यह केवल प्रतीकात्मक विश्वास है?
नहीं। सूर्य किरणों में औषधीय गुण हैं, और मन को स्फूर्ति देनेवाली ऊर्जा भी। यह आध्यात्मिक दृष्टि और वैज्ञानिक दृष्टि – दोनों से पुष्ट है।
तुलसीदासजी स्वयं को अयोग्य क्यों मानते हैं?
क्योंकि वे विनम्रता के साथ स्वीकारते हैं कि उनकी बुद्धि सामान्य है, पर कथा गगन के समान विशाल। वे केवल कृपा के बल पर इसे संभव मानते हैं।
क्या ऐसा भाव साधना के लिए आवश्यक है?
हां। आत्मबोध और नम्रता साधक को गर्व से बचाकर कृपा के द्वार तक पहुँचाते हैं। ईश्वर की कृपा उन्हीं पर होती है जो अपनी सीमाएँ पहचानते हैं।
क्या यह केवल कवियों की शैली है, आत्मग्लानि नहीं?
नहीं। यह आत्मग्लानि नहीं, अपितु सच्चा आत्मनिरीक्षण है। जो अपने अंदर की दुर्बलताओं को देखता है, वही वास्तव में आगे बढ़ता है।
पाप कैसे जलते हैं?
जब मन, वाणी और कर्म शुद्ध होते हैं, तब भीतर का तम दूर होता है। शास्त्र, सत्संग, सेवा और सच्ची प्रार्थना – ये सब पापों को जलाने वाले अग्नि के समान हैं।
क्या केवल जप और पाठ से पाप मिट सकते हैं?
यदि उनमें भावना और समर्पण हो तो हाँ। बाहरी क्रिया केवल साधन है; यदि उसके पीछे सच्चा पश्चाताप और सुधार की इच्छा है, तब वह प्रभावी होती है।
अगर कोई कहे कि यह सब केवल मानसिक तसल्ली है?
तो वह आंतरिक परिवर्तन को नहीं समझता। मानसिक शुद्धता जीवन को रूपांतरित कर देती है – यह केवल भावना नहीं, व्यवहार में भी दिखाई देता है।
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