मरणाशौच के कुछ नियम

मरणाशौच के कुछ नियम

मरणाशौच की सामान्य शुद्धि दस दिन में ही हो जाती है। इसे 'कायशुद्धि' कहा जाता है, अर्थात् सामान्य स्तर की पवित्रता।। इसके बाद शरीर की अशुद्धता का दोष नहीं रहता। अन्न आदि की पूर्ण शुद्धि और संस्कारों की अनुमति बारहवें दिन सपिंडीकरण के बाद ही मानी जाती है। इसलिए देवकार्य आदि बारहवें दिन के बाद ही किए जाने चाहिए।

यदि दस दिन के अशौच की अवधि के दौरान ही दूसरी मृत्यु हो जाए, तो दूसरे मरणाशौच की समाप्ति भी पहले वाले अशौच की समाप्ति के साथ मानी जाती है। यानी पहले के साथ ही दूसरा भी खत्म हो जाता है।

लेकिन इसमें एक शर्त है —

अगर पहली मृत्यु के दसवें दिन की रात में, तीन प्रहर (लगभग 9 घंटे) बीत जाने से पहले दूसरी मृत्यु होती है, तब पहले मरणाशौच के दस दिन पूरे होने के बाद, दूसरे मरणाशौच के लिए दो दिन और जोड़कर कुल बारह दिन तक अशौच माना जाता है।

और अगर दूसरी मृत्यु पहले की मृत्यु के दसवें दिन की रात में, चौथे प्रहर (यानि 9 से 12 घंटे के बीच) में हो जाए, तब पहले मरणाशौच के दस दिन पूरे होने के बाद, दूसरे मरणाशौच के लिए तीन दिन और जोड़कर कुल तेरह दिन तक अशौच माना जाता है।

क्रिया-कर्म करने वालों के लिए, पूरा दस दिन का अशौच फिर से मानना होता है।

यदि पिता के निधन के दस दिनों के भीतर माता का भी निधन हो जाए, तो पिता की मृत्यु के दिन से गिने गए दस दिनों में डेढ़ दिन का मरणाशौच और जुड़ जाता है।

यदि माता की मृत्यु के बाद दस दिनों के भीतर ही पिता का भी निधन हो जाए, तो तो पिता की मृत्यु के दिन से फिर से पूरे दस दिन तक मरणाशौच चलता है। यानी माता के शौच की शुद्धि हो जाने पर भी, पिता के मरणाशौच की शुद्धि नहीं मानी जाती — वह पूरे दस दिन तक चलता है।

यदि किसी कारणवश मृत्यु के दिन ही दाह-संस्कार न हो पाए और किसी दूसरे दिन दाह-संस्कार करना पड़े, तब भी मरणाशौच की गणना मृत्यु के दिन से ही करके पूरे दस दिन तक होती है।

माता-पिता की मृत्यु होने पर विवाहिता  लड़की के लिए केवल तीन दिन का अशौच माना जाता है।

घर में जब तक शव रहता है, तब तक वहाँ उपस्थित अन्य गोत्रों के लोगों को भी अशौच रहता है।

यदि कोई किसी शव को कन्धा देता है, उसी घर में ठहरता है और वहीं भोजन भी करता है, तो उसे पूरे दस दिन का अशौच माना जाता है।

लेकिन यदि वह केवल भोजन करता है या केवल घर में ठहरता है, तो उसे तीन दिन का मरणाशौच माना जाता है।

और अगर वह केवल शव को कन्धा देता है, तो उसे केवल एक दिन का अशौच लगता है। 

दिन में शव का दाह-संस्कार होने पर, शवयात्रा में शामिल होने वाले लोगों को सूर्यास्त तक अशौच रहता है।

सूर्यास्त होने पर नक्षत्र-दर्शन के बाद स्नान आदि करके यज्ञोपवीत बदल लेना चाहिए।

यदि दाह-संस्कार रात में होता है तो अशौच सूर्योदय तक माना जाता है।

हिन्दी

हिन्दी

श्राद्ध और परलोक

Click on any topic to open

0

Copyright © 2026 | Vedadhara | All Rights Reserved. | Designed & Developed by Claps and Whistles
| | | | |
Vedahdara - Personalize

We use cookies