
भूख लगती है तो माँ से कहते हो न—माँ, भूख लगी है, खाना दो।
या फिर बैठोगे—माँ है, माँ को पता है मुझे कब भूख लगती है, वह जरूर बुलाएगी, खाना देगी। अगर मेरी किस्मत में खाना लिखा है तो मिलेगा।
दैनिक जीवन में इतना टेढ़ा-मेढ़ा सोचते हो क्या।
फिर सिर्फ भगवान के साथ क्यों।
दिल खोलकर व्यवहार करो। जैसे वे तुम्हारे साथ हैं, जैसे वे तुम्हारे सामने हैं, वैसे व्यवहार करो।
लोग पूछते हैं—भगवान को देखा है क्या।
सिर्फ देखना क्यों। भगवान क्या कोई निःशब्द चित्र है कि सिर्फ देख पाओगे।
भगवान को देख भी सकते हैं, सुन भी सकते हैं, सूंघ भी सकते हैं, छू भी सकते हैं, उनका स्वाद भी ले सकते हैं।
इसमें आश्चर्य की क्या बात है, इसमें गूढ़ता क्या है।
जो सर्वव्यापी है, जो विश्व के कण-कण में है।
उन्हें अगर तुमने नहीं देखा है, वह इसलिए कि तुम अंधे हो।
उन्हें अगर तुमने नहीं सुना है, वह इसलिए कि तुम बहरे हो।
इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।
जो भोग भगवान को चढ़ाया गया है, उसका स्वाद कुछ अलग नहीं लगता है।
खीर बनाओ—खाओ।
खीर बनाओ, भगवान को नैवेद्य करो—उसे खाकर देखो।
फरक समझ में आएगा।
कहाँ से आया वह दिव्य स्वाद।
भगवान का सान्निध्य स्वाद के रूप में ऐसे पता चलता है।
भगवान को सब देख सकते हैं, सब सुन सकते हैं।
इसके लिए कोई बड़ा ज्ञानी होना जरूरी नहीं है, बड़ा तपस्वी होना जरूरी नहीं है।
बस अपनी आंखें खुली रखो, कान खुले रखो—तुम्हें दिखाई भी देगा, सुनाई भी देगा।
अपनी आंखें बंद रखोगे और कहोगे मुझे दिखाई नहीं दे रहा है, इसके लिए कौन जिम्मेदार।
हाँ, जितना तीव्र तुम्हारा अनुष्ठान, जितनी गहरी तुम्हारी आस्था, जितना मजबूत तुम्हारा विश्वास, उतनी स्पष्टता भी देखने में और सुनने में।
तुम्हारी आंखों में मोतियाबिंद है तो तुम्हें कम दिखाई देगा।
अगर तुम्हारी आंखें साधारण हैं तो तुम्हें साफ दिखाई देगा।
पूजा क्यों। जैसे मैंने पहले बताया, उनके साथ आदरपूर्वक व्यवहार करो। तुम उनका सम्मान करते हो, यह तुम्हें दिखाना है।
शिक्षक कक्षा में आते हैं तो खड़े क्यों होते हो—अपना आदर दिखाने।
राष्ट्रपिता की प्रतिमा पर हार क्यों चढ़ाते हो—अपना आदर दिखाने।
राष्ट्रीय ध्वज को सलामी क्यों देते हो—अपना आदर दिखाने।
ये सब तरीके हैं, आदर दिखाने के।
पूजा एक पद्धति है, जिससे तुम ईश्वर के प्रति आदर दिखा सकते हो, औपचारिक तौर पर।
जो बताया है, करो। उतना काफी है।
जिन्होंने भी इस पद्धति का निर्माण किया है, सोच-समझकर ही किया है।
उसे बस करते रहो, उतना काफी है।
बहुत सरल है यह।
तो भगवान उस वचन का मनन कर रहे थे।
और उनके सामने शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करके, दिव्य आभरणों से भूषित लक्ष्मीजी प्रकट हो गईं।
सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्—इस वचन का साक्षात्कार प्रत्यक्षीकरण हुआ, लक्ष्मीजी के रूप में।
भगवती महालक्ष्मी प्रकट हो गईं—रति, भूति, बुद्धि, मति, कीर्ति, स्मृति, धृति, श्रद्धा, मेधा, स्वधा, स्वाहा, क्षुधा, निद्रा, दया, गति, तुष्टि, पुष्टि, क्षमा, लज्जा, जृम्भा, तन्द्रा—इन सखियों के साथ।
सारी सखियां भी अपने-अपने आयुध धारण किए हुए और सुंदर आभरणों से विभूषित थीं।
भगवान सोच में पड़ गए।
यह जो देवी सामने खड़ी है, मेरी माता तो नहीं लग रही है।
लेकिन इस समुद्र के बीच ये सब अचानक कहां से आ गईं।
यह वट वृक्ष कहां से आया।
मुझे उसके पत्ते पर किसने लिटाया।
मुझे एक सुंदर बालक के रूप में किसने बनाया।
ये सब कोई मायाजाल तो नहीं है।
कुछ समझ नहीं पा रहा हूं।
बेहतर यही है कि चुपचाप सावधानी से यहीं रहता हूं।
जीवन की सामान्य बातों में भरोसा कैसे काम करता है?
भरोसा रोजमर्रा के व्यवहार से बनता है, सोच के जाल से नहीं। जब भूख लगती है तो मां से सीधे कहते हैं, गणना नहीं करते। यह भरोसा संबंध की सच्चाई पर टिका होता है। व्यवहार में सरलता रखने से तनाव कम होता है। यही सरलता आगे के अनुभवों का रास्ता खोलती है।
क्या हर बात में इतना सोचना गलत है?
सोच जरूरी है, पर हर जगह नहीं। जहां संबंध और अनुभव पहले से हैं, वहां सोच रुकावट बन जाती है। सीधे बोलना और मांगना ज्यादा प्रभावी होता है। इससे मन हल्का रहता है।
अगर भरोसा न किया जाए तो क्या होगा?
अत्यधिक गणना निर्णय को जकड़ देती है। व्यक्ति निष्क्रिय हो जाता है और अवसर निकल जाते हैं। व्यवहार ठहर जाता है, अनुभव नहीं बनते। इसलिए संतुलन जरूरी है।
ईश्वर से संबंध को व्यवहार में कैसे लाया जाए?
जैसे सामने मौजूद किसी अपने से करते हैं, वैसे ही व्यवहार करें। औपचारिक दूरी अनुभव को रोक देती है। खुलापन संवाद पैदा करता है। संवाद से अनुभूति गहरी होती है। यही संबंध का व्यावहारिक रूप है।
क्या कल्पना से बाहर आकर ऐसा व्यवहार संभव है?
हां, क्योंकि व्यवहार कल्पना नहीं, अभ्यास से बनता है। रोज के छोटे कदम असर दिखाते हैं। धीरे-धीरे संवेदना बढ़ती है। अनुभव स्वतः स्पष्ट होता है।
अगर सामने कुछ दिखे ही नहीं तो व्यवहार कैसे करें?
व्यवहार देखने की शर्त पर नहीं टिका होता। पहले कदम से ही दृष्टि खुलती है। निष्क्रिय प्रतीक्षा अनुभव नहीं देती। पहल जरूरी है।
अनुभूति केवल देखने तक सीमित नहीं होती?
अनुभूति कई इंद्रियों से होती है, केवल आंखों से नहीं। सुनना, स्पर्श, गंध और स्वाद भी अनुभव के मार्ग हैं। यह समझ अनुभव को व्यापक बनाती है। सीमित दृष्टि भ्रम पैदा करती है।
स्वाद और अनुभूति का क्या संबंध है?
स्वाद संवेदना का गहरा स्तर है। एक ही वस्तु अलग संदर्भ में अलग अनुभव देती है। यह अंतर ध्यान से पकड़ में आता है। अनुभव सूक्ष्म होता है।
क्या यह सब मन का भ्रम नहीं है?
भ्रम असंगत और अस्थिर होता है। यहां अनुभव दोहराने पर भी स्थिर रहता है। तुलना करने पर फर्क साफ दिखता है। यह जांच योग्य है।
अनुभव के लिए विशेष योग्यता जरूरी नहीं होती?
अनुभव किसी पद या विद्या से बंधा नहीं। सामान्य सजगता पर्याप्त है। आंख और कान खुले हों तो संकेत मिलते हैं। साधारणता ही शक्ति है।
अनुष्ठान और आस्था का क्या योगदान है?
निरंतर अभ्यास ध्यान को तेज करता है। गहरी आस्था मन को स्थिर करती है। इससे स्पष्टता बढ़ती है। परिणाम क्रमिक होते हैं।
अगर कोई फिर भी न देख पाए तो दोष किसका है?
बंद दृष्टि अनुभव को रोकती है। जिम्मेदारी बाहरी नहीं, भीतर की होती है। तैयारी के बिना परिणाम की अपेक्षा तर्कहीन है। अभ्यास ही समाधान है।
आदर दिखाने के सामाजिक तरीके क्यों होते हैं?
आदर आंतरिक भाव है, पर उसे व्यक्त करना पड़ता है। सामाजिक संकेत भाव को स्पष्ट करते हैं। इससे संबंधों में मर्यादा बनती है। यही कारण है कि विधियां बनीं।
पूजा को औपचारिक क्यों कहा जाता है?
पूजा भाव को व्यवस्थित रूप देती है। यह याद दिलाती है कि सम्मान कैसे दिखाया जाए। औपचारिकता अनुशासन सिखाती है। अनुशासन से निरंतरता आती है।
क्या बिना समझे करना ठीक है?
विधि अनुभव से बनी होती है। पहले करना, फिर समझ आना स्वाभाविक क्रम है। हर नियम तर्क से ही जन्मा होता है। निरंतरता से अर्थ खुलता है।
अचानक घटित दृश्य का अर्थ क्या है?
गहरे चिंतन के क्षण में प्रतीक प्रकट होते हैं। वे विचार का साकार रूप होते हैं। यह अनुभव को स्पष्ट बनाते हैं। प्रतीक समझ को दिशा देते हैं।
इतनी सखियों और रूपों का संकेत क्या है?
जीवन की अनेक शक्तियां एक स्रोत से जुड़ी हैं। उन्हें अलग-अलग रूपों में दिखाया गया है। इससे समग्रता का बोध होता है। विविधता में एकता समझ आती है।
क्या इसे भ्रम कहा जा सकता है?
भ्रम में क्रम और अर्थ नहीं होता। यहां हर तत्व आपस में जुड़ा है। प्रश्न उठना स्वाभाविक है, पर निरीक्षण जरूरी है। सावधानी ही विवेक है।
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