
पूतना का छलपूर्ण आगमन
यह कहानी तब शुरू होती है जब मथुरा का क्रूर राजा कंस, अपने भांजे कृष्ण के जन्म से डरा हुआ था। उसे ज्योतिषियों ने बताया था कि देवकी का आठवाँ पुत्र ही उसका वध करेगा। इसलिए, उसने सभी नवजात शिशुओं को मारने का निश्चय किया। इसी क्रूरता के तहत, उसने पूतना नाम की एक भयानक राक्षसी को गोकुल भेजा।
पूतना बहुत ही चालाक थी। उसने अपनी असली, डरावनी छवि को छिपाकर, एक बहुत ही सुंदर और सौम्य स्त्री का रूप धारण कर लिया। उसके पहनावे और चाल-ढाल ऐसी थी, मानो वह कोई देवी हो या किसी बच्चे की देखभाल करने वाली दयालु महिला।
गोकुल में पूतना का प्रवेश
पूतना गोकुल में गाँव वालों का ध्यान अपनी तरफ खींचते हुए घूम रही थी। उसकी सुंदरता और मासूमियत को देखकर किसी को भी उस पर शक नहीं हुआ। धीरे-धीरे वह नंदबाबा के घर तक पहुँची, जहाँ नवजात कृष्ण एक पालने में सो रहे थे।
जब पूतना ने कृष्ण को देखा, तो उसके दिल में एक क्षण के लिए ममता जागी, लेकिन कंस की आज्ञा और उसकी राक्षसी प्रवृत्ति हावी हो गई। उसने कृष्ण को अपनी गोद में उठाया और उन्हें अपना विषैला दूध पिलाने लगी। उसका इरादा था कि कृष्ण इस विष से तुरंत मर जाएँगे।
कृष्ण की लीला और पूतना का अंत
लेकिन पूतना यह नहीं जानती थी कि वह जिसे एक साधारण बालक समझ रही थी, वह कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान विष्णु के अवतार थे। कृष्ण ने तुरंत पूतना की बुरी मंशा को समझ लिया। उन्होंने दूध पीने के बजाय पूतना के प्राणों को खींचना शुरू कर दिया।
पूतना को असहनीय पीड़ा होने लगी। वह दर्द से कराह उठी और उसने कृष्ण को छोड़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन कृष्ण की पकड़ मजबूत थी। दर्द के कारण पूतना का असली राक्षसी रूप सामने आ गया। उसके शरीर का आकार बढ़ने लगा, और उसकी चीखें ऐसी थीं, मानो कोई भूकंप आ गया हो। पूतना एक विशाल, विकराल शरीर के साथ जमीन पर गिरी और मर गई। उसके शरीर का वजन इतना था कि वह कई पेड़ों को तोड़ते हुए गिरी।
पूतना को मिला मोक्ष
गोकुल के लोग यह देखकर डर गए। उन्होंने कृष्ण को पूतना के शरीर से दूर किया और तुरंत उनकी सुरक्षा के लिए मंत्रों का सहारा लिया। इसके बाद, गाँव के पुरुष पूतना के विशाल शव को जंगल में ले गए और जला दिया।
लेकिन यहाँ एक अद्भुत चमत्कार हुआ। जलते हुए शरीर से दुर्गंध आने के बजाय, वातावरण में चंदन और अगरबत्ती जैसी सुगंध फैल गई।
यह सुगंध इस बात का प्रतीक थी कि पूतना को उसकी दुष्टता के बावजूद मोक्ष मिल गया था। भले ही उसके इरादे बुरे थे, लेकिन उसने भगवान कृष्ण को अपने स्तन का पायन कराया था। कृष्ण ने उसके इस "मातृत्व" के कृत्य को स्वीकार किया और उसे मुक्ति प्रदान कर दी। यह दर्शाता है कि भगवान की कृपा इतनी असीम है कि वह किसी भी कर्म के बंधन से व्यक्ति को मुक्त कर सकते हैं, चाहे उसके इरादे कुछ भी रहे हों।
इस कहानी का सार यही है कि भगवान की भक्ति और उनके स्पर्श में इतनी शक्ति है कि वह सबसे बड़े पापों का भी नाश कर देती है और आत्मा को मुक्ति प्रदान करती है।
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