
वेदों में जिसको विद्या कहा गया है, जिसे लोग आदिशक्ति कहते हैं और पराशक्ति भी कहते हैं, वही देवी माँ संसार के बंधनों को काटने में बहुत ही सक्षम है।
और यह देवी माँ कहां विराजती हे?
सबके हृदय में।
सबके अर्थात सबके नहीं; दुरात्मा लोग दुष्ट लोग देवी के बारे में सोच भी नही सकते।
सौन्दर्य लहरी में आदि शंकराचार्य पूछते हैं:
कथं त्वां प्रणन्तुं स्तोतुं वा अकृतपुण्यः प्रभवति।
जिसने पुण्य नहीं किया हो उसके द्वारा तुम्हारी स्तुति कैसे हो सकती है, वह तुम्हें कैसे प्रणाम कर पाएगा?
वह बहुत ही शीघ्र दर्शन देने वाली है, साधकों को।
मंत्र-सिद्धि, वाक-सिद्धि, अष्ट-सिद्धि आदि सारी सिद्धियां वह जल्दी ही दे देती है।
अपने सत्वरजस्तमोगुणों द्वारा जगत की सृष्टि, पालन और संहार वही करती है।
यह तो सब जानते हैं कि ब्रह्मा जगत के रचयिता हैं।
विष्णु के नाभि कमल में बैठकर उनकी ही प्रेरणा से ब्रह्मा सृष्टि में प्रवृत्त होते हैं।
विष्णु का आश्रय कौन है?
शेषनाग।
शेषनाग रूपी शय्या में भगवान लेटे हैं।
और नाग का आश्रय?
समन्दर अर्थात पानी।
बिना पात्र के पानी कहीं टिक सकता है?
नहीं।
उस समन्दर के पानी जिस पात्र में है, वह पात्र है देवी माँ, सबका आश्रय है देवी माँ, सभी प्राणियों में शक्ति बनकर विराजती है देवी माँ।
ब्रह्मा का उद्भव जैसे विष्णु के नाभि पद्म में हुआ उन्होंने सबसे पहले मां का ही स्तुति पाठ किया था।
निर्गुण और सगुण, दोनों ही उनका ही रूप हैं।
इन शब्दों से माता का स्मरण करके सूत जी ने भागवत की कथा शुरू कर दी।
श्रीमद् देवी भागवत में अठारह हज़ार श्लोक हैं।
इसका बारह स्कन्ध हैं और कुल मिलाकर इसमें तीन सौ अठारह अध्याय हैं।
यदि किसी भी ग्रंथ को पुराण कहना है तो उसका पांच लक्षण होना अवश्य है; सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश-वर्णन , मन्वन्तर, वंशानुचरित: ये हैं पुराणों के पांच लक्षण।
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।
वंशानुचरितं विप्र पुराणं पञ्चलक्षणम्।
एक कल्प समाप्त होने पर जब भगवान श्री रुद्र जगत का संहार कर देते हें उसके बाद जो रह जाता है उसे अव्यक्त कहते हैं।
अव्यक्त अर्थात उस अवस्था में पेड पौधे, जानवर, पक्षी, पहाड ऐसे अलग अलग चीज़ें नहीं रहते।
सारा जगत एक जैसा हो जाता है, जैसे पानी, इसीलिए उसे प्रलय जल कहते हैं।
पर जगत बहुत देर के लिये उस अवस्था में रह नहीं सकता।
अपने आप सृष्टि की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
भगवती महामाया नित्या है।
निर्गुणा है; देवी सत्वरजस्तमोगुणों से प्रभावित नहीं है।
पूरे जगत में माता व्याप्त है।
मंगलमयी है वह।
जो कुछ भी हमें दिखाई देता है सब देवी का ही अलग अलग रूप हैं।
योग मार्ग से माता जानी जाती है।
समस्त प्राणी या तो जगे हुए रहते हैं या सोये हुए रहते हैं या स्वप्नावस्था में रहते हैं; जाग्रदवस्था स्वप्नावस्था या सुषुप्त्यवस्था।
देवी माँ जिस अवस्था में है, वह इन तीनों से अतिरिक्त है, अतीत है, उसे तुरीयावस्था कहते हैं।
वही महामाया यदि राजसिक रूप में प्रकट होती है महासरस्वती।
यदि सात्विक रूप में प्रकट होती है तो महालक्ष्मी।
और तामसिक रूप में प्रकट होती है तो महाकाली।
जगत के सृजन से पूर्व, उसके सृजन के लिए जब देवी माता इन तीनों रूप धारण कर लेती है, उसे कहते हैं सर्ग।
देवी के आदेशानुसार ही ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और रुद्र संहार करते हैं; इन त्रिदेवों की उत्पत्ति को कहते हैं प्रतिसर्ग।
सूर्यवंश, चंद्रवंश, दैत्य-दानवों के वंश , इनकी वंशावली: ये सब बताया जाता है वंश में।
मन्वन्तर: एक कल्प का विभजन जो चौदह मन्वन्तरों में किया गया है; उसका वर्णन , इनके शासक कौन थे? ये सब- इसे मन्वन्तर कहते हैं।
वंशानुचरित अर्थात उन मनुओं के पीछे उनके वंशों का चरित्र।
पुराणों के अलावा व्यास जी ने महाभारत की भी रचना की है जिसके अन्दर सवा लाख श्लोक हैं।
महाभारत को इतिहास कहते हैं।
वेदों में विद्या को आदिशक्ति क्यों कहा गया है?
यहां विद्या को केवल ज्ञान नहीं, बंधन काटने वाली शक्ति बताया गया है। यही शक्ति संसार के मोह और जडता से मुक्त करने में सक्षम है। उसे आदिशक्ति और पराशक्ति कहा गया क्योंकि वही मूल आधार है। यह विद्या बाहर नहीं, भीतर कार्य करती है। इसी कारण इसे मुक्ति का साधन कहा गया है।
यह विद्या बाहरी साधनों से अलग क्यों मानी गई है?
क्योंकि यह किसी वस्तु या स्थान में सीमित नहीं है। इसका निवास हृदय में बताया गया है। जब भीतर जागृति आती है, तभी इसका प्रभाव दिखता है। इसलिए इसे आंतरिक शक्ति कहा गया है।
क्या यह कहना तर्कसंगत है कि विद्या ही बंधन काट सकती है?
हां, क्योंकि बंधन अज्ञान से पैदा होते हैं। जब कारण ही हटता है, तो परिणाम अपने आप समाप्त होता है। बाहरी उपाय लक्षण मिटाते हैं, विद्या कारण मिटाती है। इसलिए यह तर्कसंगत है।
देवी का निवास सबके हृदय में होने पर भी सब उन्हें क्यों नहीं जानते?
यहां स्पष्ट किया गया है कि सबका अर्थ समान पात्रता नहीं है। जिनका मन कठोर और दूषित है, वे उस शक्ति का स्मरण भी नहीं कर पाते। पात्रता मन की शुद्धता से आती है। इसलिए अनुभूति सबको समान रूप से नहीं होती।
पात्रता का यहां क्या अर्थ है?
पात्रता का अर्थ बाहरी योग्यता नहीं, आंतरिक स्थिति है। जिस मन में विवेक और संयम है, वही ग्रहण कर सकता है। यह नियम हर प्रकार के ज्ञान में लागू होता है।
क्या यह भेदभाव नहीं है?
नहीं, क्योंकि यह नैतिक नियम पर आधारित है। जैसे आंख होते हुए भी अंधा नहीं देख सकता। यह स्थिति का अंतर है, अधिकार का नहीं।
शीघ्र दर्शन देने वाली शक्ति का क्या आशय है?
यहां कहा गया है कि साधक को परिणाम के लिए लंबी प्रतीक्षा नहीं करनी पडती। सही साधना होने पर प्रतिक्रिया शीघ्र मिलती है। यह निकटता का संकेत है। शक्ति दूरस्थ नहीं, सुलभ मानी गई है।
इस शीघ्रता का कारण क्या बताया गया है?
कारण यह है कि साधना बाहर की नहीं, भीतर की है। भीतर परिवर्तन होने पर फल भी शीघ्र प्रकट होता है। दूरी कम होने से विलंब नहीं होता।
क्या यह दावा अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है?
नहीं, क्योंकि यहां समय की नहीं, प्रक्रिया की बात है। सही विधि अपनाने पर परिणाम तेज होता है। यह हर क्षेत्र में लागू नियम है।
सिद्धियों का उल्लेख क्यों किया गया है?
सिद्धियों का उल्लेख साधना की सामर्थ्य दिखाने के लिए है। वे लक्ष्य नहीं, उपफल हैं। मुख्य उद्देश्य अंतःशुद्धि है। सिद्धियां मार्ग में मिलने वाली क्षमताएं हैं।
क्या सिद्धियों पर ध्यान देना भटकाव नहीं है?
हो सकता है, यदि उन्हें लक्ष्य बना लिया जाए। यहां उन्हें साधना की पुष्टि के रूप में रखा गया है। साधक के लिए चेतावनी निहित है कि रुकना नहीं है।
क्या यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव नहीं हो सकता?
मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी साधना का ही अंग है। मन के बदलने से क्षमताएं बदलती हैं। इसे केवल भ्रम कहना उचित नहीं।
त्रिगुणों द्वारा सृष्टि, पालन और संहार कैसे समझाए गए हैं?
यहां कहा गया है कि तीनों क्रियाएं एक ही शक्ति के अलग-अलग रूप हैं। गुण भेद से कार्य भेद होता है। मूल शक्ति एक ही रहती है। इससे व्यवस्था की एकता स्पष्ट होती है।
इस दृष्टि से अलग-अलग देवताओं की भूमिका कैसे देखी जाए?
उन्हें स्वतंत्र इकाई नहीं, कार्य विभाजन के रूप में देखा गया है। स्रोत एक है, कार्य अनेक। यह समन्वय की दृष्टि है।
क्या इससे विविधता का महत्व घटता नहीं?
नहीं, विविधता को आधार मिलता है। जब स्रोत एक हो, तब विविध रूपों में टकराव नहीं होता। यह दृष्टि अधिक संतुलित है।
आश्रय की श्रृंखला का उदाहरण क्यों दिया गया है?
यह दिखाने के लिए कि कोई भी सत्ता पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है। हर स्तर पर किसी न किसी आधार की आवश्यकता है। अंत में सबका आधार एक ही बताया गया है। यह तर्क क्रमिक है।
पानी और पात्र का उदाहरण क्या सिखाता है?
यह सिखाता है कि शक्ति को धारण करने के लिए आधार चाहिए। बिना आधार शक्ति प्रकट नहीं हो सकती। यही संबंध यहां समझाया गया है।
क्या यह केवल रूपक नहीं है?
यह रूपक है, पर तर्कपूर्ण है। जटिल विचारों को सरल बनाने के लिए रूपक का प्रयोग किया गया है। इससे विचार स्पष्ट होता है।
निर्गुण और सगुण दोनों रूपों की बात क्यों की गई है?
ताकि यह बताया जा सके कि रूप और निराकार में विरोध नहीं है। दोनों एक ही सत्य के अलग अनुभव हैं। साधक की दृष्टि के अनुसार अनुभव बदलता है।
इससे साधना मार्ग में क्या स्पष्टता आती है?
इससे यह भ्रम दूर होता है कि एक मार्ग सही और दूसरा गलत है। मार्ग भिन्न हो सकते हैं, लक्ष्य एक है। यह समन्वय की शिक्षा है।
क्या यह दर्शन बहुत अमूर्त नहीं है?
अमूर्त है, पर जीवन से कटा नहीं। अनुभव के स्तर पर इसे समझाया गया है। इसलिए यह व्यावहारिक भी है।
पुराण के पांच लक्षणों का उल्लेख क्यों आवश्यक माना गया है?
यह तय करने के लिए कि कौन सा ग्रंथ पुराण कहलाएगा। यह स्पष्ट मापदंड देता है। मनमानी से किसी ग्रंथ को पुराण नहीं कहा जा सकता।
इन लक्षणों से क्या लाभ होता है?
इससे ग्रंथ की संरचना समझ में आती है। पाठक जानता है कि किस प्रकार का विषय कहां मिलेगा। यह अध्ययन को व्यवस्थित करता है।
क्या यह वर्गीकरण आज भी उपयोगी है?
हां, क्योंकि यह सामग्री को समझने में सहायता करता है। किसी भी विस्तृत ग्रंथ में संरचना आवश्यक होती है। यह नियम आज भी लागू है।
प्रलय और अव्यक्त अवस्था का वर्णन क्यों किया गया है?
यह दिखाने के लिए कि सृष्टि स्थिर नहीं है। सब कुछ समय-समय पर विलीन होता है। भेद समाप्त होकर एकरूपता आती है। यह चक्र का स्वभाव है।
अव्यक्त अवस्था को जल समान क्यों कहा गया है?
क्योंकि उसमें रूप और भेद नहीं रहते। सब कुछ एक समान हो जाता है। यह तुलना स्थिति को समझने में सहायता करती है।
क्या यह केवल कल्पना नहीं है?
यह दर्शन है, भौतिक विवरण नहीं। इसका उद्देश्य परिवर्तनशीलता समझाना है। इस दृष्टि से यह अर्थपूर्ण है।
तुरीय अवस्था का उल्लेख क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि यह सामान्य अनुभव से परे अवस्था बताई गई है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से आगे की चेतना का संकेत है। यही अंतिम लक्ष्य बताया गया है।
इस अवस्था को जानने का मार्ग क्या बताया गया है?
योग मार्ग के माध्यम से। बाहरी अनुभव नहीं, आंतरिक साधना द्वारा। यह चेतना का विस्तार है।
क्या यह अनुभव सभी के लिए संभव है?
संभव है, पर अभ्यास और अनुशासन से। यह स्वाभाविक स्थिति नहीं, साध्य स्थिति है। इसलिए प्रयास आवश्यक है।
तीन रूपों में प्रकट होने की बात क्यों की गई है?
यह समझाने के लिए कि एक ही शक्ति कार्य के अनुसार भिन्न रूप लेती है। रूप बदलता है, सार नहीं। इससे कार्य विभाजन स्पष्ट होता है।
इन रूपों को सृष्टि से कैसे जोडा गया है?
सृष्टि से पहले शक्ति इन रूपों में प्रकट होती है। यही सर्ग की अवस्था कही गई है। यह प्रक्रिया का प्रारंभ है।
क्या यह क्रम अनिवार्य है?
कथा के अनुसार हां। बिना शक्ति के विभाजन के कार्य संभव नहीं। यह व्यवस्था का आधार है।
त्रिदेवों की भूमिका को प्रतिसर्ग क्यों कहा गया है?
क्योंकि वे पहले से विद्यमान शक्ति के अधीन कार्य करते हैं। उनकी उत्पत्ति और कार्य दोनों उसी से जुड़े हैं। यह दूसरा चरण बताया गया है।
इससे स्वतंत्र कर्ता की धारणा पर क्या प्रभाव पडता है?
स्वतंत्रता सीमित दिखाई देती है। कार्यकर्ता होते हुए भी पूर्ण स्वाधीनता नहीं है। यह उत्तरदायित्व की दृष्टि है।
क्या इससे कर्म का महत्व घटता नहीं?
नहीं, कर्म का स्थान बना रहता है। केवल अहंकार घटता है। कर्म और विनय का संतुलन सिखाया गया है।
महाभारत को इतिहास क्यों कहा गया है?
क्योंकि उसमें घटनाएं, वंश और पात्रों का क्रमबद्ध वर्णन है। यह केवल कथा नहीं, सामाजिक स्मृति है। इसलिए इसे इतिहास कहा गया है।
इतिहास और पुराण में यहां क्या भेद बताया गया है?
पुराण सिद्धांत और चक्र पर केंद्रित हैं। महाभारत मानव आचरण और निर्णयों पर केंद्रित है। दोनों की भूमिका अलग है।
क्या महाभारत केवल अतीत की कहानी है?
नहीं, इसे आचरण का दर्पण बताया गया है। उसमें दिखे प्रश्न आज भी प्रासंगिक हैं। इसलिए यह केवल अतीत नहीं, सतत संदर्भ है।
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