
देवों और असुरों के बीच में युद्ध चल रहा था और देव हारने की हालत में आ गए थे।
तब इंद्र ने देवी माँ की स्तुति की। धन्यास्त एव तव भक्ति परा महान्तः संसार सिंधु रहिताः सुख सिंधु मग्नाः ये भक्ति भाव रहिता न कदापि दुःखां बोधिं जनिक्षय तरंग मुमे तरन्ति। आप पर जिनकी भक्ति नहीं है वे दुःख भूत संसार सागर का तरण कभी नहीं कर पाते।
पर आपकी भक्ति जिनमें है, वे बड़े धन्य हैं। वे दुख से रहित हो जाते हैं। सुख के सागर में डूबे हुए रहते हैं हमेशा।
सभी मनुष्य जो भूमि में सुख शांति से रह रहे हैं, उन सबने पूर्व जन्म में आपकी सेवा जरूर की है। ऐसे इंद्र की स्तुति सुनकर भगवती जगदंबा सिंह में आरूढ़ होकर प्रकट हो गई। दिव्य माल्य और रक्त वस्त्र को पहनकर कोटि सूर्य प्रभा देवी चामुंडा चमक रही थी। देवी देवों को देखकर मुस्कुराकर बोली,
आप लोग डरना छोड़ दीजिए। मैं आ गई हूं। मैं आपका कल्याण करूंगी। ऐसे बोलकर देवी अपने सिंह के साथ असुरों के पास जा रही थी। सारे असुर देवी मां को देखकर भयभीत हो गए।
असुर परस्पर बोल रहे थे। इसी देवी ने महिषासुर और चंडमुंड का विनाश किया था। पूर्व काल में इन्होंने ही मधु और कैटभ का भी विनाश किया था। यह देवी क्षण भर में हम लोग को विनाश कर सकती है। प्रह्लाद कहे कि युद्ध को छोड़कर सब लोग भागो। छिपकर अपनी जान बचाओ।
तब असुर गण में विद्यमान नमुची ने कहा।
यह देवी कुपित होकर हमारा विनाश करने आ रही है। हम लोग जितना भी भाग लें, उनसे बच नहीं पाएंगे। हम उनकी स्तुति करके उनको प्रसन्न करें तो वह हमें क्षमा कर सकती है। उन्होंने क्षमा कर दिया तो हम लोग बचकर पाताल में चले जाएंगे। प्रल्हाद देवी की स्तुति करने लगे। आप ही सृष्टि पालन और संहार करने वाली हैं।
आपके भक्तों पर कोई भी भय को आप आने नहीं देती। यह जगत ही आपके गले में विद्यमान माला के जैसे है। यह घूम कर आपके पास ही आ पहुंचता है। ह्रीमकार स्वरूपिणी है आप। मैं आपको नमस्कार करता हूं।
जगत के कर्ता तो जगत की सृष्टि में सिर्फ निमित्त मात्र हैं। आप ही इस जगत के मूल हैं। आपने ही जगत सृष्टा को जगत सृष्टि करने की शक्ति दी है। आप ही सारे प्राणियों के जननी कहलाई गई हैं। देवों और दैत्यों इन दोनों को भी आपने ही बनाया है। फिर हमारे ऊपर आपके दया में भेदभाव कैसे हो सकता है?
पुत्र अच्छे हो या बुरे, मां उन पर सर्वदा दया का प्रदर्शन करती है। हम पर आप दया करें।
वे देवता भी त्रिगुणों से उत्पन्न हुए हैं। हम दैत्य भी उन्हीं त्रिगुणों से उत्पन्न हुए हैं। काम क्रोधादि विकार उनमें भी है और हम में भी है।
हम सब आपके ही पुत्र हैं। हम यह भी जानते हैं कि आपके विनोद के लिए ही आपने देव दैत्यों के बीच में युद्ध की स्थिति उत्पन्न की है।
नहीं तो दोनों देव और असुर कश्यप के ही पुत्र हैं। हमारे अंदर युद्ध ही क्यों होता? मैं स्पष्ट जानता हूं कि आप ही संसार की एकमात्र शासिका हैं। फिर भी स्वर्ग में शासन को पाने के लिए आपके ही माया से प्रेरित होकर हमें युद्ध करना पड़ता है। अधिकतर लोगों को पता होता है कि लोभ गलत है। फिर भी वे लोभ के वश में हो जाते हैं। उस लोभ में जाने के लिए उनको प्रेरित करने वाली आप हैं। आपने भगवान विष्णु को जगत का पालक बतलाया है। पर सत्य कहे तो आप ही इस जगत का पालन करती हैं।
इससे स्पष्ट पता चलता है कि आप ही इस ब्रह्मांड में लोभ से रहित हैं।
आप ही धर्म के लक्षण हैं। आपने ही धर्म का इस जगत में प्रतिष्ठापन किया है। आप जो सोचती हैं, वही होता है।
आप अगर देवगण का विजय सोचे तो वे जीत जाते हैं और अगर आप सोच लें कि दैत्यगण जीते तो वे जीत जाते हैं। आप धर्म को संपूर्ण तरह से अपने वश में रखने वाली हैं। हम सभी दानव आपके शरण में आ रहे हैं। आप ही हमारी रक्षा कर सकती हैं। आप हमारी रक्षा करें। देवी माँ बोली, आप सब लोग पाताल में चले जाइए।
वहाँ पर शोक और भय से रहित होकर रहिए। आप लोग सावर्णी मन्वंतर के आदि से स्वर्ग में राज करेंगे। उस समय की प्रतीक्षा करिए। मनुष्य जो दूसरों की खुशी में खुशी को पाते हैं, वे ही हमेशा खुश रह पाते हैं। लोभी जन तो सत्य युग में भी थे। मैंने उनको हर प्रकार का सुख दिया, फिर भी वे संपूर्ण प्रकार से संतुष्ट नहीं हुए।
आप लोग पाताल में वैवस्वत मन्वंतर के अंत तक रहिए। कोई पाप मत कीजिए। उसके फल स्वरूप में आप लोगों को स्वर्ग मिलेगा। ऐसे बोलकर देवी मां अंतर्धान हो गई। उसके बाद देव स्वर्ग में चले गए और दानव पाताल में जाकर शांति से रहने लगे।
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