दुष्ट विनाशक महागणपति मंत्र

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हे भगवान : सुख , शांति , चतुराई , सुमती , धैर्य ( धीरज) तथा समृध्दी प्रदान करे । प्रत्येक ( हर ) दिन का अच्छा काम ( कार्य ) साकार करे । लगन ( तल्लीनता ) , अच्छाई प्रदान करे , बुराई से दुर रखे । अच्छाई के समीप ( पास ) रखे । लडाई में कौशल्य ( कुशलता ) , निपुणता प्रदान करे । प्रत्येक ( हर ) साल ( वर्ष ) ' AXI ' grading प्रदान करे । हमारे दुश्मन हम से कोसो दुर जाकर मारे जाए । बुराईयाँ हम से कोसो दुर जाकर जलकर भस्म हो जाए । हमें स्वस्थ रखे । हमें सदाचारी , सुविचारी तथा संस्कारी बनाए रखे । भोजन ( खाना ) , धन , पढाई - लिखाई प्रदान करे । रोटी , कपडा और मकान प्रदान करे । हमे ताकत ( शक्ति ) तथा हिम्मत प्रदान करे । हमारी बोली - भाषा , उच्चारण तथा वाणी ठीक रखे । हे भगवान हमें तरक्की प्रदान करे । मैं ईमानदार , वफादार , सच्चा तथा अच्छा रहुँ । प्रत्येक ( हर ) फैसला सच्चाई , अच्छाई , ईमानदारी तथा वफादारी के पक्ष में हो । हमारा घर - परिवार आशा , दया , माया , करुणा , श्रध्दा , भक्ति , भगत तथा भरोसे के दीपक की तरह रोशन ( रखे ) रहे । भगवान हमें ज्ञान चक्षु तथा अच्छा जीवन ( जिंदगी ) प्रदान करे । मैं बड़ो का आदर करुँ । जय श्री गणेश जी की । -khushbu lodha

Pratham Pujniye Shree Ganesh Ji Maharaj ko Koti Koti Pranam🙏🙏🙏🙏 -Rakesh Gupta

मैं इसे हर दिन सुनता हूं...गणेश जी मुझे आशीर्वाद दें...😌 -Girish Rajpurohit

मेरे विघ्न दूर करो... मेरी रक्षा करो... गणेश जी.... 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 -Sharvari Pathak

Ganpati baba moriya 🙏 -Uttamkumar Panwala

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क्या व्रत करना जरूरी है?

व्रत करने से देवी देवता प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। जीवन में सफलता की प्राप्ति होती है। मन और इन्द्रियों को संयम में रखने की क्षमता आती है।

भागवत के मार्ग में ज्ञान और वैराग्य कैसे विकसित होते हैं?

भागवत के मार्ग में साधक को केवल भगवान में रुचि के साथ उनकी महिमाओं का श्रवण यही करना है। भक्ति अपने आप विकसित होगी। भक्ति का विकास होने पर ज्ञान और वैराग्य अपने आप आ जाएंगे।

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वैनतेय किसे कहते है ?

ॐ नमो महागणपतये महावीराय दशभुजाय मदनकालविनाशन मृत्युं हन हन यम यम मद मद कालं संहर संहर सर्वग्रहान् चूर्णय चूर्णय नागान् मूढय मूढय रुद्ररूप त्रिभुवनेश्वर सर्वतोमुख हुं फट् स्वाहा । ....

ॐ नमो महागणपतये महावीराय दशभुजाय मदनकालविनाशन मृत्युं हन हन यम यम मद मद कालं संहर संहर सर्वग्रहान् चूर्णय चूर्णय नागान् मूढय मूढय रुद्ररूप त्रिभुवनेश्वर सर्वतोमुख हुं फट् स्वाहा ।

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