
अपने कर्तव्य को निभाते रहना ही धर्म का आचरण है। लेकिन कर्तव्य क्या है, यह कैसे पता चलेगा? धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने से, समझने से, उनमें जो अच्छे पात्र हैं, उन्होंने हर परिस्थिति में कैसे व्यवहार किया, इसे देखकर हम भी अपने जीवन में उन आदर्शों को ला सकते हैं। यही धार्मिक ग्रंथों का उद्देश्य है। उपनिषदों में भी ऐसी कहानियां हैं जो प्रेरणात्मक हैं। छांदोग्य उपनिषद में सत्य काम की कहानी है। सत्यकाम गुरुजी के पास गए विद्या प्राप्ति के लिए, पर गुरुजी ने सत्यकाम को जंगल भेज दिया 400 गायों के साथ। इन्हें छड़ाओ, जब ये हज़ार हो जाएंगे तो मेरे पास लेकर आना। क्या आज ये हो सकता है? मैं क्यों मास्टर की गायों को चराऊंगा? वे खुद करें। उस जमाने में गुरु शुश्रूषा एक कर्तव्य था। स्वधर्म था। छात्र का धर्म था ये। आज हम फीस भरकर स्कूल में पढ़ते हैं। इसमें शायद इसकी आवश्यकता नहीं है। छात्र को ज्ञान मिल रहा है, अध्यापक को वेतन मिल रहा है। हमने शिक्षा को भी वाणिज्यिक, व्यापारिक और व्यावसायिक कर दिया है। भूमिका बदल चुकी है, पर उस जमाने की बात अलग थी। सत्यकाम ने गुरु सुश्रृषा के द्वारा क्या पाया इसे देखते हैं। सत्यकाम ने अच्छे से देखभाल की गायों की। वे हजार हो गई। जब उन्हें लेकर सत्यकाम आश्रम की ओर लौट रहे थे, रास्ते में एक बैल, अग्नि, एक हंस और एक मुर्गा भी ने उन्हें पूरा ज्ञान दे दिया। गुरुजी के पास पहुंचने से पहले ही सत्यकाम को संपूर्ण ज्ञान मिल गया। इन चारों ने सत्यकाम से कुछ शब्द बोले जिनमें संपूर्ण वेद शास्त्रों का ज्ञान छिपा हुआ था, बीज की तरह। सत्यकाम को पहले समझ में नहीं आया। ये मुझे ये सब क्यों बता रहे हैं? गुरुजी के पास जाकर बोले, मैं आपसे सीखना चाहता हूं। आपने जो भी बताया उसे करके आया हूं। गुरुजी बोले, अब मुझसे क्या सीखोगे? तुम्हारे पास पूरा ज्ञान आ चुका है। उन चारों ने तुम्हें जो बताया, वही संपूर्ण ज्ञान है। अब ये तुम्हारे अंदर अपने आप विकसित हो जाएगा। तुम्हें कुछ पढ़ने सीखने की जरूरत नहीं है। महाभारत में भी हमने देखा कैसे आरुणी ने, उपमन्यु ने और वेद ने कैसे केवल गुरु की शुश्रूषा करके संपूर्ण ज्ञान को पाया। वो पद्धति अलग थी। ऐसा नहीं है कि गुरु जी का इसमें कोई योगदान नहीं था। गुरु जी ने ही दिलाया ज्ञान इन माध्यमों से। हजारों सालों में भी वेद का ज्ञान नहीं मिल पाएगा बैठकर पढ़ने लगोगे तो। पर गुरुजी ने क्या किया उसी ज्ञान को बीज के रूप में शिष्य के अंदर डलवा दिया जो अपने आप विकसित होता रहेगा। उपकौशल सत्यकाम के शिष्य थे। 12 साल सीखने के बाद भी उपकौशल का ज्ञान अधूरा था। एक बार सत्यकाम बाहर कहीं गए हुए थे। अपनी अग्निहोत्र की अग्नि जो है उसकी देखभाल उपकौशल को सौंपकर। मतलब उनकी अनुपस्थिति में उपकौशल ही उस अग्नि की देखभाल करता रहा। उस अग्नि ने उपकौशल को संपूर्ण ज्ञान दे दिया। सब कुछ एक दूसरे से संबंधित है। यहां महाभारत में जब तक्षक ने उत्तंग के पास जो कुंडल थे, जिन्हें वे अपनी गुरुपत्नी को दक्षिणा के रूप में देने ले जा रहे थे, जब तक्षक उन्हें छुरा कर लेकर गया। तब देवेंद्र उत्तंक की सहायता करने आए। उत्तंक इंद्रदेव का कोई उपासक नहीं था। तब भी सहायता मिली, कैसे? उत्तंक ने अच्छे से गुरु शुशरूषा की थी। अपना कर्तव्य निभाया था इसलिए। एक और बात, जिसको आपने मदद किया, कोई ज़रूरी नहीं है कि वही आपका मदद करेगा। पर एक बात ज़रूर है, अगर आपने किसी का मदद किया है तो ज़रूरत पड़ने पर आपको भी मदद मिलेगा कहीं से, किसी से। जैसे बैंक में पैसा जमा करने पर जब निकालने जाओगे तो वही नोट वापस नहीं आता ना, ठीक उसी प्रकार। जिसको आपने मदद किया, अगर उसी से प्रत्युपकार की उम्मीद रखोगे तो वो वाणिज्य है, पुण्य नहीं, धर्म नहीं। समंदर किनारे बैठकर मानो कि आपने कुछ एक वस्तु लहर पर डाल दिया। वही लहर उसे दोबारा आपके पास लेकर नहीं आएगी ना? दूसरी लहर लेके आएगी इसी प्रकार। पर सोचने वाली बात यह है कि इतने अच्छे शिष्य थे उत्तंग, कोई कमी त्रुटि नहीं थी उनमें। फिर भी वे ऐसी परिस्थिति में क्यों पड़े? याद है उन्हें कुंडल देते समय रानी क्या बोली थी? रानी ने क्या चेतावनी दी? सावधान रहना, तक्षक की नजर है इसके ऊपर। तब उत्तंग ने क्या कहा? तक्षक मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। अहंकार। ज्ञानी हैं, धर्मिष्ठ हैं, तब भी अहंकार आ गया उनके अंदर। सप्तशती में बोला है ना ज्ञानी नाम विजेतांसि देवी भगवती हि सा बलाद आगृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। यही हुआ। और उस अहंकार का फल स्वरूप यह सब हो रहा था।
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