उसने बस तीन बार 'राम' कहा...

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उसने बस तीन बार 'राम' कहा...

 

तुलसीदास जी ने तोते के रामनाम जपने के बारे में कथन किया था। रामनाम को बोलने से ही सब कुछ मिल जाता है। अर्थ को जानिए या न जानिए, कोई भेद नहीं है।

वाल्मीकि जी की कथा सुनी है हमने — व्याध थे वो। रामनाम को भी उल्टा सीखा उन्होंने, वैसे ही जपते रहे और सिद्धि को प्राप्त कर लिए। ये है रामनाम की महिमा।

करनाटक संगीत में, राग यमुनाकल्याणी में सदाशिव ब्रह्मेंद्र जी द्वारा रचित रामनाम के बारे में एक सुन्दर कीर्तन है — 'पिबरे रामरसं'। इस कीर्तन को आप वेदधारा के वेबसाइट में कीर्तन के रूप में सुन भी सकते हैं।

अभी हम इसका भावार्थ देखते हैं — 'पिबरे रामरसं, रसने पिबरे रामरसं'। कवि अपनी जिह्वा, जीव से कह रहे हैं कि रामरस को पियो। रामरस का अर्थ क्या है? जब हम राम नाम का उच्चारण करते हैं, तब हमारे मुख में जो रस होता है, उसका स्वाद अमृत के समान होता है। कवि अपनी जिह्वा से कह रहे हैं — बार-बार रामनाम का उच्चारण करो और उस अमृत रूपी रस को पियो।

अब बताते हैं रामरस के कुछ विशेष:

'दूरी कृतपातक समसर्गं
पूरित नानाविध फलवर्गं
पिबरे रामरसं रसने'

जो अपने उच्चारण के कारण सारे पापों को दूर कर देता है। सही बात है — रामनाम का उच्चारण करते रहिए, कोई भी पाप आपको छू तक नहीं पाएगा। रामनाम बहुत प्रकार के फलों से भरपूर है — धर्म, अर्थ, काम, स्वर्ग, सुख, संपत्ति, आनंद, मोक्ष — ऐसे फलों के समूहों से जो भरपूर है, उस रामरस को पियो।

मरण, मृत्यु — इन दोनों से जो भय उत्पन्न होता है, वह प्राकृतिक है — कहीं अचानक मृत्यु न आ जाए, कहीं मुझे फिर से जन्म लेकर कष्ट न भोगना पड़े। इन दोनों का डर और उस डर से उपजे दुख को मिटा देता है रामरस। कैसे? मोक्ष को प्राप्त कराके।

रामरस सभी शास्त्र, वेद और आगम का सार है। कवि अपने जीव से कहते हैं कि इस रामरस को पियो।

'परिपालित सरसिजगर्भाण्डं
परमपवित्रीकृत पाशाण्डं
पिबरे रामरसं रसने'

इस जगत्रूपी कमल को जो परिपालन करता है, वह है रामरस। जो नास्तिकों को भी पवित्र कर देता है, वह है रामरस। उस रामरस को पियो — ऐसा कवि अपनी जिह्वा से कह रहे हैं।

'शुद्ध परमहंस आश्रमगीतं
शुकशौनक कौशिकमुखपीतं
पिबरे रामरसं रसने'

परमहंस संज्ञा श्रेष्ठ सन्यासियों को दी जाती है। सन्यास आश्रम में भी गाया जाने वाला है रामरस। वह भी शुद्ध परमहंसों द्वारा गाया जाता है। शुक, शौनक, कौशिक — इन जैसे महर्षियों के मुख से जो पिया गया है, वह है रामरस। कवि अपनी जिह्वा से कह रहे हैं — इस रामरस को पियो।

इस भावपूर्ण कीर्तन को सुनकर हम रामनाम की महिमा को भी जान लेते हैं और हमें रामनाम बार-बार बोलने की इच्छा भी होती है।

रामनाम जाप का और भी महत्व है। विष्णु सहस्रनाम की फलश्रुति में कहा गया है:

'राम रामेति रामेति
रमे रामे मनो रमे
सहस्रनाम तत्त्वल्यं
राम नाम वरानने'

अगर आप मन से रामजी का चिंतन करते हुए राम नाम तीन बार कहेंगे, तो पूरे विष्णु सहस्रनाम पारायण के तुल्य फल मिलेगा। इतनी शक्ति है रामनाम में।

प्रह्लाद कहते हैं:

'राम नाम जपतां कुतो भयम्
सर्वतापशमनं भेषजम्
पश्यतात्तमं गात्रसन्निधौ
पावकोऽपि सलिलायते धुना'

जो रामनाम जपते हैं, उन्हें किस बात का भय? यह रामनाम सभी प्रकार के तापों को नष्ट करने वाला, औषधि स्वरूप है। आप प्रत्यक्ष मुझे देख लीजिए — मेरे शरीर के समीप अग्नि भी आ जाए, तो वह मुझे नहीं जला पाती; ऐसा लगता है जैसे जल स्पर्श कर रहा हो। ये है रामनाम की महिमा।

कोई भी पुराण हो, संहिता हो, इतिहास हो या काव्य — अगर उसमें 'राम' शब्द नहीं है, तो वह ग्रंथ कहने योग्य नहीं है।

वाल्मीकि रामायण में 2546 बार राम नाम का उल्लेख है। ठीक है, रामायण तो रामजी की कथा है — उसमें तो राम नाम होगा ही।

महाभारत में 504 बार राम नाम है। अग्नि पुराण में 106 बार, गरुड पुराण में 46 बार, कूर्म पुराण में 40 बार, स्कन्द पुराण में 38 बार, लिंग पुराण में 17 बार, नाट्यशास्त्र में 14 बार, मत्स्य पुराण में 12 बार, बुद्ध चरित में भी 6 बार रामनाम का उल्लेख है।

इसके अलावा भागवत पुराण, हितोपदेश, हरीभक्तिविलास, गीत गोविंद, दशकुमार चरित, चरक संहिता, हठयोग प्रदीपिका, कृषिपराशर — इन सब में राम नाम का उल्लेख है। कहां नहीं है राम नाम? जैसे रामजी हर जगह हैं, वैसे ही रामनाम भी हर जगह है।

'अविकारी विकारी वा
सर्वदोषीक भाजनः
परमेश पदं याति
राम नामानु कीर्तनात्'

मनुष्य विकारयुक्त हो या अयुक्त हो, चाहे उस पर जितने भी दोष हों — यदि वह रामनाम जपे, तो रामजी के परमपद को प्राप्त करता है।

'रामेति रामभद्रेति
रामचंद्रेति वा स्मरणम्
नरो न लिप्यते पापैः
भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति'

रामनाम का स्मरण करने वाला व्यक्ति पापों से लिप्त नहीं होता। वह भोग और मोक्ष — दोनों प्राप्त करता है।

'जगत्जैत्रैक मन्त्रेण
राम नाम न अभिरक्षितम्
यः कण्ठे धारयेत् तस्य
करस्थाः सर्वसिद्धयः'

जगत को जीतने वाला एकमात्र मंत्र है — रामनाम। जो इसे माला में अभिमंत्रित कर अपने कंठ में धारण करता है, उसके हाथ में सभी सिद्धियां आ जाती हैं।

'भर्जनं भवबीजानां
मर्जनं सुखसंपदाम्
तर्जनं यमदूतानां
रामरामेति गर्जनम्'

रामनाम — पुनर्जन्म रूपी बीजों को भस्म करता है। सुख-संपत्ति को आकर्षित करता है। यमदूतों को डराकर दूर करता है। गर्जना स्वरूप जप किया गया रामनाम सभी को मोक्ष की ओर ले जाता है।

हम लोग रामनाम जपते रहेंगे, तो हर प्रकार के फल को अवश्य प्राप्त करेंगे। और अंततः रामजी के शरण में भी निश्चित रूप से प्राप्त होंगे।

 

  • रामनाम का जप बिना अर्थ जाने भी फलदायक होता है; केवल उच्चारण से ही महान फल प्राप्त होते हैं।

  • वाल्मीकि जैसे व्याध भी रामनाम के प्रभाव से महान ऋषि बन सकते हैं — नाम का प्रभाव दिशा से नहीं, भावना और निरंतरता से होता है।

  • रामरस एक आंतरिक अनुभव है — यह जिह्वा पर आते ही अमृत-समान सुख देता है और चेतना को जाग्रत करता है।

  • यह नामस्मरण पापों को नष्ट करता है, शुभ फलों को आकर्षित करता है, और मोक्ष तक की राह दिखाता है।

  • मृत्यु और पुनर्जन्म का भय रामनाम से दूर होता है — यह जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठने का साधन है।

  • यह केवल भक्तों को नहीं, अविश्वासियों और पथभ्रष्टों को भी शुद्ध कर सकता है।

  • सभी वेद, शास्त्र, उपनिषद और पुराणों का सार यदि किसी एक तत्व में समाया है, तो वह है रामनाम।

  • यह रस परमहंसों द्वारा गाया गया, महर्षियों द्वारा पिया गया, और तपस्वियों द्वारा संजोया गया दिव्य अनुभव है।

  • विष्णु सहस्रनाम जितना फल केवल तीन बार 'राम' नाम कहने से प्राप्त होता है — यह नाम स्वयं एक संपूर्ण मंत्र है।

  • यह केवल साधकों के लिए नहीं, रोगी, दुखी, भयभीत — सबके लिए आश्रय और औषधि है।

  • रामनाम इतिहास, पुराण, आयुर्वेद, योग, काव्य — हर ग्रंथ में विद्यमान है, क्योंकि यह सार्वभौमिक है।

  • चाहे कोई कितना ही दोषयुक्त क्यों न हो, रामनाम के जप से उसे भी भगवत्प्राप्ति का अधिकार है।

  • यह नाम स्मरण करने वाले को पाप नहीं छू सकते — वह भोग भी करता है और मोक्ष भी पाता है।

  • जो रामनाम से युक्त माला धारण करता है, वह सिद्धियों को भी सहज रूप से प्राप्त करता है।

  • यह पुनर्जन्म के बीजों को नष्ट करता है, संपत्ति को आकर्षित करता है, यमदूतों को पराजित करता है।

  • रामनाम का जप सभी फल प्रदान करता है — सांसारिक भी और आध्यात्मिक भी।


रामनाम का उच्चारण केवल जिह्वा से क्यों फलदायक माना गया है?
रामनाम में ध्वनि-संवेदन का ऐसा बल है जो चेतना को शुद्ध करता है। चाहे भाव हो या न हो, उसका कंपन मन पर असर करता है। ठीक वैसे ही जैसे अग्नि बिना संकल्प के भी जला देती है।

क्या सिर्फ उच्चारण से ही लाभ हो सकता है, भाव और समझ जरूरी नहीं?
जी हां, शुरुआत में केवल नाम जपना भी प्रभावशाली होता है। बाद में भाव और समझ अपने आप जुड़ जाते हैं।

अगर कोई कहे कि बिना अर्थ जाने मंत्र जप अंधश्रद्धा है तो?
यह वैज्ञानिक रूप से गलत है। ध्वनि का प्रभाव मनोविज्ञान पर प्रमाणित है। नाम के कंपन चेतना के स्तर बदलते हैं — इसका असर अनगिन साधकों ने अनुभव किया है।


रामनाम से पाप कैसे नष्ट हो जाते हैं?
पाप मानसिक संस्कारों के रूप में जमा होते हैं। नामजप निरंतर चलते ही उन पर नई सकारात्मक तरंगें बैठती हैं, जो उन्हें निष्क्रिय कर देती हैं।

क्या कोई बहुत पापी भी इस प्रभाव का अनुभव कर सकता है?
बिलकुल। वाल्मीकि इसका जीवंत उदाहरण हैं। नाम की शक्ति किसी के भी जीवन को मोड़ सकती है।

अगर कोई कहे कि पाप का नाश कर्म से होगा, नाम से नहीं — तो क्या जवाब है?
कर्म और नामजप दोनों की दिशा एक ही है — शुद्धि। पर नामजप भीतर से पवित्रता जगाकर सही कर्म की प्रेरणा देता है। इसलिए यह आधारभूत उपाय है।


रामनाम से मृत्यु और पुनर्जन्म का भय क्यों मिटता है?
क्योंकि यह नाम आत्मा को उसकी अमरता का बोध कराता है। जब 'मैं शरीर नहीं' यह भाव जागता है, तब मृत्यु भय नहीं देती।

क्या हर किसी को मोक्ष की इच्छा होती है?
शुरुआत में नहीं, लेकिन जब मृत्यु का भय सताने लगे तब यह नाम उस राह की ओर खींचता है। यह स्वयं चेतना को मोक्ष के योग्य बनाता है।

अगर कोई कहे कि डर भगाने के लिए नाम का सहारा लेना कमजोरी है?
डर से जूझना बुद्धिमानी है, उससे भागना नहीं। नाम स्मरण डर को देखने, समझने और पार करने की शक्ति देता है — यह कायरता नहीं, आंतरिक साहस है।


क्या रामनाम केवल भक्तों के लिए है?
नहीं, यह हर जीव के लिए है। नास्तिक, संशयी, कष्ट में पड़े व्यक्ति — सब इसे जप सकते हैं।

कोई मार्गभ्रष्ट व्यक्ति इसका कैसे उपयोग करे?
वह केवल नाम जपना शुरू करे — धीरे-धीरे मार्गदर्शन और परिवर्तन दोनों अपने आप होंगे।

अगर कोई कहे कि बिना श्रद्धा के यह नाम व्यर्थ है?
शुरुआत श्रद्धा से नहीं, अभ्यास से होती है। श्रद्धा धीरे-धीरे पनपती है, नाम का असर पहले से शुरू हो जाता है।


क्या सारे शास्त्रों का सार वाकई रामनाम में समाया है?
हां, क्योंकि सभी शास्त्र आत्मा की मुक्ति का मार्ग बताते हैं और यह नाम उसी अनुभव तक ले जाता है।

क्या यह ज्ञान के स्थान पर नाम को प्राथमिकता देना नहीं है?
यह विकल्प नहीं, मार्ग है। ज्ञान और नाम दोनों अंततः एक ही सत्य तक पहुंचाते हैं।

अगर कोई कहे कि इतना सब एक शब्द में कैसे समा सकता है?
जैसे बीज में पूरा वटवृक्ष छिपा होता है, वैसे ही नाम में संपूर्ण तत्वज्ञान सन्निहित होता है।


रामनाम केवल साधना नहीं, रस क्यों कहा गया है?
क्योंकि यह जप केवल क्रिया नहीं — यह अनुभव है। इसका स्वाद भीतर आनंद का स्रोत बनता है।

क्या यह रस हर कोई महसूस कर सकता है?
हां, निरंतर जप करने पर ये रस अनायास ही महसूस होने लगता है। यह अभ्यास पर आधारित है।

अगर कोई कहे कि ये सिर्फ कल्पना है, तो?
कल्पना नहीं, अनुभूति है। लाखों साधकों ने इसे अनुभव किया है — ये कोई मत नहीं, प्रत्यक्ष प्रमाण है।


क्या यह नाम हर ग्रंथ में आता है?
लगभग सभी प्रमुख शास्त्रों, इतिहासों, उपनिषदों और योग ग्रंथों में रामनाम का उल्लेख मिलता है।

क्या इस नाम की उपस्थिति सबूत है इसकी महिमा का?
हां, बार-बार उल्लेख यह दिखाता है कि यह नाम सार्वकालिक और सार्वभौमिक महत्व रखता है।

अगर कोई कहे कि ये बस धार्मिक प्रचार है?
तथ्य इसे झुठलाते हैं। जब इतने विविध शास्त्रों में एक नाम बार-बार आता है, तो वह प्रचार नहीं, सार्वभौमिक सत्य होता है।


रामनाम जपने वाला पापों से अछूता कैसे रहता है?
क्योंकि यह नाम मन को इतना निर्मल बनाता है कि पाप-संस्कार टिक ही नहीं पाते।

क्या इस जप से भोग और मोक्ष दोनों मिलते हैं?
हां, यह जप सांसारिक इच्छाएं भी संतुलित करता है और अंत में आत्मा को मुक्त करता है।

अगर कोई कहे कि दो विपरीत फल कैसे संभव हैं?
यह विरोध नहीं है — यह क्रम है। पहले मन शांत होता है, फिर भोग संयमित होता है, फिर मोक्ष की ओर बढ़ता है।


क्या रामनाम जपने से सिद्धियाँ मिलती हैं?
जो मन एकाग्र होता है, उसमें योगिक शक्तियाँ स्वतः जागती हैं। यह नाम मन को उसी एकाग्रता की ओर ले जाता है।

क्या माला पहनना भी प्रभावशाली है?
हां, जब वह नाम-जप से अभिमंत्रित होती है, तब वह स्मरण और रक्षा दोनों का माध्यम बनती है।

अगर कोई कहे कि सिद्धियाँ तो अभ्यास से आती हैं, नाम से कैसे?
नामजप ही अभ्यास का मूल है। यह चेतना को इतनी स्थिरता देता है कि सिद्धियाँ सहज बन जाती हैं।


रामनाम यमदूतों से भी रक्षा करता है — कैसे?
क्योंकि यह नाम आत्मा को उच्चतर लोक की ओर खींचता है। जहां यह नाम है, वहां भय और बंधन नहीं ठहरते।

क्या मृत्यु के समय नाम का स्मरण पर्याप्त है?
यदि जीवनभर अभ्यास किया है, तो अंतिम क्षणों में वही नाम रक्षा करता है।

अगर कोई कहे कि ये सिर्फ भावनात्मक सांत्वना है?
नहीं, यह सांत्वना नहीं — जीवनभर के अभ्यास का परिणाम है। रामनाम मृत्यु में नहीं, चेतना के पार जाने में सहायक है।

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