अर्जुन का विशेष प्रशिक्षण 

जब द्रोणाचार्य ने कौरव और पांडव राजकुमारों को अपना शिष्य बनाया, तो उन्होंने उन्हें सभी तरह के दिव्य और साधारण हथियार चलाना सिखाना शुरू किया। कई दूसरे राजकुमार भी उनसे सीखने आए। उन्हीं में से एक कर्ण था, जो अर्जुन का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बन गया और अक्सर दुर्योधन का साथ देता था।

शुरू से ही अर्जुन अपनी लगन और सीखने के जुनून की वजह से सबसे अलग थे। उनका समर्पण अटूट था, जिसके कारण वह हथियार चलाने में बेहद कुशल, तेज और अचूक बन गए। उनकी यह निष्ठा देखकर द्रोण समझ गए कि अर्जुन ही उनके सबसे प्रतिभाशाली शिष्य हैं।

अर्जुन का समर्पण इतना मज़बूत था कि उसने उनके गुरु के भेदभाव को भी हरा दिया। द्रोण अपने पुत्र अश्वत्थामा को अकेले में विशेष शिक्षा देना चाहते थे। रोज़ाना सभी शिष्य नदी से पानी भरने जाते थे। द्रोण ने अपने बेटे को एक चौड़े मुँह का घड़ा दिया ताकि वह जल्दी पानी भरकर गुप्त शिक्षा के लिए लौट आए। लेकिन अर्जुन ने अपनी चतुराई से वरुणास्त्र का प्रयोग कर अपना घड़ा पल भर में भर लिया। वह रोज़ अश्वत्थामा के साथ ही लौटते और इस तरह कभी भी उन विशेष तकनीकों से वंचित नहीं रहे। उनकी इस सूझबूझ और लगन ने उन्हें द्रोण का सबसे असाधारण शिष्य साबित कर दिया।

द्रोण ने अर्जुन की एकाग्रता को और परखने का निश्चय किया। उन्होंने अपने रसोइए को गुप्त रूप से कहा कि अर्जुन को कभी अँधेरे में भोजन न परोसे। एक रात, जब अर्जुन भोजन कर रहे थे, तो हवा के झोंके से दीपक बुझ गया। घने अँधेरे में भी उन्होंने महसूस किया कि अभ्यास के कारण उनका हाथ अपने आप निवाले को सीधा मुँह तक ले जा रहा था। इससे उन्हें प्रेरणा मिली: अगर उनका हाथ अँधेरे में काम कर सकता है, तो उनका निशाना भी लग सकता है। उन्होंने तुरंत रात में धनुष का अभ्यास करना शुरू कर दिया।

जब द्रोण ने अर्जुन को रात में अभ्यास करते देखा, तो वे अपने शिष्य का ऐसा गहरा समर्पण देखकर भावुक हो गए। उन्होंने अर्जुन को गले लगाया और गर्व से वचन दिया, "इस संसार में तुमसे बड़ा कोई धनुर्धर नहीं होगा।"

इसी अद्वितीय समर्पण के कारण, द्रोण ने अर्जुन को वह विशेष और उच्च शिक्षा दी जो किसी और को नहीं मिली। उन्होंने अर्जुन को घुड़सवारी, हाथी पर बैठकर और रथ पर लड़ना सिखाया, साथ ही गदा और तलवार जैसे हथियारों में निपुण बनाया। इस विशेष प्रशिक्षण ने अर्जुन को सभी शिष्यों में सर्वश्रेष्ठ योद्धा बना दिया।

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