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इस प्रवचन से जानिए - १. गौ माता की उत्पत्ति कैसे हुई? २. गौ पूजा मंत्र ३. गौ पूजन के लाभ

Knowledge Base

गौ माता की उत्पत्ति कैसे हुई?
गौ माता सुरभि को गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शरीर के बाएं हिस्से से उत्पन्न किया। सुरभि के रोम रोम से बछड़ों के साथ करोड़ों में गायें उत्पन्न हुई।

क्षीरसागर की उत्पत्ति कैसे हुई?
रसातल में रहनेवाली सुरभि के दूध की धारा से क्षीरसागर उत्पन्न हुआ। क्षीरसागर के तट पर रहने वाले फेनप नामक मुनि जन इसके फेन को पीते रहते हैं।

सुरभी की पुत्रियां कौन हैं?
सुरभि की चार पुत्रियां हैं- सुरूपा, हंसिका, सुभद्रा, सर्वकामदुघा। ये क्षीरसागर की पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर से रक्षा करती हैं।

गोलोक कहां है?
महाभारत अनुशासनपर्व.८३.१४ के अनुसार गोलोक देवताओं के लोकों के ऊपर है- देवानामुपरिष्टाद् यद् वसन्त्यरजसः सुखम्।

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कामधेनु की उत्पत्ति के बारे में किस पुराण में बताया है?

इस प्रवचन के दो उद्देश्य हैं। पहला, गौ माता के भक्त उनके बारे में और थोड़ा जान लें। वेदों में, पुराणों में, इतिहासों में, गौ माता की महिमा का उल्लेख अनंत है। हम सिर्फ एक नजर डाल पाएंगे इन के ऊपर। दूसरा, जो ल....


इस प्रवचन के दो उद्देश्य हैं।

पहला, गौ माता के भक्त उनके बारे में और थोड़ा जान लें।

वेदों में, पुराणों में, इतिहासों में, गौ माता की महिमा का उल्लेख अनंत है।

हम सिर्फ एक नजर डाल पाएंगे इन के ऊपर।

दूसरा, जो लोग गौ माता के भक्त नहीं हैं, उन्हें ये जानने के लिए कि गौ माता के प्रति भक्ति श्रद्धा का धार्मिक आधार क्या है?

और इसको समझते हुए, अपने सहजीवियों कि भावनाओं को महत्ता देते हुए, एक सहयोग का रास्ता कैसे अपनाना चाहिए।

गौ माता की उत्पत्ति कैसे हुई?


ब्रह्मवैवर्त पुराण में गौ माता की उत्पत्ति के बारे में कहा गया है।
इसे सुरभ्युपाख्यानम् कहते हैं।

नारद महर्षि भगवान श्रीमन्नारायण से बोले: हमने सुना है कि गौ माता गौ लोक से आई है।

उनकी कथा हमें कृपा करके सुनाइए।

भगवान श्रीमन्नारायण ने कहा: हां, सही है।

गौ वंश में सबसे पहली सुरभि नाम वाली गौ माता ही है और उन का उद्भव गोलोक में ही हुआ था।

उन का वृंदावन में कैसे जन्म हुआ, मैं सुनाता हूं।

एक बार भगवान श्रीकृष्ण, राधा और गोपी जनों के साथ वृंदावन में गुप्त रूप से रहकर मनोरंजन कर रहे थे।

उन को दूध पीने की इच्छा हुई।

उन्हों ने अपने शरीर की बायें तरफ से बछड़े के साथ गौ माता को उत्पन्न किया।

यहां पर एक विशेष बात है।

श्रीमद् देवी भागवत नवम स्कंध में राधा के बारे में कहा है:

सर्वयुक्ता च सौभाग्यदायिनी गौरवान्विता।
वामाङ्गार्धस्वरूपा च गुणेन तेजसा समा।

यहां पर राधा को श्री हरि की वामांगार्धस्वरूपा कहा गया है।

मतलब श्री हरि के शरीर का बायां हिस्सा राधा का स्वरूप है और राधा सौभाग्यदायिनी और गुणों में और तेज में श्री हरी के समान है।

गौ माता भी श्री कृष्ण के शरीर के बायें हिस्से से उत्पन्न हुई हैं।

अब समझ में आता है कि गौ माता में इतनी शक्ति क्यों है।

क्योंकि गौ माता भगवान श्री कृष्ण के शरीर से उत्पन्न हुई।

उन के शरीर के बायें हिस्से से उत्पन्न हुई।

एक रत्न के पात्र में सुरभि का दोहन किया गया।

गुण में वह दूध अमृत से भी था श्रेष्ठ।

श्री हरि ने इस गरम दूध को पिया और उसके बाद किसी प्रकार से वह पात्र नीचे गिर गया।

और उस गिरे हुए दूध से, सौ योजन लंबा चौडा दूध का एक तालाब बन गया वृंदावन में।

उसका नाम था क्षीरसरोवर।

सुरभि के रोम रोम से करोड़ों में बछड़ों के साथ गायें उत्पन्न हुई।

इनका वंश ही सारी दुनिया में फैला।

सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण ने ही गौ पूजा की थी।

ॐ सुरभ्यै नमः- यह गौ माता का मंत्र है।

इसे सिद्ध करने के लिए, एक लाख जप करना चाहिए।

सिद्ध होने पर यह मंत्र सब कुछ दे देता है।

दिया जलाकर, कलश में, गाय के सिर पर, गाय को बांधने वाले खंबे पर, सालग्राम के ऊपर, जल में या अग्नि में, पूजा की जा सकती है।

प्रार्थना की जाती है कि-

ऋद्धिदां वृद्धिदां चैव मुक्तिदां सर्वकामदाम्।
लक्ष्मीस्वरूपां परमां राधां सहचरीं पराम्।
गवामधिष्ठातृदेवीं गवामाद्यां गवां प्रसूम्।
पवित्ररूपां पूज्यां च भक्तानां सर्वकामदाम्।
यया पूतं सर्वविश्वं तां देवीं सुरभीं भजे।

जो व्यक्ति गौ पूजा करेगा वह खुद पूजनीय बन जाएगा।

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