भूमि एवं संपत्ति प्राप्ति के लिए भू सूक्त

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fmbsn
वेदधारा का कार्य सराहनीय है, धन्यवाद 🙏 -दिव्यांशी शर्मा

मंत्र बहुत उपयोगी है व्यावहारिक रूप से। 🙏 -आदर्श गुप्ता

यह वेबसाइट बहुत ही उपयोगी और ज्ञानवर्धक है।🌹 -साक्षी कश्यप

बहुत बढिया चेनल है आपका -Keshav Shaw

मंत्र सुनकर अलौकिकता का अनुभव हुआ 🌈 -मेघा माथुर

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यजुर्वेद से दिव्य मार्गदर्शन

यजुर्वेद का पवित्र आदेश है कि यह चराचरात्मक सृष्टि परमेश्वर से व्याप्य है, जो सर्वाधार, सर्वनियन्ता, सर्वाधिपति, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, और सभी गुणों तथा कल्याण का स्वरूप हैं। इसे समझते हुए, परमेश्वर को सदा अपने साथ रखें, उनका निरंतर स्मरण करें, और इस जगत में त्यागभाव से केवल आत्मरक्षार्थ कर्म करें तथा इन कर्मों द्वारा विश्वरूप ईश्वर की पूजा करें। अपने मन को सांसारिक मामलों में न उलझने दें; यही आपके कल्याण का मार्ग है। वस्तुतः ये भोग्य पदार्थ किसी के नहीं हैं। अज्ञानवश ही मनुष्य इनमें ममता और आसक्ति करता है। ये सब परमेश्वर के हैं और उन्हीं के लिए इनका उपयोग होना चाहिए। परमेश्वर को समर्पित पदार्थों का उपभोग करें और दूसरों की संपत्ति की आकांक्षा न करें।

भरत का जन्म और महत्व

भरत का जन्म राजा दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र के रूप में हुआ। एक दिन, राजा दुष्यन्त ने कण्व ऋषि के आश्रम में शकुन्तला को देखा और उनसे विवाह किया। शकुन्तला ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम भरत रखा गया। भरत का भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है। उनके नाम पर ही भारत देश का नाम पड़ा। भरत को उनकी शक्ति, साहस और न्यायप्रियता के लिए जाना जाता है। वे एक महान राजा बने और उनके शासनकाल में भारत का विस्तार और समृद्धि हुई।

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स्वाहा देवी कौन है ?

ॐ भूमिर्भूम्ना द्यौर्वरिणाऽन्तरिक्षं महित्वा । उपस्थे ते देव्यदितेऽग्निमन्नाद-मन्नाद्यायादधे ॥ आऽयङ्गौः पृश्निरक्रमी दसनन्मातरंपुनः । पितरं च प्रयन्त्सुवः ॥ त्रिगंशद्धाम विराजति वाक्पतङ्गाय शिश्रिये । प्रत्यस....

ॐ भूमिर्भूम्ना द्यौर्वरिणाऽन्तरिक्षं महित्वा । उपस्थे ते
देव्यदितेऽग्निमन्नाद-मन्नाद्यायादधे ॥ आऽयङ्गौः पृश्निरक्रमी
दसनन्मातरंपुनः । पितरं च प्रयन्त्सुवः ॥ त्रिगंशद्धाम
विराजति वाक्पतङ्गाय शिश्रिये । प्रत्यस्य वह द्युभिः ॥ अस्य
प्राणादपानत्यन्तश्चरति रोचना । व्यख्यन् महिषः सुवः ॥
यत्त्वा क्रुद्धः परोवपमन्युना यदवर्त्या । सुकल्पमग्ने तत्तव
पुनस्त्वोद्दीपयामसि ॥ यत्ते मन्युपरोप्तस्य पृथिवीमनुदध्वसे । आदित्या
विश्वे तद्देवा वसवश्च समाभरन् ॥
मनो ज्योतिर् जुषताम् आज्यं विच्छिन्नं यज्ञꣳ सम् इमं दधातु ।
बृहस्पतिस् तनुताम् इमं नो विश्वे देवा इह मादयन्ताम् ॥
सप्त ते अग्ने समिधः सप्त जिह्वाः सप्त 3 ऋषयः सप्त धाम प्रियाणि ।
सप्त होत्राः सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त योनीर् आ पृणस्वा घृतेन ॥
पुनर् ऊर्जा नि वर्तस्व पुनर् अग्न इषायुषा ।
पुनर् नः पाहि विश्वतः ॥
सह रय्या नि वर्तस्वाग्ने पिन्वस्व धारया ।
विश्वप्स्निया विश्वतस् परि ॥
लेकः सलेकः सुलेकस् ते न आदित्या आज्यं जुषाणा वियन्तु केतः सकेतः सुकेतस् ते न आदित्या आज्यं जुषाणा वियन्तु विवस्वाꣳ अदितिर् देवजूतिस् ते न आदित्या आज्यं जुषाणा वियन्तु ॥

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