हम यह देख रहे थे कि गीता शास्त्र का सब से पहला उपदेश कब हुआ।
देव युग में।
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्
देव युग में भगवान ने गीता का उपदेश विवस्वान को दिया।
विवस्वान ने मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को।
देव युग में हमारी संस्कृति और सभ्यता उच्च कोटि में थी।
जब गीता का पुनः उपदेश हुआ तो हम काफी गिर चुके थे।
देव युग में धरती देव-त्रिलोक और असुर-त्रिलोक इस प्रकार से विभक्त था।
चीन समुद्र से महीसागर तक व्याप्त भारतवर्ष, मध्य एशिया, और रूस इस प्रकार से देव-त्रिलोक।
जिस में यूरोप के कुछ भाग भी शामिल थे।
यूरोप के शेष भाग, अफ्रिका और अमरीका इस प्रकार से असुर-त्रिलोक।
देव युग के प्रारंभ में ब्रह्मदेव ने बाकी सारे मतों का निराकरण करके ब्रहवाद को स्थापित किया।
प्रजातंत्र को हटाकर राजतंत्र को स्थापित किया
कजाकिस्तान में बालखश झील है।
इस के पास वेदी बनाकर देव यज्ञ करते थे।
यह झील उस समय की सरस्वती नदी थी।
यज्ञ की समाप्ति पर इसी सरस्वती में भूदेव अवभृत-स्नान करते थे।
वास्तु में हम ईशान कोण को देवों का स्थान मानते हैं।
भारतवर्ष से देखा जाएं तो ये सब इलाके मध्य एशिया, रुस- ये सब इलाके ईशान में हैं।
ईश से ही एशिया नाम पडा।
उस युग में भारतवर्ष के मानव देवेन्द्र द्वारा सुरक्षित वैदिक धर्म का ही आचरण करते थे।
अश्विनी कुमार स्वास्थ्य और चिकित्सा की देखभाल करते थे।
भरद्वाज, अंगिरा, वसिष्ठ जैसे महर्षियों की अध्यक्षता में विश्व विद्यालय हुआ करते थे।
वैज्ञानिक शोध एवं विकास काफी प्रबल था।
विमानों का आविष्कार हुआ।
सुव्यवस्थित सेना और रणनीति।
निगम और आगम इस प्रकार से विद्या विभक्त हुई।
स्वयंभू ब्रह्मा जी ने सुमेरु पर्वत को अपना वास स्थान बनाया जिसे अब पामीर पर्वत कहते हैं।
इसी युग मेम सूर्य और चंद्र वंशों की प्रवृत्ति हुई।
जिस योग का उपदेश भगवान ने विवस्वान को दिया था व्ह लुप्त होकर फिर से प्रकट हुआ कुरुक्षेत्र में।
भगवान के मुंह से गीता का तत्त्व प्रकट हुआ जिसे व्यास जी ने छन्दोबद्ध किया, श्लोकों के रूप में।
भगवान को ही गीता के मूल रचयिता कह सकते हैं।
तो सिर्फ गीत को भगवद्गीता कहते हैं, रामायण को भगवद्रामायण क्यों नहीं कहते?
महाभारत को भगवद्महाभारत क्यों नहीं कहते?
ब्रह्मपुराण को भगवद्ब्रह्मपुराण क्यों नहीं कहते?
यह जानने भगवान शब्द के अर्थ को समझते हैं?
ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य - इन छः गुणों को भग कहते हैं।
जिस में भग है वह है भगवान।
पर ये गुण तो व्यास जी में भी हैं।
वाल्मीकि में भी हैं।
हैं, पर पूर्ण रूप से नहीं।
१००% नहीं।
१००% तो सिर्फ श्री कृष्ण में हैं ये गुण।
कृष्णस्तु भगवान स्वयं - कहता है श्रीमद्भागवत
श्रीकृष्ण में सोलह कलाओं में से सोलह कलाएं हैं।
श्रीराम में बारह कलाएं हैं।
तो क्या श्रीराम जी में वह पूर्णता नहीं है जो श्रीकृष्ण में है
गलत मत सोचिए।
श्रीकृष्ण चन्द्रवंशी हैं - चन्द्रमा की सोलह कलाएं हैं।
राम जी सूर्यवंशी हैं - सूर्य की बारह कलाएं हैं।
श्रीराम जी भी पुर्ण रूप से भगवान हैं।
अब भग शब्द आ गया है तो आगे उन छः गुणों के बारे में थोडा विस्तार से देखते हैं।
- श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम उपदेश का कालक्रम क्या है और कुरुक्षेत्र में इसके पुनः प्रकटीकरण का क्या गूढ़ कारण था?
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम उपदेश देव युग में साक्षात् भगवान द्वारा विवस्वान अर्थात् सूर्य को दिया गया था। वहाँ से यह दिव्य ज्ञान परम्परा के माध्यम से मनु और फिर इक्ष्वाकु को प्राप्त हुआ। कालान्तर में जब यह ज्ञान लुप्त हो गया और मानव सभ्यता तथा संस्कृति का अत्यधिक पतन हो गया, तब मानव जाति के उद्धार हेतु कुरुक्षेत्र के प्रांगण में भगवान ने इसे पुनः प्रकट किया।
- देव युग में पृथ्वी का भौगोलिक विभाजन किस विशिष्ट प्रकार से किया गया था?
देव युग में सम्पूर्ण पृथ्वी देव-त्रिलोक और असुर-त्रिलोक में विभक्त थी। चीन समुद्र से महीसागर तक विस्तृत भारतवर्ष, मध्य एशिया, रूस तथा यूरोप के कुछ भाग देव-त्रिलोक के अन्तर्गत आते थे। वहीं यूरोप का शेष भाग, अफ्रीका तथा अमरीका असुर-त्रिलोक के अंग माने जाते थे।
- देव युग की सरस्वती नदी तथा वर्तमान कज़ाखस्तान की बालखश झील के मध्य क्या रहस्यमयी ऐतिहासिक सम्बन्ध है?
ऐतिहासिक और भौगोलिक वर्णन के अनुसार, कज़ाखस्तान की वर्तमान बालखश झील ही देव युग की पवित्र सरस्वती नदी थी। देव यज्ञ के समापन पर भूदेव इसी झील रूपी सरस्वती नदी में अवभृथ-स्नान अर्थात् पवित्र यज्ञिक स्नान किया करते थे।
- वास्तुशास्त्र की दृष्टि से एशिया महाद्वीप के नामकरण के पीछे क्या रहस्य छिपा है?
वास्तुशास्त्र में ईशान कोण को देवों का पवित्र स्थान माना गया है। भारतवर्ष की भौगोलिक स्थिति से देखने पर मध्य एशिया तथा रूस के क्षेत्र ईशान कोण में ही स्थित हैं। इसी ईश अथवा ईशान शब्द के आधार पर ही इस सम्पूर्ण भूभाग का नाम एशिया पड़ा।
- देव युग की सभ्यता, शिक्षा और वैज्ञानिक प्रगति किस उच्च कोटि की थी?
देव युग में महर्षि भरद्वाज, अंगिरा और वसिष्ठ की अध्यक्षता में उच्च कोटि के विश्वविद्यालय संचालित होते थे। अश्विनी कुमार स्वास्थ्य एवं चिकित्सा का प्रबन्ध करते थे। उस काल में वैज्ञानिक शोध और विकास अपने चरम पर था, जिसके परिणामस्वरूप विमानों का आविष्कार तथा सुव्यवस्थित सैन्य रणनीति का निर्माण हुआ था।
- देव युग के प्रारम्भ में स्वयंभू ब्रह्मा जी ने शासन प्रणाली और वैचारिक मतभेदों में क्या अभूतपूर्व परिवर्तन किये?
देव युग के प्रारम्भ में स्वयंभू ब्रह्मा जी ने अन्य सभी वैचारिक मतों का निराकरण करके केवल ब्रह्मवाद की स्थापना की। साथ ही, उन्होंने तत्कालीन प्रजातन्त्र को हटाकर राजतन्त्र को स्थापित किया और पामीर पर्वत, जिसे उस समय सुमेरु पर्वत कहा जाता था, को अपना वासस्थान बनाया।
- ऐश्वर्य के आधार पर 'भगवान' शब्द का वास्तविक और गूढ़ अर्थ क्या है?
ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य - इन छः दिव्य गुणों को 'भग' कहा जाता है। जिस परम सत्ता में ये छः गुण अपनी शत-प्रतिशत पूर्णता के साथ विद्यमान होते हैं, वही सत्ता 'भगवान' कहलाती है।
- महर्षि वाल्मीकि और महर्षि व्यास जैसे महान ऋषियों की रचनाओं को 'भगवद्' की उपाधि क्यों नहीं दी गई?
यद्यपि महर्षि वाल्मीकि और महर्षि व्यास में भी ऐश्वर्य, धर्म, यश आदि गुण विद्यमान थे, परन्तु वे गुण पूर्ण रूप से नहीं थे। ये छः गुण शत-प्रतिशत केवल श्रीकृष्ण में ही विद्यमान हैं। इसी पूर्णता के कारण साक्षात् भगवान द्वारा उपदिष्ट गीता को ही भगवद्गीता कहा जाता है।
- यदि गीता का उपदेश भगवान के मुख से निकला है, तो महर्षि व्यास को इसका रचयिता किस सन्दर्भ में माना जाता है?
गीता के मूल तत्त्व और ज्ञान का उद्गम साक्षात् भगवान के श्रीमुख से हुआ है, अतः भगवान ही इसके मूल रचयिता हैं। महर्षि व्यास ने उस असीम और दिव्य ज्ञान को केवल छन्दोबद्ध करके श्लोकों का स्वरूप प्रदान किया, जिससे वह मानव जाति के लिए सुलभ हो सके।
- श्री राम और श्री कृष्ण के अवतारों में कलाओं की भिन्नता का क्या रहस्य है और क्या यह भिन्नता उनकी पूर्णता को प्रभावित करती है?
श्री कृष्ण चन्द्रवंशी हैं और चन्द्रमा की सोलह कलाएं होती हैं, अतः वे सोलह कलाओं से युक्त हैं। वहीं श्री राम सूर्यवंशी हैं और सूर्य की बारह राशियाँ अथवा कलाएं होती हैं। यह भिन्नता केवल उनके वंश की प्रतीकात्मकता है। दोनों ही साक्षात् परमेश्वर हैं और श्री राम में भी पूर्ण रूप से वही भगवत्ता विद्यमान है जो श्री कृष्ण में है।