गरुड पुराण

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धर्म ही जिसका सुदृढ मूल है, वेद जिसका तना है, पुराणरूपी शाखाओं से जो समृद्ध है, यज्ञ जिसका पुष्प है और मोक्ष जिसका फल है, ऐसे भगवान मधुसूदनरूपी कल्पवृक्ष की जय हो। देव - क्षेत्र नैमिषारण्य में स्वर्गलोक की प्राप्ति की कामना से शौनकादि ऋषियों ने एक बार सहस्र वर्ष में पूर्ण होनेवाला यज्ञ प्रारम्भ किया।

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शास्त्रों पर स्पष्ट और अधिकारिक शिक्षाओं के लिए गुरुजी को हार्दिक धन्यवाद -दिवाकर

वेद पाठशालाओं और गौशालाओं के लिए आप जो अच्छा काम कर रहे हैं, उसे देखकर बहुत खुशी हुई 🙏🙏🙏 -विजय मिश्रा

यह वेबसाइट ज्ञान का अद्वितीय स्रोत है। -रोहन चौधरी

वेदधारा ने मेरे जीवन में बहुत सकारात्मकता और शांति लाई है। सच में आभारी हूँ! 🙏🏻 -Pratik Shinde

यह वेबसाइट अद्वितीय और शिक्षण में सहायक है। -रिया मिश्रा

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आरती कीजै हनुमान लला की किसकी रचना है

आरती कीजै हनुमान लला की, गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना है।

बकुल (मौलसिरी) से शिव जी की पूजा

बकुल (मौलसिरी) से शिव जी की पूजा केवल सायंकाल में विशिष्ट है। अन्य समय में निषिद्ध है।

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उपनयन संस्कार का उद्देश्य क्या है ?

जीवकी गर्भावस्थाका दुःख, गर्भमें पूर्वजन्मोंके ज्ञानकी स्मृति, जीवद्वारा भगवान्से अब आगे दुष्कर्मोंको न करनेकी प्रतिज्ञा, गर्भवाससे बाहर आते ही वैष्णवी मायाद्वारा उसका मोहित होना तथा गर्भावस्थाकी प्रतिज्ञाको भुला देना
गरुड उवाच
कथमुत्पद्य मार्ज नरकागतः। गर्भादिदुःखं यद्भुङ्क्ते तन्मे कथय केशव ॥ १ ॥ गरुडजीने कहा- हे केशव ! नरकसे आया हुआ जीव माताके गर्भमें कैसे उत्पन्न होता है ? वह गर्भवास आदिके दुःखको जिस प्रकार भोगता है, वह ( सब भी) मुझे बताइये ॥ १ ॥
विष्णुरुवाच
स्त्रीपुंसोस्तु प्रसङ्गेन निरुद्धे शुक्रशोणिते । यथाऽयं जायते मर्त्यस्तथा वक्ष्याम्यहं तव ॥२॥ भगवान् विष्णुने कहा - स्त्री और पुरुषके संयोगसे वीर्य और रजके स्थिर हो जानेपर जैसे मनुष्यकी उत्पत्ति होती है, उसे मैं तुम्हें कहूँगा ॥ २ ॥
ऋतुमध्ये हि पापानां देहोत्पत्तिः प्रजायते । इन्द्रस्य ब्रह्महत्याऽस्ति यस्मिन् तस्मिन् दिनत्रये ॥ ३ ॥
प्रथमेऽहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी । तृतीये रजकी ह्येता नरकागतमातरः॥४॥ कर्मणा दैवनेत्रेण जन्तुर्देहोपपत्तये । स्त्रियाः प्रविष्ट उदरं पुंसो रेतः कणाश्रयः ॥ ५ ॥ कललं त्वेकरात्रेण पञ्चरात्रेण बुद्बुदम् । दशाहेन तु कर्कन्धूः पेश्यण्डं वा ततः परम् ॥ ६॥ ऋतुकालमें आरम्भके तीन दिनोंतक इन्द्रको लगी ब्रह्महत्याका * चतुर्थांश रजस्वला स्त्रियोंमें रहता है, उस ऋतुकालके मध्यमें किये गये गर्भाधानके फलस्वरूप पापात्माओंके देहकी उत्पत्ति होती है ॥ ३ ॥ रजस्वला स्त्री प्रथम दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन रजकी ( धोबिन) कहलाती है । ( तदनुसार उनमें स्पर्शदोष रहता है) नरकसे आये हुए प्राणियोंकी ये ही तीन माताएँ होती हैं ॥ ४ ॥ दैवकी प्रेरणासे कर्मानुरोधी शरीर प्राप्त करनेके लिये प्राणी पुरुषके वीर्यकणका आश्रय लेकर स्त्रीके उदरमें प्रविष्ट होता है ॥ ५ ॥ एक रात्रिमें वह शुक्राणु कललके रूपमें, पाँच रात्रिमें बुद्बुदके रूपमें, दस दिनमें बेरके समान तथा उसके पश्चात् -मांसपेशियोंसे युक्त अण्डाकार हो जाता है ॥ ६ ॥
मासेन तु शिरो द्वाभ्यां बाह्वङ्गाद्यङ्गविग्रहः । नखलोमास्थिचर्माणि लिङ्गच्छिद्रोद्भवस्त्रिभिः॥ ७ ॥ जगृहु: स्त्रियः । रजोरूपेण तास्वंहो मासि मासि प्रदृश्यते ॥ ( श्रीमद्भा० ६।९।९) स्त्रियोंने यह वर पाकर कि वे सर्वदा पुरुषका सहवास कर सकें, ब्रह्महत्याका तीसरा चतुर्थांश स्वीकार किया। उनकी ब्रह्महत्या प्रत्येक महीने में रजके रूपमें दिखायी पडती है।
शश्वत्कामवरेणांहस्तुरीयं
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चतुर्भिर्धातवः सप्त पञ्चभिः क्षुत्तृडुद्भवः । षड्भिर्जरायुणा वीतः कुक्षौ भ्राम्यति दक्षिणे ॥ ८ ॥ मातुर्जग्धान्नपानाद्यैरेधद्धातुरसम्मते । शेते विण्मूत्रयोर्गर्ते स जन्तुर्जन्तुसम्भवे ॥ ९॥ एक मासमें सिर, दो मासमें बाहु आदि शरीरके सभी अंग, तीसरे मासमें नख, लोम, अस्थि, चर्म तथा लिंगबोधक छिद्र उत्पन्न होते हैं ॥ ७ ॥ चौथे मासमें रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि मज्जा और शुक्र - ये सात धातुएँ तथा पाँचवें मासमें भूख-प्यास पैदा होती है। छठे मासमें जरायुमें लिपटा हुआ वह जीव माताकी दाहिनी कोखमें घूमता है ॥ ८ ॥ और माताके द्वारा खाये - पिये अन्नादिसे बढ़े हुए धातुओंवाला वह जन्तु विष्ठा - मूत्रके दुर्गन्धयुक्त गड्ढेरूप गर्भाशयमें सोता है ॥ ९ ॥
कृमिभिः क्षतसर्वाङ्गः सौकुमार्यात् प्रतिक्षणम् । मूर्च्छामाप्नोत्युरुक्लेशस्तत्रत्यैः क्षुधितैर्मुहुः ॥ १० ॥ कटुतीक्ष्णोष्णलवणरूक्षाम्लादिभिरुल्बणैः ।
मातृभुक्तैरुपस्पृष्टः
सर्वाङ्गोत्थितवेदनः। उल्बेन संवृतस्तस्मिन्नन्त्रैश्च बहिरावृतः ॥ ११ ॥ वहाँ गर्भस्थ क्षुधित कृमियोंके द्वारा उसके सुकुमार अंग प्रतिक्षण बार- बार काटे जाते हैं, जिससे अत्यधिक क्लेश होनेके कारण वह जीव मूच्छित हो जाता है ॥ १० ॥ माताके द्वारा खाये हुए कडुवे तीखे, गरम, नमकीन, रूखे तथा खट्टे पदार्थोंके अति उद्वेजक संस्पर्शसे उसे समूचे अंगमें वेदना होती है और जरायु ( झिल्ली ) - से लिपटा हुआ वह जीव आँतोंद्वारा बाहरसे ढका रहता है ॥ ११ ॥
आस्ते कृत्वा शिरः कुक्षौ भुग्नपृष्ठशिरोधरः । अकल्पः स्वाङ्गचेष्टायां शकुन्त इव पञ्जरे ॥ १२॥ तत्र लब्धस्मृतिर्दैवात् कर्म जन्मशतोद्भवम् । स्मरन् दीर्घमनुच्छ्वासं शर्म किं नाम विन्दते ॥ १३ ॥ नाथमान ऋषिर्भीतः सप्तवधिः कृताञ्जलिः । स्तुवीत तं विक्लवया वाचा येनोदरेऽर्पितः ॥ १४ ॥ आरभ्य सप्तमान्मासाल्लब्धबोधोऽपि वेपितः । नैकत्रास्ते सूतिवातैर्विष्ठाभूरिव सोदरः ॥ १५ ॥ उसकी पीठ और गरदन कुण्डलाकार रहती है । इस प्रकार अपने अंगोंसे चेष्टा करनेमें असमर्थ होकर वह जीव पिंजरे में स्थित पक्षीकी भाँति माताकी कुक्षिमें अपने सिरको दबाये हुए पड़ा रहता है ॥ १२ ॥ भगवान्‌की कृपासे अपने सैकड़ों जन्मोंके कर्मोंका स्मरण करता हुआ वह गर्भस्थ जीव लम्बी श्वास लेता है । ऐसी स्थितिमें भला उसे कौन-सा सुख प्राप्त हो सकता है ? ॥ १३ ॥ (मांस - मज्जा आदि) सात धातुओंके आवरणमें आवृत वह ऋषिकल्प जीव भयभीत होकर हाथ जोड़कर विकल वाणीसे उन भगवान्की स्तुति करता है, जिन्होंने उसको माताके उदरमें डाला है ॥ १४ ॥ सातवें महीनेके आरम्भसे ही सभी जन्मोंके कर्मोंका ज्ञान हो जानेपर भी गर्भस्थ प्रसूतिवायुके द्वारा चालित होकर वह विष्ठामें उत्पन्न सहोदर ( उसी पेटमें उत्पन्न अन्य) कीड़ेकी भाँति एक स्थानपर ठहर नहीं पाता ॥ १५ ॥ जीव उवाच
श्रीपतिं जगदाधारमशुभक्षयकारकम् । व्रजामि शरणं विष्णुं शरणागतवत्सलम् ॥ १६ ॥ जीव कहता है— मैं लक्ष्मीके पति, जगत्के आधार, अशुभका नाश करनेवाले तथा शरणमें आये हुए
जीवोंके प्रति वात्सल्य रखनेवाले भगवान् विष्णुकी शरणमें जाता हूँ ॥ १६ ॥
त्वन्मायामोहितो दे तथा पुत्रकलत्रके । अहं ममाभिमानेन गतोऽहं नाथ संसृतिम् ॥ १७ ॥ कृतं परिजनस्यार्थे मया कर्म शुभाशुभम् । एकाकी तेन दग्धोऽहं गतास्ते फलभागिनः ॥ १८ ॥ यदि योन्याः प्रमुच्येऽहं तत् स्मरिष्ये पदं तव । तमुपायं करिष्यामि येन मुक्तिं व्रजाम्यहम्॥ १९॥ विण्मूत्रकूपे पतितो दग्धोऽहं जठराग्निना । इच्छन्नितो विवसितुं कदा निर्यास्यते बहिः ॥ २० ॥ येनेदृशं मे विज्ञानं दत्तं दीनदयालुना । तमेव शरणं यामि पुनर्मे माऽस्तु संसृतिः ॥ २१॥ न च निर्गन्तुमिच्छामि बहिर्गर्भात्कदाचन । यत्र यातस्य मे पापकर्मणा दुर्गतिर्भवेत् ॥ २२ ॥ तस्मादत्र महद्दुःखे स्थितोऽपि विगतक्लमः । उद्धरिष्यामि संसारादात्मानं ते पदाश्रयः ॥ २३ ॥ हे नाथ! आपकी मायासे मोहित होकर मैं देहमें अहंभाव तथा पुत्र और पत्नी आदिमें ममत्वभावके अभिमानसे जन्ममरणके चक्करमें फँसा हूँ ॥ १७ ॥ मैंने अपने परिजनोंके उद्देश्यसे शुभ और अशुभ कर्म किये, किंतु अब मैं उन कर्मोंके कारण अकेला जल रहा हूँ । उन कर्मोंके फल भोगनेवाले पुत्र- कलत्रादि अलग हो गये ॥ १८ ॥ यदि इस गर्भसे निकलकर मैं बाहर आऊँ तो फिर आपके चरणोंका स्मरण करूँगा और ऐसा उपाय करूँगा जिससे मुक्ति प्राप्त कर लूँ ॥ १९ ॥ विष्ठा और मूत्रके कुँएमें गिरा हुआ तथा जठराग्निसे जलता हुआ एवं यहाँसे बाहर निकलनेकी इच्छा करता हुआ मैं कब बाहर निकल पाऊँगा ॥ २० ॥ जिस दीनदयालु परमात्माने मुझे इस प्रकारका विशेष ज्ञान दिया है, मैं उन्हींकी शरण

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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