कौटिल्य अर्थशास्त्र

प्रकरण - १

विद्या विषयक विचार

दर्शन शास्त्र, वेद, संपत्ति शास्त्र तथा राजनीति शास्त्र यह चार विद्याएं हैं।

मनु संप्रदाय के विद्वान अंतिम तीन को ही विद्या समझते हैं और आन्वीक्षकी या दर्शन शास्त्र को तीनों वेद का एक भाग प्रगट करते हैं।

बृहस्पति मतानुयायी केवल अंतिम दो ही को विद्या मानते हैं और कहते हैं कि तीनों वेद तो दुनियादार लोगों के लिए आजीविका का सहारा है।

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Video - चाणक्य की कहानी 

 

चाणक्य की कहानी

 

 

 

४७प्रकरण। अश्वाध्यक्ष ।
More अश्याध्यक्ष विक्रेय, क्रीत, युद्ध प्राप्त, स्वदेशोत्पत्र, सहायताथप्रात, गिरों में रखे तथा कुछ समय के लिये सरकारी तबेले में बांधे घोड़ों के वंश, उमर, रंग, चिन्ह, वर्ग तथा प्राप्तिस्थान का उल्लेख करे। जो अप्रशस्त, लंगड़े लूले तथा बीमार हो उनकी ऊपर सूचना दे। अश्ववाह (सईस) लोग कोश तथा वस्तु भंडार से चीजों को प्राप्तकर मितव्ययता से काम करें।
घोड़े की आकृति तथा स्थिति के अनुसार तबेला जितना लंबा बनाया जाय, उसकी चौड़ाई उससे दुगुनी हो । चारों ओर दरपाजे तथा बीच में फिरने का स्थान हो । उसमें आने जाने का मार्ग तथा बैठने की चौकी हो । उसका बरांडा आगे से झुका हो । चारों ओर बन्दर मोर हिरन न्यूउले चकार तोता मैना आदि पशु पक्षियों से परीपूर्ण हो।
घोड़े की लंबाई से चार गुना चौकोन चिकना फर्श हो । उसमें खाना खाने की नांद बनी हो साथ ही मूत्र लीद आदि के बाहर निकालने का प्रबन्ध हो । उसका मुंह उत्तर या पूरब हो। या जैसा तबेला हो वैसा ही उसका मुख्य द्वार हो । घोड़ी, बछिया तथा बच को अकेले रखा जाय।
पैदा होते ही घोड़ी को तीन रात तक १० छिटांक घी दिया जाय। इसके इस रात तक १० छिटांक सतुश्रा तथा तेल तथा दवाई दी जाय। शनैः शनैः जौका पुलाव और ऋतु के अनुसार भोजन देना शुरू किया जाय । दस रात बाद घोड़े के बच्चे को दाई छिटांक सतुआ चौथाई घी के साथ मिले । छः महीने तक १० छिटांक दूध भी उसको मिलता रहे। इसके बाद क्रमशः प्रतिमास प्राधा आधा बढ़ाते हुए चौथे साल तक १० सेर जौ या जौ का सतुआ दिया जाय । चौथे पांचवे साल पर पाते ही घोड़ा पूरा जवान तथा कामबायक हो जाता है।
अच्छे घोड़े के मुंह की लंबाई ३२ अंगुल, देह की लंबाई मुंह से पांच गुना, जंघा ५० अंगुल ऊंचाई जंघा का चार गुना होती है । मध्यम तथा निकृष्ट घोड़े की लंबाई क्रमशः तीन तीन अंगुल कम हो जाती है। घोड़े की मुटाई १०० अंगुल होती है । मध्यम तथा निकृष्ट घोड़े इससे क्रमशः पांच गुना कम मोटे होते हैं।
अच्छे घोड़े को उत्तम या मध्यम चावल, जौ या ककिनी का धान अधिक से अधिक २० सेर सूखा मिलना चाहिये । यदि पका कर देना हो तो श्रधा ही दिया जाय। मूंग तथा उर्द के विषय में भी यही नियम है उनके खाने के समान को नरम करने के लिये १० छिटांक तेल, ५ पल नमक, ५० पल मांस, २1⁄2 सेर शोरबा या दुगुनी दही डाली जाय। पीने के लिये ५ पल शक्कर, १० छिटांक शराब, या दुगुना दूध दिया जाय। यदि घोड़ा बहुत दूर से चल कर आया हो या बहुत भार उठाने के कारण थका हुआ हो तो उसके खाने के लिये १० छिटांक तेल, नाक तथा नथुनों पर मलने के लिये २ छिटांक तेल, आधा बोझ जौ या पूरा बोझ घास दिया जाय और दो हाथ या ६ अरत्नि तक उसके चारों ओर नीचे घास बिछा दिया जाय ।
मध्यम तथा निकृष्ट घोड़ों को उत्तम घोड़ों से कम रथ में लगने 글 वाले घोड़ों को उत्तम के समान, बच्चे पैदा करने के लिये रखे घोड़ों को और निकृष्ठ घोड़ें। को मध्यम के समान घोड़ी तथा पारशमा [?] कोकम और बच्चों को इसका श्राध। भोजन दिया जाय । खाना बनाने वालों, बागडोर पकड़ने बालों तथा वैद्यों को घोड़ों के खाने में से कुछ भाग मिले। जो घोड़े लड़ाई बीमारी बुढ़ापे आदि के कारण काम तथा लड़ाई के अयोग्य हो उनको बच्चे पैदाकरने के [पिंडगे - रिका ] काम में लाना चाहिये। पौर तथा ग्रामीणों के लिये ताकतवर घोड़ [ वृष ] घोड़ियों के लिये छोड़े जांय ।
काम्भोज, सैन्धव, श्रारट्टज, वानायुज श्रादि घोड़े सवारी के काम के लिये उत्तम, वाहीक पापेयक, सौवीरक, तैतल आदि मध्यम और शेष निकृष्ट [र] समझे जाते हैं। तेजी, सीधगी तथा धीमे पन को देखकर उनको लड़ाई या सवारी के काम के लिये रखा जाय। लड़ाई के लिये घोड़ों को तैय्यार करने के लिये नियमबद्ध शिक्षण मिलना चाहिये । सवारी घोड़ों के १ बल्गन २ नीचैर्गत ३ लंघन ४ धोरण ५ नाराष्ट्र आदि पांच भेद हैं।
१.बल्गन । उपवेणुक, वर्धमानक, यमक, प्रालीदप्लुत, पृथग, तथा तृवचाली बल्गन [गोल घूमना ] के भेद है।
२.नीचेर्गत । शिर तथा कान खड़ाकर दौड़ने वाले नीचैर्गत [एक चाल चलने वाले ] घोड़ों की-१प्रकीर्णक २प्रकीर्णोत्तर शनिपण्ण ४ पाश्चानुवृत्त ५ ऊर्मिमार्ग ६ शरभ क्रीडित ७ शरभप्लुत पत्रिताल बाह्यानुवृत्त १० पंचपाणि ११ सिंहायत १२ स्वाधूत १३ क्लिष्ठ १४लाधित १५ हित १५ पुष्पाभिकीर्ण आदि सोलह चाले हैं।
३.लंघन । लंघन [कदना+छलांग मारना] केरकपिप्लुत,रमेक प्लुत, ३ एकप्लुत ४ एकपादप्लुत ५ कोकिल संचारी ६ उरस्य वकचारी श्रादि सात भेद है।
*उपवेणुक = एक हाथ व्यास वाले चक्र में घुमाना । वर्धमानक = गोलघूमने का एक प्रकार विशेष । यमक = जोड़ी में घूमना | पालीढ़ प्लुत = दौड़ना तथा साथ ही साथ कूदना । पृथग = अगले भाग पर जोर दे कर दौड़ना ॥
प्रकीर्णक = संपूर्ण प्रकार कीगति । प्रकीर्णोत्तर = संपूर्ण प्रकार कीगति के साथ किसी एक प्रकार की गति के लिये प्रसिद्ध । निषण्ण | शरीर के पिछले भाग को स्थिर रख कर दौड़ना। पार्थानुवृत्त = पाव से गति । ऊर्मिमार्ग = लहर की तरह उछलना तथा दौड़ना । शरभ क्रीडित = शरभ की तरह खेलना । शरभप्लुत - शरभ की तरह कूदना । त्रिताल = तीन पैर से दौड़ना । बाह्यानुवृत्त - दहिने बांयें घूमना । पंचपाणि = पहिले तीन, फिर दो पैरों के सहारे घूमना । सिंहायत
= शेरकी तरह उछलना । स्वाभूत = लम्बी कूद कूदना । किष्ट = विना सवार के सीधा दौड़ना । श्लाधित = शरीर के अगले भाग को झुका कर दौड़ना । हितशरीर के पिछले भामको झुकाकर दौड़ना । पुष्पाभिकीर्ण = चित्र विचित्र चालें । कपि प्लुत = बन्दर की तरह कूदना । भेक प्लुत = मेंडक की तरह कूदना । कोकिल संचारी = कोयल की तरह फुदकना । उरस्य = जमीन के साथ छाती लगा कर सरपट दौका। बकारी = बगुले की तरह उछलना कूदना ।

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