व्यास जी वासुदेव जी के पूर्व जन्म का वृत्तांत सुनाते हैं।
एक बार कश्यप महर्षि यज्ञ करने के लिए वरुण भगवान की गाय को स्वर्ग से लेकर आए।
वरुण भगवान के वापस मांगने पर उन्होंने उसको वापस नहीं दिया।
वरुण भगवान ने उन्हें शाप दे दिया।
आप मनुष्य योनि में जन्म लोगे और गोपालक बनोगे।
आज जैसे मेरी गाय अपने बछड़े से बिछड़ी हुई है, वैसे आप भी अपने पुत्र से बिछड़े रहेंगे।
आपका पुत्र जीवन में वृद्धि करेगा, पर आप कारागार में बंद रहेंगे।
कश्यप मुनि स्वयं ब्रह्मा जी के पौत्र और उनके परम प्रिय थे, पर उन्होंने लोभ के कारण समय पर वरुण भगवान को उनकी गाय वापस नहीं की। उसको अपने पास ही रख लिया।
उन्होंने गलती की, इसलिए उस शाप का उन पर असर पड़ा। वे ही वासुदेव के रूप में भूमि में जन्म लिए।
इस अवस्था में कर्म ही बलवान था, इसलिए मुनि की तपस्या की शक्ति भी उस शाप को कुछ नहीं कर पाई।
ब्रह्मा ने भी अपनी मर्यादा की रक्षा करते हुए कुछ नहीं किया।
इस संदर्भ में और एक शाप भी है जो दिति ने अदिति को दिया था।
इस पर भी प्रकाश डालते हैं व्यास जी।
अदिति और दिति दोनों ही दक्ष प्रजापति जी की पुत्रियां थीं।
उन दोनों का भी विवाह कश्यप जी से हो गया।
पहले अदिति के गर्भ से इंद्र उत्पन्न हुए। दिति ने इंद्र को सुंदर, बलवान और तेजस्वी बनते हुए देखा, तो कश्यप जी से दिति ने अपनी इच्छा प्रकट की कि उनको भी इंद्र के समान एक पुत्र चाहिए।
कश्यप मुनि ने उन्हें पयोव्रत के आचरण की विधि बताई।
गर्भधारण के समय दीती भूमि में ही सोती थी, सात्विक भोजन ही करती थी और अपने आप को पवित्र रखती थी।
अदिति को पता चला कि दिति को एक महाबली और तेजस्वी पुत्र होने वाला है।
अदिति ने इंद्र को कहा, दिति के गर्भ में तुम्हारा शत्रु विद्यमान है, तुम उसका विनाश कर दो।
वह रोग के जैसा है। प्रारंभ में ही उसे मिटा दो। अगर वह बढ़ जाएगा तो तुम्हारी हानि होगी। इंद्र भी अपनी माता अदिति की बात सुनकर अपनी सौतेली मां दिति के पास गए।
उनकी सेवा करने का वादा करके उनके पैर दबाने लगे इंद्र। कुछ देर में दिति को नींद आ गई।
इंद्र के ऊपर भरोसे के कारण दिति वहीं पर सो गई।
बदले की भावना के कारण, इंद्र ने अपने वज्रायुध को सूक्ष्म बनाकर दिति के शरीर में प्रवेश करवाया। उस वज्रायुध ने दिति के गर्भ को पहले सात टुकड़े किए, फिर उन सात टुकड़ों के सात टुकड़े किए जिनसे 49 मरुदगण उत्पन्न हुए।
दीदी ने इस बात को जानकर देव माता अदिति को शाप दे दिया।
और तुम्हारे सात बच्चे जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त करेंगे।
ऐसे कश्यप मुनि वसुदेव बनकर और अदिति देवकी बनकर भूमि में जन्म लिए।
- महर्षि कश्यप जैसे परम तपस्वी और ब्रह्मा जी के पौत्र को भी शाप का प्रभाव क्यों भोगना पड़ा?
इस वृत्तांत से यह महान सिद्धांत सिद्ध होता है कि सृष्टि में कर्म का नियम सर्वोपरि है। महर्षि कश्यप ने लोभ के वश में होकर वरुण देव की गाय को समय पर वापस नहीं किया। भले ही वे बहुत बड़े तपस्वी थे, परंतु उनके इस अनुचित कार्य के कारण उनकी तपस्या की शक्ति भी शाप को निष्फल नहीं कर पाई। कर्म के फल से कोई भी नहीं बच सकता, यही इसका छिपा हुआ संदेश है।
- वरुण देव द्वारा कश्यप जी को दिए गए शाप में वासुदेव जी के जीवन की कौन सी घटनाएं पहले से ही निश्चित हो गई थीं?
वरुण देव का शाप अत्यंत सटीक था। उन्होंने कहा था कि जैसे मेरी गाय बछड़े से बिछड़ी है, वैसे ही आप अपने पुत्र से बिछड़े रहेंगे। आपका पुत्र उन्नति करेगा परंतु आप कारागार में बंद रहेंगे। यही कारण था कि कंस के कारागार में वासुदेव जी बंदी रहे और उनके साक्षात भगवान स्वरूप पुत्र श्री कृष्ण को उनसे दूर गोकुल जाना पड़ा।
- कश्यप जी के संकट के समय ब्रह्मा जी ने अपनी शक्ति का प्रयोग करके उन्हें शाप से मुक्त क्यों नहीं किया?
ब्रह्मा जी महर्षि कश्यप के दादा थे और उनसे बहुत प्रेम करते थे, फिर भी उन्होंने अपनी मर्यादा की रक्षा करते हुए इस विषय में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। इसका रहस्य यह है कि सृष्टि के नियमों का पालन स्वयं विधाता को भी करना पड़ता है। यदि ब्रह्मा जी मर्यादा तोड़ते, तो संसार में न्याय की व्यवस्था समाप्त हो जाती।
- देवमाता अदिति ने अपने पुत्र इंद्र को दिति के गर्भ को नष्ट करने के लिए क्यों उकसाया?
अदिति ने देखा कि दिति का होने वाला पुत्र अत्यंत बलवान और तेजस्वी होगा, जो इंद्र के पद के लिए संकट बन सकता था। उन्होंने अपने पुत्र के राज्य और शक्ति को सुरक्षित रखने के लिए इंद्र से कहा कि शत्रु को रोग की भांति प्रारंभ में ही मिटा देना चाहिए, अन्यथा बाद में हानि उठानी पड़ेगी। यह देवों के भीतर भी स्थित असुरक्षा और ईर्ष्या की भावना को दर्शाता है।
- इंद्र ने अपनी सौतेली माता दिति के गर्भ को नष्ट करने के लिए किस कपट मार्ग का आश्रय लिया?
इंद्र सीधे युद्ध करके दिति के गर्भ को नष्ट नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने सेवा का नाटक किया और दिति के पैर दबाने लगे। जब दिति उन पर पूर्ण विश्वास करके सो गईं, तब इंद्र ने अपने अस्त्र वज्रायुध को अत्यंत सूक्ष्म रूप देकर उनके शरीर में प्रवेश कराया और गर्भ के टुकड़े कर दिए।
- इंद्र के वज्र प्रहार के बाद भी दिति का गर्भ पूरी तरह नष्ट क्यों नहीं हुआ और उससे क्या उत्पन्न हुआ?
दिति ने गर्भधारण के समय कश्यप जी के कहे अनुसार अत्यंत कठिन पयोव्रत का पालन किया था, जिसके कारण उनका गर्भ अत्यंत पवित्र और सात्विक था। इसी पवित्रता के प्रभाव से वज्र के प्रहार के बाद भी गर्भ नष्ट नहीं हुआ, बल्कि उसके टुकड़े जीवित रहे। पहले उसके सात टुकड़े हुए और फिर उन सात के सात-सात टुकड़े हुए, जिससे ४९ मरुदगणों का जन्म हुआ।
- दिति ने देवमाता अदिति को क्या शाप दिया और उसका प्रभाव द्वापर युग में किस रूप में दिखाई दिया?
जब दिति को इंद्र के छल और अदिति की कूटनीति का पता चला, तो उन्होंने क्रोध में आकर अदिति को शाप दिया कि तुम्हारे भी सात बच्चे जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे। यही शाप द्वापर युग में सच हुआ जब अदिति ने देवकी के रूप में जन्म लिया और उनके प्रथम सात पुत्रों को कंस ने जन्म लेते ही मार दिया।
- कश्यप और अदिति का पृथ्वी पर वसुदेव और देवकी के रूप में जन्म लेने का वास्तविक आध्यात्मिक कारण क्या था?
ऊपरी तौर पर यह केवल वरुण और दिति के शाप का परिणाम दिखाई देता है, परंतु इसके पीछे एक महान दैवीय योजना छिपी थी। भूमि का भार हरण करने के लिए भगवान विष्णु को कृष्ण रूप में अवतार लेना था। इसके लिए उन्हें कश्यप और अदिति जैसे परम पवित्र माता-पिता की आवश्यकता थी। शाप तो केवल एक माध्यम था जिसके द्वारा पूर्व जन्म के संचित कर्मों का हिसाब भी पूरा हुआ और भगवान के प्राकट्य का मार्ग भी प्रशस्त हुआ।
- दिति द्वारा किए गए पयोव्रत के आचरण से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
दिति के आचरण से यह स्पष्ट होता है कि संतान के उत्तम चरित्र और बल के लिए माता की आंतरिक और बाह्य शुद्धता अत्यंत आवश्यक है। भूमि पर सोना, सात्विक भोजन करना और स्वयं को पवित्र रखना, यह सब गर्भ संस्कार के अंग हैं। इसी उच्च कोटि के संयम के कारण ही वज्र जैसा घातक अस्त्र भी उनके गर्भ के बालकों को मार नहीं सका, बल्कि वे देवों के रूप में परिवर्तित हो गए।
- इस पूरे वृत्तांत में कौन सा ऐसा रहस्यमयी सिद्धांत छिपा है जो मनुष्य के जीवन को सही दिशा दे सकता है?
इसमें यह रहस्य छिपा है कि इस संसार में कोई भी व्यक्ति पूरी तरह से दोषरहित नहीं है। महान कश्यप मुनि लोभ के वश में आ गए, देवमाता अदिति ईर्ष्या के वश में हो गईं और देवराज इंद्र ने छल का सहारा लिया। यह कथा सिखाती है कि व्यक्ति चाहे जितने ऊंचे पद पर हो, यदि वह मर्यादा और धर्म का उल्लंघन करेगा, तो उसे उसका परिणाम कई जन्मों तक भुगतना पड़ेगा। इसलिए मनुष्य को सदैव सजग रहकर धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए।