
सत्ययुग में व्याघ्रपाद नामक एक ऋषि थे। उनके दो पुत्र थे - बड़े पुत्र का नाम उपमन्यु था और छोटे पुत्र का नाम धौम्य था।
एक दिन उपमन्यु ने एक ऋषि के आश्रम में खीर परोसा हुआ देखा। यह देखकर उसके मन में भी खीर खाने की इच्छा हुई। घर लौटकर उसने अपनी माँ से कहा, 'माँ! मेरे लिए भी खीर बना दो।'
घर में दूध नहीं था। उपमन्यु की माँ ने आटे में पानी मिलाकर उसे दूध जैसा बना दिया। उपमन्यु ने पहले भी असली दूध का स्वाद चखा था। जब उसने मिश्रण देखा तो उसने कहा, 'माँ! यह दूध नहीं है।'
उसकी माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा, 'बेटा! हम जंगल में रहते हैं और फल-मूल खाकर अपना भरण-पोषण करते हैं। महादेव से प्रार्थना करो। उनकी कृपा से ही तुम्हारी इच्छा पूरी होगी।'
अपनी माँ की बातें सुनकर उपमन्यु ने पूछा, 'माँ! महादेव कौन हैं? मैं उन्हें कैसे प्रसन्न कर सकता हूँ? वे कहाँ रहते हैं, और मैं उन्हें कैसे देख सकता हूँ?’ उसकी माँ ने कहा, ‘बेटा! महादेव शिव हैं। उन्हें समझना बहुत कठिन है। फिर भी, वे दयालु और शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं। वे सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं। शिव महान योगी हैं। तुम शुद्ध भक्ति के माध्यम से उन्हें प्रसन्न कर सकते हो। उनका नाम निरंतर जपने से उनकी कृपा प्राप्त होगी।’
अपनी माँ के वचनों से प्रेरित होकर, उपमन्यु ने भक्ति के साथ शिव का नाम जपना शुरू कर दिया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान शिव उपमन्यु के सामने प्रकट हुए, उसे आशीर्वाद दिया, और कहा, ‘बच्चे! एक कल्प तक, तुम और तुम्हारे भाई बिना किसी रुकावट के खीर प्राप्त करेंगे। उसके बाद, तुम मुझे प्राप्त करोगे।’
भगवान शिव ने उसे आश्वासन भी दिया, ‘तुम्हारी मेरे प्रति हमेशा गहरी भक्ति रहेगी, और मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा।’
यह कहानी भगवान महादेव की असीम करुणा का सुंदर उदाहरण है।
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