उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

vishnu bhagawan

उत्पन्ना एकादशी का महत्त्व, कथा, फल और नियमों के बारे में जानिए


 

नैमिषारण्य के पवित्र क्षेत्र में हज़ारों ऋषियों की उपस्थिति में सूत जी महाराज एकादशी व्रतों के माहात्म्य को व्यक्त कर रहे हैं। सूत जी ने कहा - हे विप्रवर्ग, पूर्वकाल में श्री कृष्ण जी महाराज ने जिस उत्तम व्रत के माहात्म्य को प्रीतिपूर्वक विशेष विधि के साथ कहा था उस एकादशी व्रत की उत्पत्ति के विषय में जो मनुष्य सुनता है, वह संसार के समस्त सुखों का भोग करके विष्णु लोक को प्राप्त करता है।  

भगवान श्री कृष्ण से अर्जुन ने विनयपूर्वक कहा - हे प्रभो, उपवास, नक्त और एक बार भोजन करने का क्या फल है और उसकी क्या विधि है, उसे कृपा करके कहिये।  

श्री कृष्ण कहते हैं - दिन के आठवें भाग में जब सूर्य के तेज मन्द पड़ जाए उस समय के भोजन का नाम नक्त भोजन है । किन्तु रात्रि के समय किया जाने वाला भोजन नक्त भोजन नहीं है ।

हे पार्थ! हेमन्त ऋतु में मार्गशीर्ष (मग्घर) दशमी की रात्रि में दान्त साफ करके शुद्धता से रहे | अगले दिन प्रात:काल उठकर स्नान आदि नित्य क्रिया करके व्रत के लिये संकल्प करे ।  

मध्याह्न काल में कुएं, तालाब, नदी आदि पर जाकर या घर पर रहते हुए स्नान से पूर्व शरीर पर मिट्टी मलें और प्रार्थना करें - हे अश्वक्रान्ते, रथक्रान्ते, विष्णुक्रान्ते, वसुन्धरे, मृत्तिके मेरे पूर्व जन्म के संचित पापों को हर लो, तुम्हारे द्वारा मेरे पाप नष्ट किये जाने पर मैं परम गति को  प्राप्त करूंगा। ऐसा कहकर विधिपूर्वक स्नान करें।  

पतित, चोर, पाखण्डी, झूठ बोलने वाले, दूसरों की निन्दा करने वाले, देवता, वेद और ब्राह्मण की निन्दा करने वाले, दुराचारी, दूसरे की स्त्री तथा धन का अपहरण करने वाले लोगों से बात न करे। ऐसे लोगों के दर्शन भी न करे। स्नान के पश्चात् भगवान नारायण का विधिपूर्वक पूजन करके नैवेद्य आदि अर्पण करे। घर में दीपक का प्रकाश करे, उस दिन निद्रा का त्याग करे, ब्रह्मचर्य रखे, प्रभु के नाम का कीर्तन आदि करे, सत् शास्त्रों का पाठ करे, जो भी कार्य करे वह भक्ति युक्त मन से करे । 

भक्तिमान धर्मात्मा व्यक्ति शुक्लपक्ष व कृष्णपक्ष की एकादशियों में किसी प्रकार का भेद न माने। जो माहात्म्य शुक्ल पक्ष की एकादशी का है, वही माहात्म्य कृष्ण पक्ष की एकादशी का है। इस प्रकार से व्रत करने का जो  फल है उसे सुनो -

शंखोद्धार क्षेत्र में स्नान कर भगवान गदाधर के दर्शन का जो फल है, वह फल एकादशी के उपवास के फल के सम्मुख सोलहवें भाग के समान भी नहीं है। व्यतिपात में दान करने का फल लाख गुणा होता है। संक्रान्ति में दान करने का फल चार लाख गुणा है । ये सारे फल और सूर्य-चन्द्र ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्नान करने का जो फल होता है, वह फल एकादशी के व्रत को करने से मिलता है। जिस के घर मे आठ हज़ार वर्ष तक एक लाख तपस्वी नित्य भोजन करते हैं, उसको जितना पुण्य मिलता है, वही पुण्य मनुष्य को एकादशी का उपवास करने से प्राप्त होता है तथा वेद-वेदांग पारंगत ब्राह्मण को एक हज़ार गौ देने से जो पुण्य होता है, उससे दस गुणा पुण्य एकादशी का व्रत करने वाले को मिलता है। जिसके घर में प्रतिदिन दस श्रेष्ठ ब्राह्मण भोजन करते हैं, उसके फल से भी अधिक दस गुणा फल एक ब्रह्मचारी के भोजन से होता है, उससे हज़ार गुणा फल पृथ्वी दान से और हज़ार गुणा फल कन्यादान से तथा उससे दस गुणा अधिक फल विद्यादान से होता है। विद्यादान से भी दस गुणा फल भूखे को भोजन कराने से होता है। अन्न दान से अधिक न कोई दान हुआ न हो सकता है। हे कौन्तेय ! अन्न के दान से पितर लोक में बैठे हुए पितर भी तृप्त हो जाते हैं। पर एकादशी के व्रत के पुण्य अनगिनत है। इसके पुण्य का प्रभाव देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। हे पुरुष सत्तम, उपवास का आधा फल रात को और आधा फल दिन में एक बार भोजन करने वाले को होता है। उपवास के दिन एक बार रात्रि में भोजन करे, इस प्रकार कोई भी व्रत करना उचित है । यम, नियम, तीर्थ, दान और यज्ञ तभी तक गर्जते हैं जब तक एकादशी नहीं आती। इसलिये संसार के तापों से डरने वाले मनुष्यों को एकादशी का उपवास अवश्य करना चाहिये। 

 हे अर्जुन, एकादशी के दिन न तो शंख से जल पीवे, न ही किसी पशु आदि की हिंसा करे। यह एकादशी व्रत अन्य व्रतों से उत्तम है।  

अर्जुन ने कहा - हे प्रभो, सब तिथियों में एकादशी उत्तम एवं पवित्र है, यह आपने कैसे कहा, सब यज्ञों से भी यह उत्तम है, इसकी मैं पुरातन कथा सुनना चाहता हूं।  

श्री कृष्ण जी बोले - हे पार्थ! सुनो, सतयुग में देवताओं को कष्ट देने वाला, अत्यन्त अद्भुत और महाभयंकर मुर नाम का राक्षस था । उस प्रतापी दैत्य ने इन्द्र, वसु, ब्रह्मा, वायु और अग्नि आदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर अपने वश में कर लिया था।  

तब इन्द्र ने दुःखी होकर अपना कष्ट भगवान शंकर से कहा - हे महादेव, हम सभी देवता अपने लोक से गिरकर पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे हैं । हे प्रभो ! हम देवताओं की क्या गति होने वाली है?  

भगवान शंकर न कहा - हे इन्द्र, आप जगत्पति, शरणागतवत्सल, गरुड़ध्वज भगवान विष्णु की शरण में जाओ, वही आपको मार्ग दिखाएंगे।  

इस प्रकार भगवान शिव के वचन सुनकर देवराज इन्द्र अपने गणों एवं देवताओं सहित विष्णु भगवान  के पास गए । भगवान को जल में सोये हुए देखकर, इन्द्र दोनों हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे -  

हे देवताओं से वन्दित पुरुषोत्तम आपको नमस्कार है, हे दैत्य शत्रु, कमल नयन, मधुसूदन हमारी रक्षा करो। दैत्यों से भयभीत ये सब देवतागण मेरे साथ आपकी शरण में आये हैं । हे जगन्नाथ, आप ही शरण देने वाले हैं, आप ही कर्ता हैं, आप ही कारक हैं। आप सभी लोकों के माता हैं, आप ही संसार के पिता हैं । आप ही सब को उत्पन्न, पालन एवं संहार करने वाले हैं। हे प्रभो, आप सभी देवताओं के सहायक हैं और शान्ति देने वाले हैं। हे प्रभो, आप ही पृथ्वी हैं और आप ही आकाश हैं, आप ही चराचर संसार का उपकार करने वाले हैं। आप ही शंकर हैं और आप ही ब्रह्मा हैं। हे प्रभो, आप ही त्रिलोकी का पालन करने वाले हैं। आप ही सूर्य हैं और आप ही चन्द्रमा हैं, आप ही अग्नि देव हैं। आप ही यज्ञकर्ता हैं, आप ही यज्ञस्वरूप हैं और आप ही यज्ञ का साफल्य हैं, आप ही मन्त्र हैं, आप ही तन्त्र हैं, आप ही ऋत्विज हैं और आप ही जप हैं । हे भगवन, हे देव देवेश, हे शरणागत वत्सल, हे योगीश्वर, आप ही यज्ञ के यजमान हैं, और आप ही फल को भोगने वाले हैं । हे नाथ, आप भय युक्त लोगों को शरण देने वाले हैं, वैभवहीन दैत्यों से पराजित, भयभीत होकर हम आपकी शरण में आये हैं । हे प्रभो, दानवों ने देवताओं को पराजित कर दिया है, देवता लोग स्वर्ग से भ्रष्ट होकर, स्थान से भ्रष्ट होकर पृथ्वीतल पर विचर रहे हैं, हे जगन्नाथ हमारी रक्षा करो। 

इन्द्र के वचनों को सुनकर भगवान विष्णु बोले कि वह मायावी दानव कौन है, जिसने देवताओं को पराजित कर दिया है, उसका क्या नाम है, वह कहां रहता है, उसकी कितनी सेना है, कितनी शक्ति है, किसका इसे आश्रय है ?  हे इन्द्र, निर्भय होकर कहो ।  

तब इन्द्र बोले - हे देव, भक्तों पर अनुग्रह करने वाले देव-देवेश, ब्रह्म वंश में देवताओं को महान कष्ट देने वाला, महा उग्र नाड़ी-जंघ नाम का दैत्य उत्पन्न हुआ था । उसी ही दैत्य का बलशाली मुर नाम का यह पुत्र है और विख्यात चन्द्रावती नाम की उसकी नगरी है। वह दुष्टात्मा, बलशाली दैत्य संसार को जीत करके, सभी देवताओं को अपने वश में करके, देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकालकर उसी नगरी में रह रहा है। वह इन्द्र, अग्नि, यम, वायु, ईश, चन्द्रमा, निर्ऋति, वरुण आदि के स्थानों पर भी स्थित है और वही सूर्य बनकर तप रहा है। हे प्रभो, वही मेघ है, सभी देवताओं से वह अजेय है। हे प्रभो, उस दुष्ट दैत्य का संहार कर देवताओं को विजयी बनाओ ।  

इन्द्र के ऐसे वचन सुनकर भगवान जनार्दन क्रोधित होकर इन्द्र से बोले - हे देवेन्द्र, तुम्हारे शत्रु उस महाबली दैत्य का मैं संहार करूंगा, आप सभी पराक्रमशील देव, उसकी नगरी चन्द्रवती में चलो।  

ऐसा कहकर भगवान विष्णु को आगे करके सब देवता उसकी नगरी की ओर चले। तब देवताओं ने सहस्रों आयुधों से सुसज्जित, असंख्य दैत्यों के ऊपर देवेन्द्र को आक्रमण करते हुए देखा। उस बलशाली असुर के भय से आक्रान्त सभी देवता संग्राम से भाग कर दशों दिशाओं में चले गये। तब भगवान को अकेले देखकर वे असुर अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़े। उस दैत्य सेना को दौड़ते हुए देखकर शंख, चक्र, गदा को धारण करने वाले भगवान विष्णु ने सर्प के विष के समान भयंकर बाणों से उनको वेध दिया। विष्णु के हाथ से सैंकड़ों असुर मारे गए, परन्तु एक वही दानव विचलित न होकर बार-बार युद्ध करता रहा। भगवान ऋषीकेश के हाथों से छोड़े गए आयुधों को अपने तेज से कुण्ठित करने लगा और आयुधों को फूलों के समान समझता रहा । फेंके गये अस्त्र-शस्त्र उसको कोई हानि न पहुंचा सके । अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार से भी जब उस दैत्य को जीतने में असमर्थ रहे, तब परिघ के समान बाहुओं से भगवान युद्ध करने लगे, अनेक वर्षों तक बाहुयुद्ध करते हुए भगवान हृषीकेश थक कर वदरिकाश्रम को चले गये ।

वहां हेमवती नाम की सुन्दर गुफा में जगत के पति महायोगी हृषीकेश ने शयन के लिये प्रवेश किया । हे अर्जुन, दश योजन विस्तार वाली उस गुफा का एक ही द्वार था। भगवान विष्णु थके हुए सो गये । वह दानव भगवान का पीछा करता हुआ उस गुफा में पहुंच गया। वहां भगवान को सोया हुआ देखकर वह दानव विचार करने लगा,  दानवों का शत्रु इस विष्णु को मैं अब मारूंगा। वह दुर्बुद्धि ऐसा विचार मन में कर ही रहा था, उस समय एक दिव्य तेज वाली कन्या का भगवान के अंगों से प्रादुर्भाव हुआ । उस देवी और दैत्य के बीच भयंकर युद्ध हुआ । 

उस देवी को देखकर वह दैत्य विस्मित हो गया और सोचने लगा कि ऐसी रौद्ररूपा भयानक स्त्री किस ने बनाई है जो अति प्रबल वज्रपात कर रही है। उस महादेवी ने उस बली दैत्य को तुरन्त रथ रहित करके क्षणमात्र में उसके सब अस्त्र-शस्त्र काट दिये । जब बाहु में शस्त्र लेकर महाबल पूर्वक वह दैत्य दौड़ा तब देवी ने उसकी छाती में घूंसा मार कर उसे गिरा दिया। वह फिर उठकर देवी को मारने के लिये दौड़ा। देवी ने क्रोधित होकर उसका सिर काट कर क्षणमात्र में उस असुर को मारकर पृथ्वी पर गिरा दिया। सिर कटने पर वह दैत्य यमलोक पहुंच गया। शेष दैत्य भय से पीड़ित होकर दीन-हीन बने हुए पाताल में चले गये।  

तब भगवान हृषीकेश ने निद्रा से उठकर अपने सामने मरे हुए उस दैत्य को देखा और अपने सामने नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर खड़ी हुई कन्या को देखकर जगत के पति विष्णु भगवान विस्मित होकर प्रसन्न मुख हो उससे पूछने लगे कि गन्धर्व, पवन, इन्द्र सहित सब देवताओं को जीतने वाले इस दुष्टात्मा दैत्य को किसने मारा। जिस ने लोकपालों तथा नागों को क्रीड़ामात्र में ही जीत लिया था और जिससे परास्त हुआ मैं भी इस गुफा में शयन के लिये विवश हुआ था, किसकी दया से मैं सुरक्षित हुआ । 

कन्या बोली - हे प्रभो, आपके अंश से उत्पन्न मैं ने ही दैत्य को मारा है। आपको शयन करते हुए देखकर मारने की इच्छा करते हुए तीनों लोकों के कण्टक इस दुष्ट दैत्य को मैं ने मारकर देवों को निर्भय बना दिया । हे प्रभो, सब शत्रुओं को भय देने वाली आपकी ही मैं महाशक्ति हूं। तीनों लोकों की रक्षा करने के लिये संसार के इस भयंकर दैत्य को मरा हुआ देखकर आपको आश्चर्य क्यों हुआ?  

हृषीकेश भगवान बोले - इस असुर के मारने पर मैं तुम से प्रसन्न हूं, हृष्ट-पुष्ट होकर देवता आनन्दित हुए हैं। तुमने जो यह भलाई का काम किया है, उस से तीनों लोकों में आनन्द छा गया है। मैं तुम से प्रसन्न हूं, हे सुव्रते तुम वर मांगो, मैं तुम्हें ऐसा वर दूंगा जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ हो । 

कन्या बोली - हे प्रभो, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं, तो ऐसा वर दें जिससे मेरे दिन में (एकादशी) व्रत करने वाले मनुष्यों को मैं महापापों से छुड़ा दूं । पूरे दिन उपवास का जो फल है उसका आधा फल नक्तभोजन करने वाले को और उसका आधा फल एक बार भोजन करने वाले को हो । इस प्रकार दिन भर भक्तिपूर्वक, जितेन्द्रिय होकर व्रत करने वाला अनेक प्रकार के भोगों को भीगने वाला हो। वह अनन्तकाल तक वैकुण्ठ में निवास करता रहे। हे प्रभो, आपकी कृपा से यह वरदान मुझे प्राप्त हो । उपवास, नक्त, एक-भुक्त व्रत को जो व्यक्ति करे उसे धर्म का लाभ हो, उसे धन की प्राप्ति हो, हे जनार्दन, उसे आप मोक्ष की प्राप्ति करायें।  

भगवान हृषीकेश बोले - हे कल्याणि, तुम ने जो कहा है, वैसा ही होगा। जो लोग मेरे भक्त हैं और जो लोग तुम्हारे भक्त हैं, वे तीनों लोकों में प्रसिद्ध होकर मेरे निकट निवास करेंगे। हे पराशक्ति, तुम एकादशी के दिन उत्पन्न हुई हो - इसलिये तुम्हारा नाम एकादशी होगा। तुम्हारे भक्तों के समस्त पापों का नाश होकर अव्यय पद प्राप्त होगा । मैं यह स्वयं कहता हूं, सब तीर्थों से, सब दानों से, सब व्रतों से अधिक पुण्य एकादशी व्रत का है ।  

भगवान विष्णु उस कन्या को यह वरदान देकर वहीं अन्तर्धान हो गये । उस समय से एकादशी तिथि संसार में पूज्य हो गई। हे अर्जुन, जो मनुष्य एकादशी का व्रत करेंगे, उनके काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रुओं का नाश हो जायेगा और उन्हें परमगति प्राप्त होगी । जो लोग इस व्रत का पालन करेंगे, उनके विघ्नों का नाश हो जाएगा और सब सिद्धियों की प्राप्ति होगी। हे कुन्तीपुत्र, इस प्रकार एकादशी की उत्पत्ति हुई। यह एकादशी सब पापों का नाश करने वाली, सम्पूर्ण सिद्धियों को देने वाली परम पवित्र एक ही तिथि संसार में उदित हुई है।  

हे अर्जुन, शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष का इसमें भेद नहीं करना चाहिये। दोनों पक्षों का व्रत एक समान करने योग्य हैं। द्वादशी युक्त एकादशी सबसे उत्तम है । एकादशी का व्रत जो मनुष्य करते हैं, वे गरुड़ध्वज भगवान के वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करते हैं। संसार में वे ही मनुष्य धन्य हैं, जो विष्णु की भक्ति में संलग्न हैं और इस एकादशी के माहात्म्य को समझते हैं। एकादशी को निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करने वाले अश्वमेध यज्ञ के पुण्य को प्राप्त करते हैं।

द्वादशी के दिन विद्वान भक्त पुष्पांजलि सहित भोजन (पारणा) की प्रार्थना करे - हे पुण्डरीकाक्ष, हे अच्युत, मैं आपकी शरण में हूं, मेरी रक्षा करो। व्रत के फल की इच्छा करने वाला मनुष्य अष्टाक्षर मन्त्र से तीन वार अभिमन्त्रित पात्र के जल का पान करे। 

द्वादशी के आठ नियम हैं - 

  1. दिन में शयन न करना
  2. पराये का अन्न न खाना 
  3. दूसरी बार भोजन न करना
  4. स्त्री संग न करना
  5. शहद का उपयोग न करना
  6. कांस्य पात्र में भोजन न करना
  7. मांस का उपयोग न करना
  8. तेल का उपयोग न करना 

जो पुरुष वार्तालाप के योग्य नहीं हैं, पतित हैं, उनसे भाषण न करें, यदि बात कर लें तो शुद्धि हेतु तुलसी का पत्र मुंह में रखे, पारणे के समय आमले के फल को भक्षण करना भी अच्छा है । हे राजन, एकादशी के मध्याह्न काल से द्वादशी के अरुणोदय तक स्नान, पूजन, दान और होम आदि कार्य करना उचित है। यदि कोई महासंकट में पड़ा हो तो द्वादशी में जल से पारणा कर ले। और पुनः भोजन कर लेने से भी भोजन का दोष नहीं होता। विष्णु की भक्ति करने वाला विष्णु भक्त के मुख से जो मनुष्य यह मंगलदायक कथा सुनते हैं, वे अनन्त काल तक वैकुण्ठ लोक में निवास करते हैं। जो एकादशी के माहात्म्य का एकपाद भी श्रवण करता है, उसके पाप निस्सन्देह दूर हो जाते हैं क्योंकि वैष्णव धर्म के समान सत्य सनातन पवित्र व्रत कोई नहीं है।

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