
'कलयुग में यदि कोई ऐसा स्थान है जहाँ पृथ्वी और वैकुंठ का मिलन होता है, तो वह वेंकटाचल है।'
मित्र, जीवन की भागदौड़ में हम अक्सर निराश हो जाते हैं। बाधाएं पर्वतों की तरह विशाल लगती हैं और हम स्वयं को बौना महसूस करते हैं। लेकिन प्राचीन ग्रंथ साक्षी हैं कि वेंकटाचल (तिरुमला) केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि भगवान का 'क्रीडाद्रि' (क्रीडा स्थल) है। यहाँ किया गया छोटे से छोटा सत्कर्म भी मेरु पर्वत के समान फल देता है। यहाँ असंभव शब्द का कोई अस्तित्व नहीं है।
आइए, सत्ययुग की उस पावन कथा में प्रवेश करें जो यह सिद्ध करती है कि जब 'प्रयास' और 'प्रार्थना' एक हो जाते हैं, तो ईश्वर को प्रकट होना ही पड़ता है।
कथा का आरंभ एक भूल से होता है। ऋषि दुर्वासा, जो अपने क्रोध के लिए विख्यात थे, एक दिन वन में एक किन्नर दम्पति को मर्यादा लांघते देख कुपित हो उठे। उनका श्राप वज्र की तरह गिरा—'तुम दोनों अपनी दिव्य शक्तियों को खोकर मृत्युलोक में भील (शिकारी) बनकर जन्म लोगे!'
दम्पति के पैरों तले जमीन खिसक गई। वे दया की भीख मांगने लगे। ऋषि का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कहा, 'भयभीत न हो। यह श्राप ही तुम्हारे मोक्ष का द्वार बनेगा। जिस दिन तुम स्वामी पुष्करिणी के तट पर भगवान को 'श्वेत वराह' के रूप में विचरते देखोगे, तुम श्राप मुक्त हो जाओगे।'
यह प्रसंग हमें जीवन का पहला सूत्र देता है: विपत्ति अंत नहीं है। जिसे हम आज संकट मान रहे हैं, हो सकता है वही हमें ईश्वर के सबसे निकट ले जाने का माध्यम हो। धैर्य रखें, भगवान की योजना हमारी समझ से परे है।
समय का चक्र घूमा। वह दम्पति सिंहाचल के वनों में भील के रूप में जन्मे। उनका पुत्र हुआ—चित्रांगद। एक दिन, उन्होंने अपने खेत में एक अद्भुत दृश्य देखा। एक बांबी से एक अलौकिक श्वेत वराह निकला और फसल चरने लगा। उसके शरीर से ऐसी दिव्य कांति निकल रही थी कि वन जगमगा उठा।
जब उस देश के पुण्यात्मा राजा को यह समाचार मिला, तो वे दौड़े चले आए। राजा ने वराह को देखा और उसे रोकने के लिए बाण चलाया। बाण लगते ही वह दिव्य वराह बांबी के भीतर समा गया। राजा का हृदय ग्लानि से भर गया—'मैंने अनजाने में किस दिव्य शक्ति पर प्रहार कर दिया?'
पश्चाताप की अग्नि ने राजा को तपा दिया। उसने राजमहल लौटने से मना कर दिया। उसने उसी बांबी के पास घास का आसन बिछाया और अन्न-जल त्यागकर घोर तपस्या में लीन हो गया। सर्दी, गर्मी, वर्षा—प्रकृति के प्रकोप उसे डिगा न सके। उसका संकल्प हिमालय जैसा अटल था।
मित्र, यही 'शरणागति' है। जब हम संसार के सारे सहारे छोड़कर केवल एक ईश्वर को अपना लक्ष्य बना लेते हैं, तो ब्रह्मांड की शक्तियां हमारे लिए कार्य करने लगती हैं।
राजा की निष्ठा देखकर आकाशवाणी हुई: 'राजन! यदि तुम मेरे दर्शन चाहते हो, तो इस बांबी को गाय के दूध से भर दो।'
राजा ने विलंब नहीं किया। उसने बांबी के मुख में दूध की अविरल धारा प्रवाहित की। वह केवल दूध नहीं था, वह एक भक्त का पिघला हुआ विश्वास था। जैसे-जैसे दूध बांबी में समाता गया, वैसे-वैसे बांबी पिघलने लगी। और फिर... एक महाविस्फोट के साथ तेज पुंज प्रकट हुआ!
साक्षात् भगवान श्री वराह स्वामी प्रकट हुए! उनके चार हाथों में शंख और चक्र सुशोभित थे। रत्नजड़ित आभूषणों से उनका शरीर दमक रहा था और वाम भाग में करुणा की मूर्ति माँ भू-देवी विराजमान थीं। वह दृश्य इतना मनोरम था कि राजा सुध-बुध खो बैठा।
तभी भगवान की गंभीर वाणी गूंजी:
'राजन! मैं तुम्हारे प्रेम से प्रसन्न हूँ। तुम मुझे केवल कमर तक ही देख पाओगे। कलयुग के अंत तक मेरे चरण इस बांबी में, इस धरा के गर्भ में छिपे रहेंगे, ताकि मैं यहाँ स्थिर रहकर अपने भक्तों का कल्याण कर सकूं।'
भगवान ने राजा को आदेश दिया कि वह वैखानस ऋषियों द्वारा उनकी पूजा की व्यवस्था करे और एक भव्य मंदिर का निर्माण कराए। उसी क्षण, वह भील दम्पति भी श्राप मुक्त होकर अपने दिव्य धाम को प्राप्त हुए।
यह कथा केवल इतिहास नहीं, एक जीवंत आश्वासन है।
शास्त्र कहते हैं कि भगवान को 'वैकुंठ' से अधिक प्रिय 'वेंकटाचल' है। वराह स्वामी ने ही बाद में यह स्थान भगवान वेंकटेश्वर (श्रीनिवास) को प्रदान किया। आज भी तिरुमाला में भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन से पहले वराह स्वामी के दर्शन की परंपरा है।
आज आप जीवन के जिस भी मोड़ पर खड़े हैं—चाहे वह करियर की अनिश्चितता हो, धन का अभाव हो, या मन की अशांति—याद रखें कि आप अकेले नहीं हैं।
भगवान वेंकटेश्वर का संदेश आपके लिए है:
हे मानव! उठो और अपने भीतर के भय को त्याग दो। जिस ईश्वर ने एक साधारण भील के श्राप को वरदान में बदल दिया, जिस ईश्वर ने एक राजा की पुकार पर पत्थर (बांबी) से प्रकट होकर दर्शन दिए, क्या वह आपकी पुकार नहीं सुनेगा?
अपनी कमियों को मत देखो, उसकी दया को देखो।
अपनी समस्याओं को मत देखो, उसकी शक्ति को देखो।
आज ही अपने हृदय में वेंकटाचल पति का आह्वान करो। विश्वास रखो, जो 'वेंकटेश' की शरण में है, उसका पतन असंभव है। विजय आपकी ही होगी, क्योंकि सारथी स्वयं जगदीश्वर हैं।
ॐ नमो वेंकटेशाय!
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