परीक्षित क्यों श्रापित हो गये ?

हमने देखा कि कैसे महाभारत राजा परीक्षित को धर्म के अवतार और एक सक्षम प्रशासक के रूप में वर्णित करता है जो वास्तव में अपनी प्रजा की बहुत अच्छी तरह से देखभाल करते थे। वे अभिमन्यु के पुत्र थे। उनके पास अच्छा आत्म-संयम था। उन्ह....

हमने देखा कि कैसे महाभारत राजा परीक्षित को धर्म के अवतार और एक सक्षम प्रशासक के रूप में वर्णित करता है जो वास्तव में अपनी प्रजा की बहुत अच्छी तरह से देखभाल करते थे।
वे अभिमन्यु के पुत्र थे।
उनके पास अच्छा आत्म-संयम था।
उन्होंने काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य पर विजय प्राप्त की थी।
लेकिन फिर कुछ आकस्मिक हुआ
वे शापित हो गये।
एक लापरवाह कृत्य के लिए, जो उन्होंने गुस्से मे आकर किया।
उन दिनों के राजा लोगों को नुकसान पहुँचाने वाले दुष्ट जानवरों को मारने के लिए शिकार पर जाया करते थे।
ऐसे ही एक शिकार में, एक जानवर पर तीर चलाने के बाद, जानवर गहरे जंगल में छिप गया।
उसके पीछा करते परीक्षित चले गये।
और वे अपनी सेना से अलग हो गए।
वे पैदल थे, थके हुए थे, भूखे थे।
वे नौजवान नहीं थे, उस समय वे साठ वर्ष के थे।
जानवर की तलाश करते हुए उन्होंने एक मुनि को देखा।
थके और भूखे परीक्षित ने जाकर उनसे पूछा कि क्या आपने एक जानवर को देखा है।
मुनि का नाम था शमीक (शमीकः)।
वे मौन-व्रत में थे।
उन्होंने जवाब नहीं दिया।
परीक्षित को यह नहीं पता था कि वे मौन-व्रत में थे।
उन्हें शायद यह भी पता नहीं था कि वे एक मुनि थे।
जरूरी नहीं है कि मुनि जन हमेशा भगवा वस्त्र ही पहनें, जटा और दाढ़ी रखें।
यह तो फिल्मऔर सीरियल में है।
ऐसा कोई ड्रेस कोड नहीं है।
भगवा सन्यासियों के लिए है।
अधिकांश मुनि गृहस्थ हैं, वे विवाहित हैं, उनके बच्चे हैं।
सचमुच देखा जाएं तो वे किसी भी अन्य गृहस्थ की तरह कपड़े पहने होंगे।
परीक्षित ने जो किया उसके लिए आप उन्हें पूरी तरह से दोष नहीं दे सकते।
अगर उन्हें पता होता कि वे एक मुनि थे तो उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया होता।
सब कुछ भूल जाओ, सभी जानते हैं कि मुनियों के पास तप शक्ति है, वे शाप दे सकते हैं।
मुझे लगता है कि यह मामला गलत पहचान का रहा होगा।
परीक्षित ने सोचा होगा कि यह कोई आम आदमी है।
परीक्षित क्रोधित हो गये।
उन्होंने पास में एक मरा हुआ सांप पड़ा देखा।
अपने धनुष की नोक से उसे उठाकर मुनि के गले में डाल दिया और वापस महल में चला गया।
शमीका एक बहुत ही तीव्र तपस्वी थे।
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
वहीं बैठकर उनके व्रत का पालन करता रहा।
लेकिन शमीक का एक बेटा था, शृंगी।
बहुत शक्तिशाली और बहुत गुस्सेवाला।
वे अपने गुरुकुल से लौट रहे थे कि उनके एक मित्र ने उन्हें बताया कि उनके पिता के साथ क्या हुआ है।
मुनि अभी भी मरे हुए सांप को गले में लिए हुए बैठे थे।
शमीक के सिवा किसी को नहीं पता था कि यह नीच कृत्य किसने किया।
यह सुनते ही शृंगी को गुस्सा आ गया।
ऐसे संत के साथ ऐसा कौन करेगा?
शृंगी ने शाप दिया।
जिसने भी यह किया है उसे अब से सातवीं रात से पहले तक्षक अपने उग्र विष से जलाकर मार डालेगा।
मेरे तप के बल से तक्षक ऐसा करने को विवश हो जाएगा।
शृंगी ने जाकर अपने पिता को बताया कि उन्होंने क्या किया है।
शमीक ने अपने शिष्य गौरमुख को बुलाया और कहा कि जाओ और राजा को बताओ कि क्या हुआ है।
अभिशाप बहुत शक्तिशाली है।
उन्हें अपने आप को बचाना है।
यह सुनते ही परीक्षित बहुत परेशान हो गए।
अरे, मैं ने यह क्या कर दिया?
मुझे किसी साधु के साथ ऐसा नहीं करना चाहिए था।
और वे डर भी गये।
क्योंकि यह कोई और नहीं सबसे शक्तिशाली और क्रूर तक्षक था जो उनके पीछे आने वाला है।
राजा और मुनि के बीच अंतर देखिए।
महाभारत में ही कहा गया है कि परीक्षित में आत्मसंयम था और उन्होंने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली थी।
लेकिन यह परिस्थिति पर भी निर्भर करता है।
भूखे और थके हुए, राजा ने अपना नियंत्रण खो दिया।
शमीक के पास उस समय उन्हें शाप देने के सभी कारण थे।
लेकिन उन्होंने नहीं किया।
क्योंकि उनकी प्राथमिकता किसी को शाप देने के बजाय मौन-व्रत को सफलतापूर्वक पूरा करना था।
मन पर उनका नियंत्रण ही वास्तविक नियंत्रण है।
उन्होंने यह भी सोचा होगा कि परीक्षित को पता होता कि वे एक मुनि हैं तो उन्होंने ऐसा नही किया होता।
श्रृंगी का अभिशाप; नौजवान थे, खून गरम था।
उन्होंने अपने पिता से पूछने तक भी इंतजार नहीं किया कि क्या हुआ था।
और तक्षक ही क्यों?
क्योंकि अपराध एक मरे हुए सांप को लेकर किया गया था।
अपराधी को सांप द्वारा ही दंडित किया जाना चाहिए।

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